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नवम्‍बर  2009
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चिकित्सक भी कमीशनखोर हो गये हैं

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आम आदमी को अब चिकित्सकों को भगवान समझने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अब चिकित्सक भी कमीशनखोर हो गये हैं. ऐसी बात नहीं है कि वे आज ही हुए हैं  कमीशनखोरी चिकित्सकों के लिए अब एक उद्योग बन गया है. आप जहाँ भी जायें चिकित्सकों के पास वे आप को भारी-भरकम लिस्ट थमा देंगे पैथोलोजिकल जाँच के लिए. आप के पास खाने का अन्न हो न हो लेकिन ये बेईमान, चिकित्सक चिकित्सिा के नाम पर आप को कहीं नहीं रहने देंगे. समाज में अतिप्रतिष्ठित माने जाने वाले चिकित्सकीय पेशा घृणित पेशा के रूप में देखा जाने लगा है, रोगियों के लिए मजबूरी है कि वे जायें तो जायें कहाँ उन्हें तो वहीं जाना पड़ेगा, जहाँ लूटा-पिटा कर जान बचाना है. वे करे तो क्या करे. उन्हें तो धन लोलूप चिकित्सक की शरण में ही जाना पड़ेगा, ऐसे धनलोलूप चिकित्सक के कारण समाज को शर्मसार होना पड़ रहा है.  
आईएमए के अध्यक्ष तुलसी महतो कहते हैं- पैथोलोजिकल व रेडियोलोजिकल टेस्ट के नाम पर डाॅक्टरों का कमीशन फिक्सड् हो गया है. यह स्थिति कश्मीर से कन्या कुमारी तक की है. इसका सीधा असर गरीब जनता पर पड़ रहा है. इसे रोकने के लिए आइएमए को  समुचित पहल करनी चाहिए. मैं वैसे डाॅक्टरों का शुरू से ही विरोधी रहा हूँ जो कदाचारी है. जो मेडिकल एथिक्स के खिलाफ काम करते हैं. इनके खिलाफ कानून सम्मत कठोर कार्रवाई होनी चाहिए. ऐसे ही डाॅक्टरों के कारण इतने सुंदर पेशे को एक खरीदने-बेचने वाली वस्तु के समतुल्य माना जाने लगा है.  मीडिया को भी भ्रष्ट डाॅक्टरों के मामले को उजागर करने की आवश्यकता है. 
पिछले दिनों राँची सहित झारखंड के अनेक शहरों में चिकित्सकों के द्वारा अनावश्यक जाँच के लिए अनैतिक रूप से पैथोलोजिस्टों एवं रेडियोलोजिस्टांे के द्वारा कमीशनखोरी का मामला बड़े पैमाने पर उजागर हुआ है. यहाँ रोगियों को भेजा जाता है. और जाँच के दौरान रोगियो से जो रकम एैंठी जाती है, उसमें चिकित्सकों के द्वारा दूसरे चिकित्सकों को कमीशन दी जाती है. इस प्रकार करोड़ों रुपये का बंदरबाँट कर जहाँ एक ओर कई चिकित्सक करोड़पति बन गये है, वहीं गरीब जनता अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे खर्च करके भी निरीह बनी हुई है और हर समय हाथ जोर कर इन तथाकथित भगवानों के सामने खड़ी रहती है. 
पूर्व में भी अनेक चिकित्सकों के द्वारा अमर्यादित कार्यों को अंजाम देते रहने के अनेक मामले उजागर होते आये हैं. (वैसे सभी चिकित्सक ऐेसे नहीं है.) पर गरीब जनता इन धरती के भगवानों को भला कैसे कुछ बोल सकती है. वैसे इन समाचार से बहुत ज्यादा विचलित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि चिकित्सक भी हमारे समाज के उसी सड़ी-गली व्यवस्था के ही अंग हैं, हाँ ये बात अलग है कि मूढ़ लोगों के द्वारा उन्हेें धरती का भगवान समझ लेने की भूल की गयी है. 
लेखक : के0 ई0 सैम 
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बोनसाई

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पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
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सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खडी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पीते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता


"विजय रंजन"