magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

पानी


कहीं कुछ तो है, तभी तो
सौरमंडल के सभी ग्रहों से अलग है पृथ्वी
इस पृथ्वी पर हुआ जीवन का विकास.
कहीं कुछ तो है, तभी तो
पृथ्वी पर है-मौसम, हरियाली, जीव-जन्तु
पशु-पक्षी और आदमी.

यहाँ है -पानी
पानी......पानी

पानी
कहाँ नहीं है पानी
आकाश, धरती, पाताल-
पानी
आर्द्रता, ओस, वर्षा, बादल, हवा-
पानी
कुँआ, तालाब, पोखर,
झील, नदी, सागर-
पानी
पानी ही पानी
पानी ही पानी.

पानी के देवता-इन्द्र देवता
इन्द्र देवता सबको देते हैं पानी
नाराज हो गये इन्द्र देवता तो
नहीं देंगे पानी
पड़ जाएगा सूखा, अकाल
नाराज हो गये इन्द्र देवता तो
दे देंगे इतना पानी कि
जल-मग्न हो जाएगी धरती
विनाश है दोनों हाल में
इसलिए सदा प्रसन्न रहें इन्द्र देवता तो
हरी-भरी रहेगी धरती
जिन्दा रहेंगे जीव-जन्तु
खुशहाल रहेगी धरती
इसलिए आदिकाल से पूजते रहे हैं-
पानी, पानी के श्रोत और पानी के देवता.
पानी न होता
तो कहाँ रहते शेषनाग, ब्रह्मा, विष्णु
पानी न होता
तो शिव कहाँ से उतारते धरती पर गंगा
पानी न होता
तो कैसे होता समुद्र-मंथन
पानी न होता
कहाँ पे विकसित होती सभ्यताएँ
पानी न होता
तो कृष्ण कैसे करते कालिया मर्दन
किस तट पर बजाते बाँसुरी
कहाँ पे नहाती गोपियाँ
पानी न होता
तो नल-नील कैसे बनाते पुल
पानी न होता
तो छला न जाता दुर्याेधन
न हँसती द्रौपदी
न होता महाभारत.

पानी न होता
तो कहाँ करते ग्रहण-स्नान
पानी न होता
तो कहाँ लगता कुंभ का मेला
पानी न होता
तो कहाँ सिराते हम अपना शरीर
पानी न होता
तो कैसे देते पितरों को पानी
पानी न होता
तो शर-शय्या पर लेटे भीष्म
क्यों मांगते पानी.

पानी न होता
तो क्यों शरहद पार से आती पंक्षियाँ
पानी न होता
तो कहाँ रहती मछलियाँ
पानी न होता
तो कैसे बुझती आग
पानी न होता
तो कैसे बुझती प्यास.

.पानी न होता
तो कहाँ से आता आँखों से पानी
बौखला जाता है आदमी-
जब नाक तक हो जाए पानी.

पानी के लिए
नलों पर झगड़ती हैं औरतें
पानी के लिए
मुट्ठियाँ तानते हैं राज्य
पानी के लिए
टकराने को तैयार हैं कई देश
पानी-
कहीं कुछ तो है पानी में.

आधा हो जाए पानी
तो छलकने लगती है गगरी
आधी हो जाए पानी
तो तबाह हो जाएगी दुनिया.

दुनिया बचाये धन दौलत
दुनिया बचाये मान-सम्मान
दुनिया बचाये इज्जत-आबरू
दुनिया चाहे कुछ भी बचा ले
मैं तो बचाऊँगा बूंद-बूद पानी
ताकि दुनिया को बचा सकूँ.

दुनिया को बचाऊँ
सौरमंडल में
दुनिया को बचाऊँ
विश्व युद्ध से
और यदि बचाने में
नहीं हो सका कामयाब तो
बूंद-बूंद बचाये गये पानी के किनारे
कम-से-कम
अंकुरित हो सकेगी
एक और सभ्यता.

विजय रंजन
Comments
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Abhijit Sircar  - Bonshai and Pani was mind blowing     |117.198.35.xxx |2009-06-28 13:52:51
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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन