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नवम्बर 2009 |
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| जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना |
जिस पृथ्वी को सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में हजारों वर्ष लग गए। उसी पृथ्वी को असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है । उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे। सौ वर्षों के अन्तराल में पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए और इससे भी कम समय में प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से ओजन परत में छिद्र हो गया। वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया जलधारा गदली हो गई । जंगल विरल हो गए मौसम का मिजाज बदल गया. सौ वर्षों से भी कम समय में परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये। औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ संचार-क्रांति के तहत विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी। देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये। खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से बाजार पट गया। चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट, अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज, जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना जीवन फीका लगने लगा। वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये। हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक निचोड़ना सीख लिया। साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे। हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची। बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए लड़कियाँ निर्यात किये। इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था। तना तार था, जिसमें करन्ट न था। कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ देश और जनता को बेचते हुए लोगों की ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी। समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद रिश्वत-घोटाला छा गया। यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था। इस कठिन वक्त में विचार करने का समय है कि इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर सुरक्षित कैसे रखा जाये। नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना. आदमी को बचाने के लिए मेरे पास एक कविता है जो देती-है आँखों को दृष्टि, नाकों को गंध, कानों को आहट त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता। बहुत थोड़े से समय में तय करना है- निर्माण या विध्वंस शास्त्र या शस्त्र प्रेम या नफरत शान्ति या आतंक इतनी बड़ी दुनिया में इतने लोगों के बीच एकल जिन्दगी जीते हुए मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए मेरी कविता माध्यम बन सकती है, इसलिए अपनी कविता की लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर आप के बीच खड़ा हूँ मैं। विजय रंजन |











