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नवम्‍बर  2009
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भारत की विशाल संपदा स्विट्जरलैंड में क्यों?


नंन्दलाल शाह

स्विट्जरलैंड बैंकिग एसोशियशन की रिर्पोट के अनुसार स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारत की 1456 बिलियन अमेरिकी डाॅलर राशि जमा है. भारतवासी अगर चाहे तो यह विशाल राशि भारत में तुरंत लायी जा सकती है. भारत रातो-रात एक धनाढ्य देश बन सकता है. इसी प्रकार स्विस बैंकों में रूस का 470, यूके का 390 और चीन का 96 बिलियन अमेरिकी डाॅलर गया है. 
विश्वविख्यात ये बैंक इनकम टैक्स की चोरी के लिए स्वर्ग है. अंग्रेजी में इन्हें ‘टैक्स हेवन’ कहते हैं. 
ये जमा राशि कितनी हैं, इनकी गणना साधरण जनता के लिए मुश्किल है. यह राशि लगभग 7,00,00,00,00,00,000 रुपये हैं गणित में इसे  70 ग 10 कहते हैं. इसका अर्थ, 70 लाख-करोड़ रुपये. हमारे गणित में हजार साधरण भाषा में शब्दावली नहीं है. खरब में 11शून्य लगते हैं. गणित के विद्वान इसके आगे शंख शब्द का प्रयोग करते हैं. इसमें 13 शून्य हैं, परन्तु 12 शून्यों के लिए हम लोग दो शब्दों को जोड़ कर लाख-करोड़ शब्दों से अभिव्यक्त करते हैं. यह 70 लाख-करोड़ रुपये की विशाल राशि भारतीयों ने करों की चोरी कर दंडनीय अपराध के प्रावधनों को ताक पर रख कर कैसे और कब छूपा कर स्वीटरजलैंड पहुँचा दी. यह भगवान ही जाने यह विशाल राशि हमारे देश की पूँजी, आय व अन्य आँकड़ों के अनुपात में कितनी है, यह अत्यंत दिलचस्प हैं. यह देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता की चंद्रकांता संतती व भूतनाथ जैसे तिलस्मी खयालों की तरह लगेगा. भारत में स्टाॅक एक्सचेंज में जितनी भी कंपनियों के शेयर हैं, उनके शत-प्रतिशत शेयरों की कीमत इस राशि से लगभग आधी है. भारत पर विदेशी कर्ज है. स्विस में जमा राशि हमारे विदेशी कर्ज से 15 गुनी है. कहा जाता कि मुकेश अंबानी का साम्राज्य आज कल 30 बिलियन डाॅलर का है. जबकि स्विस बैंक में जमा राशि 1456 बिलियन डाॅलर है. देश में स्वतत्रंता के पश्चात् बजटों में आज तक जितना वित्तीय घाटा हुआ, यह स्विस बैंक में जमा राशि उसे आराम से पूरी कर सकती है. 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका की दोनों गगन चुम्बी अट्टालिकाएँ टूटीं. सितम्बर माह में संयुक्त राष्ट्र संघ का वार्षिक अधिवेशन प्रतिवर्ष आता है. 2001 में यह दो माह के लिए स्थगित कर दिया गया. उस अधिवेशन में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपने भाषण में कहा था कि पूर्व के विकासशील देशों की विशाल पूंजी पाश्चात्य देाशों के बैंकों में हस्तांतरण की जाती है. मुशर्रफ ने कहा कि अगर यह जमा पूंजी पूर्वी राष्ट्रों को मिल जाये और इसका पलायन रुक जाये, तो हमारे राष्ट्र गरीब नहीं रहेंगे. हमारे देश को पाश्चात्य देशों की ओर पलायन की आवश्यकता नहीं रहेगी. स्विस बैंकांे के इन आँकड़ांें के उजागर होने के बाद मुशर्रपफ के उस भाषण का महत्व कितना स्पष्ट हो जाता है. 
स्वीटजरलैंड एक ऐसा राष्ट्र है, जिसने विश्व युद्ध में कभी भाग नहीं लिया. दुनिया भर के सभी राष्ट्रों के अवैध धन यहाँ आते रहते हैं. इस राष्ट्र की नीति रही है कि ‘न काहु से बैर, न काहु से दोस्ती’, परन्तु अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए इस बात पर भी अड़ा रहा कि हमारे पास जो पूंजी जमा रहेगी, वह गुप्त और सुरक्षित रहेगी. जमीन में गाड़े हुए  धन का शायद किसी को पता चल जाये, लेकिन इन बैंकों में रखा धन तो उससे अधिक सुरक्षित और गुप्त है. अन्तर्राष्ट्रीय दृष्य में आतंकवाद के विस्तार के कारण बड़ा परिवर्तन आया. 2001 के बाद अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी हमलों के बाद आतंकवाद पर नियंत्रण आवश्यक हो गया है. आतंकवादियों का धन एक मुल्क से दूसरे मुल्क में गुप्त रूप से हस्तांतरण न हो, इसके नियंत्रण के लिए कदम उठाने आवश्यक हो गये.  सभी जागरूक देशों ने ‘मनी लांड्रिंग’ कड़ा बनाये. अर्थात् अपरिचित और अनजान लोगों का रुपया बैंकों या वित्तीय संस्थाएँ दूसरे स्थान हस्तांतरण न करें, इसके लिए कड़े कानून बनाये गये. ऐसी परिस्थिति में स्विटजरलैंड की व्यवस्था कुछ दबाव में आ गयी. स्विस सरकार ने स्विस बैंकिंग एसोशियशन 2006 की रिपोर्ट में उपर्युक्त आँकड़ों की घोषणा की. उन्होंने यह भी घोषणा की कि इन खातों का खुलासा संबंधित सरकार के समक्ष ही वह रख सकते हैं. 
हमारी सरकार ने स्विस सरकार से इन खातों का कभी कोई खुलासा नहीं मांगा. आखिर क्यों? इन विषय में मीडिया में कोई विशेष चर्चा भी दिखाई नहीं पड़ती. इंटरनेट बराबर दर्शाता है कि भारत की यह विशाल संपदा स्विस बैंकों में गया है. चोर चोरी का धन जमीन में गाड़ कर रख देता है, उसका कोई उपयोग नहीे होता. कई बार तो यह जमीन में यूं का यू गड़ा पड़ा रह जाता है. स्विस में हमारी जमा पूंजी का भी ऐसा ही हाल है. अनेक धनाढ्य मर जाते हैं और उनका धन बैंक पचा जाती है. 
हमारी सरकार इस विशाल संपदा के लिए इतनी उदासीन क्यों हैं? यह संपदा किनकी है?  उद्योगपति, व्यापारी वर्ग, राजनीतिज्ञ, अफसरशाही, पुराने राजघराने, जंमीदार या पिफर विध्वंशकारियों, हिंसावादियों व आतंकवादियों की है. इस क्षेत्र में अगर भारत सरकार काम नहीं करती हैं, तो उसका कारण नेताओं या अफसरशाही को बचाना ही होना चाहिए. कुछ दबाव बड़े औद्योगिक घरानों का भी होगा कि इस क्षेत्र में सरकार कोई पहल नहीं करे. 
ऐसा बताया जाता है कि वहाँ राशि जमा कराने और निकालने की व्यवस्था अत्यंत गुप्त है, परन्तु लाखों करोड़ों लोग शामिल हैं. नये लोग भी शामिल होते रहते हैं. 
ऐसी परिस्थिति मंे हमारी सरकार के लिए इस व्यवस्था की गुप्तचर विभाग निश्चय ही इस व्यवस्था की गुप्तचरी को तोड़ना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए. हमारा गुप्तचर विभाग निश्चय ही इस व्यवस्था से परिचित तो होगा ही. फिर सरकार की यह उदासीनता क्यों? 
इस व्यवस्था से पूरी रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी बनाया जा सकता है. यह गुप्त बैंकिंग व्यवस्था आतंकवाद को बहुत अधिक बढ़ावा देती है. हर मुल्क में हर बैंक अपने व्यापारी या ग्राहक से हर प्रकार का परिचय और फोटो आदि विस्तार से मांग रही है. ताकि मनी लांड्री या आंतकवाद के धन को पहचाना जा सके. ऐसी परिस्थिति मे स्विस बैंक की गुप्त व्यवस्था का खुलासा होना विश्वव्यापी अधिकार माना जाना चाहिए. ऐसी घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ भी अपने नियमों में जोड़ सकता है. इसकी पहल हो. चारों तरफ से आवाज उठनी चाहिए. 
लेखक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउटेंट हैं. 
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पिता सोते हैं ओसारे में
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बकते हैं गालियाँ
छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता


"विजय रंजन"