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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

मजदूरीनामा


१ मई अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस दुनिया भर में मजदूर के नाम पर मनाया जाता है। इस दिन को उन मजदूरों की याद में श्रद्धांजलिस्वरूप मनाया जाता है. इनकी लाशें पूंजीतियों एवं सामंतवादी विचारधारा के लोगों के द्वारा सिर्फ इस लिए बिछा दी गयीं थीं कि उन्होंने अपनी मेहनत के एवज में अपनी जायज मांगों को पूरा करने की मांग करने की हिमाकत दिखाया था. साधारनतः दिवसों को किसी खुशी अथवा गम के रूप में मनाया जाता है, मगर मजदूर दिवस गम के साथ-साथ एक ऐसे दिवस के रूप में मनया जाता है, जो हर साल दुनिया के मजदूरों के दिल और दिमाग को एक ऐसा एहसास दिलाता है कि तुम दबे रहो, कुचले रहो, तुम्हे अपनी उचित मांगों को मांगने का भी अधिकार नहीं है. तुम अपने खून-पसीनों को बहाते रहो. अमीरों की गुलामी करते रहो. पसीना बहाकर पानी छान कर लाकर बलवानों का पैर धेते रहो, तुम्हे दबे रहना है. तुम्हे कुचले रहना, तुम्हे अपना मुँह खोलने का अधिकार नहीं है. तुम सामंतो की केवल सेवा करते रहो, उन्हें खुश करते रहो, जिसके बदले में तुम्हारे सामने रोटी डाल दी जायेगी. तुम्हे जरा भी विरोध नहीं करना है. तुम सिर्फ सेवा करने के लिए ही बने हो. क्यों कि तुम ;मजदूर तो इन सामंतवादियों की दृष्टि में मनुष्य नहीं हो? तुम तो केवल हार-मांस के एक टूकड़े हो. तुम्हें इन अमीरों, बाहुबलियों की बराबरी क्यों और कैसे कर सकते हो. तुम तो कमजोर हो. और भला कमजोरों को खुश रहने का अधिकार है? क्या गरीबों को अपनी चाहतों को पूरा करने का अधिकार है? क्या मजदूरों को सामर्थवानों की बराबरी करने का अधिकार है? नहीं न! तुम स्वयं को मनुष्य होने की भूल क्यों करते हो. तुम अपनी औकात? में रहो. वरन् तुम जरा सा भी हिले, तुमने जरा भी अमीरों की बराबरी करने की कोेशिश की, तुमने जरा भी अपने अरमानों को पूरा करने का ख्वाब देखा, तो तुम्हें गोलियों से भून दिया जायेगा. एक मई हर वर्ष दुनिया के मजदूरों, गरीबों को याद दिलाता है कि तुम कितने उपेक्षित हो. तुम्हारा एक अलग घटिया? समाज है, तुम्हें सहानुभूति की, तुम्हें सहायता की, तुम्हें प्यार की, तुम्हें प्रशंसा की, तुम्हें ईनाम की, तुम्हें श्रेय की उमीद ही नहीं रखनी चाहिए. तुम्हें अपने अरमानों का गला घोंट देना है, तुम्हें अपनी इच्छाओं को मार देना है. यह दिवस याद दिलाता है कि मजदूर हमेशा मजदूर ही रहेगा. तभी तो आज भी मजदूरों की जिन्दगी में कोई बुनियादी फर्क नहीं हुआ है. थोडे़ से पैसे उन्हें अधिक अवश्य मिल जाते हैं, पर वर्तमान समय में रुपये के अवमूल्यन के हिसाब से वही कमाई है, जो पहले थी. वरन् आज मजदूर भी महलों में रहते. कारों में घूमते. उनके बच्चे भी आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर अमीरों की बराबरी कर सकते. परन्तु एक सोची समझी साजिश के तहत बरावरी और समानता के ढांेगी समाज के द्वारा उन्हें उतना ही दिया जाता है कि जिससे, वे किसी तरह अपने पेट को रूखे-सुखे अनाजों से भर लें. और आदि काल से एक सोची समझी साजिश के तहत उन्हें सुविधओं से वंचित करके रखा गया है. क्योंकि यदि मजदूर, गरीब रहेंगे, तभी अमीरों की अमीरी भी बनी रहेगी. गरीब हैं तभी अमीर भी हैं. अमीर अपनी अमीरी को कायम रखने के लिए गरीब की गरीबी का मोहताज है. वरन् यदि गरीब सुविधायुक्त हो जायेंगे, तो वो सुखी सम्पन्न हो जायंेगे. और जब वे सुखी सम्पन्न हो जायेंगे, सक्षम हो जायेंगे, तो वे गरीब मजदूर कहाँ रहेंगे. और यदि मजदूर गरीब नहीं रहेंगे, तो फिर अमीर कैसे अमीर रहेंगे. फिर उनकी सुखी फुटानियों को कौन वरदास्त करेगा. फिर उनकी सेवा में कौन लगा रहेगा. किसे फिर वे अपनी अमीरी शान व शौकत, धन दौलत को दिखायेंगे फिर उनसे कौन डरेगा? फिर वे किसे झूकायेंगे, किस पर रौब गाँठेंगें. इसीलिए मई दिवस एक सांकेतिक दिवस है, वास्तव में वर्ष का हरेक दिन मई दिवस है. हर दिन हजारों गरीब मजदूर सुविधा के अभाव में धन-दौलत के अभाव में मर रहे हैं. वस्तुतः अमीरों के हाथों अप्रत्येक्ष रूप से मारे जा रहे हैं, हाँ यह अलग बात है कि मई दिवस गोलियों की तरह नहीं आतीं हैं. उनकी मौतों की खबरें नहीं आतीं हैं. वह कहीं किसी अंधेरे कोने में सिसक-सिसक कर मर रहे हैं. न जाने कब ’’अंधेरे से कोन’’े से उनकी मौतों की आवाज आम लोगों के, सामर्थवानों के कानों से गुजर कर उकी अन्तर्रात्मा को झिंझोड़ेगी. न जाने कब उनकी जिन्दगी अंधेरे कोने से निकल कर उजाले में चमकेगी, पता नही!दुनिया के हर कोने में मजदूरों की दशा दैनीय है. उनके कल्याण हेतु सामंतवादियों धनवानों के द्वारा बस थोड़ी सी सहायता कर खाना पूर्ति कर दी जाती है. और उसमें भी सहानुभूति, अपनत्व, प्रेम की अपेक्षा एहसान का भाव अधिक होता है. मजदूर ही लूटे जाते हैं, सताये जाते हैं, मारे जाते हैं. धनवानों के द्वारा उन्हीं का अधिकार छिना जाता है और उल्टे उन्हीं पर एहसान भी थोपा जाता है. इतने वर्षों के बाद भी मजदूरों की स्थिति यथावत है. साल का हरेक दिवस मई दिवस बन कर रह गया है. इस लिए अब मई दिवस की सार्थकता खत्म हो गई है. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘‘अजब करते हो तुम यारों ये क्या बात करते हो, हमे ही लूटते हो और हमे खैरात करते हो’’
के .ई .सेम
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अंतिम अद्यतन (शुक्रवार, 05 जून 2009 21:39)

 
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चाँद जरा शरमाया था
झरती चाँदनी आँचल में लूँ 
श्रृंगारित हो गाया था
एम.ए. शर्मा ’सेहर’