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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

चारा वाला बाबा

‘‘का हो हरिशंकर बाबू! गुरुजी को नापिए दिए न’’. हरिशंकर बाबू पान की बट््टी पाॅकेट से निकालते हुए बोले.
‘‘हम का नापेंगे, गुरुजी के अपने ही लोग मिलकर नाप दिये. गुरुजी बेचारे साँप का मंतर जानते नहीं और जब देखिए, तब बिल में हाथ डालते रहते हैं. डँसवायेंगे नहीं, तो और क्या होगा. बेचारे जब हाथ डालते हैं, तब साँप डँस लेता है. अब तो साँप के जहर से उनका देह में जहर भर गया है और देहवे करिया हो गया है.’’ ठाकुरजी गुरुजी का पक्ष लेते हुए बोले.
इस पर तिवारीजी थोड़ा चुटकी लेते हुए बोले, ‘‘अरे ऊ सब बात नहीं है. गुरुजी ठहरे बेचारे सीधे-सादे. लोटा लेके देहात में मैदान जाने वाले और लोग उनको इटालियन संडास मंे भेज देते हैं. अब बेचारे परेशान नहीं होंगे, तो और क्या होंगे!
सब लोग हँसने लगे. इसी बीच सामने से पलटनवा धड़फड़ आते हुए दीख पड़ा. साथ मंे मिसिर बाबा भी थे.
पास आये तो तिवारी जी बोले, ‘‘ का हो मिसिर बाबा, कहाँ से धड़फड़ आ रहे है? और इ पलटनवा के साथ लेके कहाँ घुम रहे हैं. अरे अब तो गवर्नर के शासन है. अब कहाँ पलटनवा के चलेगा. ट्रांसफर-पोस्टिंग में पलटनवा खुद गंगा मंे डूबकी लगाया है. इसपर मिसिर बाबा बोले, ‘‘आप तो अइसा बोल रहे हैं, जैसे कुछ जानते ही नहीं. अरे गर्वनर कोई न्यूट्रल थोड़े होता है. जे ओकरा बैठाता है, ओकरे बतवा कान से सुनता है और का.
बात को बदलते हुए हरिशंकर बाबू बोले, ‘‘चुनाव का तैयारी करिए इस सब का इ सब का बहस कर रहे है?’’
‘‘ देख नहीं रहे हैं सब अपने-अपने म्यान से तलवार निकाल के चमका रहे हैं. विधनसभा के चुनाव भी साथ हो जाता, तो ठीके रहता. जानते नहीं चुनाव में नौकरी दाँव पर लगा रहता है. उ तो सचिवालय में हमलोग हैं, तो हमलोग के कौनो बात नहीं है. दूसरे जगह के कर्मचारी तो अभीए से हनुमान चलीसा पढ़ रहे हैं. अभी तक नक्सलाइट सब घोषणा काहे तो नहीं किये हैं कि जो वोट देगा उसको छः इंच छोटा कर देगा. खुब ड्रामा करता है, इ लोग.’’
बीच में बात को रोकते हुए और खुद स्टार्ट होते हुए तिवारीजी बोलते हैं, ‘‘अरे इ लोग से तो ज्यादा ड्रामा गुरुजी कर रहे हैं. बचवन के एक राइम्स पढ़े हैं न कि मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है. वइसेही गुरुजी के हाल है.
दिल्ली हो या झारखंड उनकरा तो गद्दी चाहिए. उनको तो गद्दी बिन सब सून लगता है और उधर ढल-ढल आँसू बहाते हैं. हम तो झारखंड को खून से बनाए हैं और झारखंड की तरक्की के लिए जीवन लगा दिए और झारखंड की तरक्की के लिए सब कुछ करने को तैयारी हैं. गद्दिया से नीचे आते हैं, तो रूलाई छुटता है और गद्दिया पर बैठते आँसूए सूख जाता है’’
पलटनवा को चुप देख कर हरिशंकर बाबू बोलते हैं, ‘‘ का रे पलटनवा तू काहे चुप है, तू कमेंट्री काहे नहीं कर रहा है. गुरुजी का दिल्ली मे कुछ मिलेगा कि नहीं?’’
इस पर पलटनवा बोला, ‘‘कुछ नहीं मिलेगा बाबा. गुरुजी सुबह से शाम तक दिल्ली में कभी मइयाजी के दरबाजा पर, तो कभी चारा वाले बाबा के पास दरबाजे पर करुण रस में गाते पिफर रहे हैं, ‘‘तेरे दर पे आया हूँ, कुछ करके जाऊँगा, झोली भर के जाऊँगा या मर के जाऊँगा...’’ अब अताइए इनका झोली में कोई काह को डालेगा. इनकर तो झोलिए पफटल है. इधर से डालिए उधर से झर जायेगा. इनकरा से तो अच्छा, तो एनोस एक्का, हरिणारायण राय, मधु कोड़ा के झोली भरेगा, तो गिरेगा भी नहीं. जैक के टाइम में भी इनकर बोरवे फट गया. इनको संभालने ही नहीं आता है. अब कोई केतना दिन तक इनके साथ ताता-थैया करेगा. अपने भी डूबेंगे और दूसरा को भी डूबाएंगे. सो इस बार इनका आगे दिल्ली में कोई घास नहीं डाल रहा है. बोलता है कि आपको घास चरने ही नहीं आता है, तो घास कौन डालेगा सो जाइए झारखंड मंे बैठकर हाय-झारखंड, हाय-झारखंड कह के राग अलापिए. गुरुजी सचमुच मंे गुरुघंटाल हैं, इनको का मिलेगा. उधर चारा घोटाला वाले बाबा, सौ करोड़ वाले कोड़ा को आगे कर दिए हैं और आशीर्वाद दिए कि जाओ अबकि मुख्यमंत्राी बनो और 100 पर एकगो शून्य लगा के हजार करोड़ के मालिक बनो. पर हमरा के भुला मत जाना. गुरुजी इ सब कर सकते हैं! नही न! उ तो इतना ढकलेल हैं कि उनका से अस्पताल में फाइल पर साइन करा कर ले गया और बेचारे रोते रह गये’’.इस पर हरिशंकर बाबू बोले, ‘‘अरे गुरुजी बेचारे झारखंड कब से बना रहे हैं. जैक बना था. याद है न. उ जैक वाला गाड़ी भी पंक्चर हो गया और जैक लगाके सड़क पर कबाड़ में टांग दिए फिर नया गाड़ी मिला. उ बचपन से बिमरिया निकला. एने घाव, ओने घाव, ओन फूंसी....खसरा से लेकर टीबी तक अब बेचारे गुरुजी का करे. कोन सा दवाई देवे. दवाई सुटे नहीं करता है. रिएक्शन कर जाता है’’.
बीच मे पलटनवा रोकते हुए बोलता है, ‘‘इ बार लगता है कि दिल्ली से हाई एंटिवायटिक लेके आयेंगे. टी.वी पर खबर सुनते हैं कि नहीं ...’’
  vijay ranjan 
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अंतिम अद्यतन (शुक्रवार, 05 जून 2009 15:22)

 
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