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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

जूते की महिमा

  • जूता राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक है. आदि काल से ही जूते को हम सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. जूता आदमी को पहचान दिलाती है. आप कितने बड़े हैं, इसकी पहचान कराती है. यदि किसी को जूता मिल जाए, तो वह खुद को गौरवान्वित महसूस करता है. हजारों-लाखों लोग जूता पाने प्राप्त करने के लिए तरसते हैं. इसके लिए जुगाड़ लगाते रहते हैं. जैसा कि बड़े-बड़े सम्मानों में तरह-तरह के घपले होते हैं, राजनीति होती है, सेटिंग होती है, उसी तरह जूते पाने में नेताओं ने बाजी मार ली है. इनका लाॅबी इतना प्रभावशाली है कि दूसरे को लेने नहीं देते. इतिहासकारों को मत है कि जूते का आविष्कार भारत में हुआ था. आदि युग में इसे खाड़ाऊँ कहा जाता था. उस युग मे इसे भी खड़ाऊँ का इतना महत्व था कि मार्यादा पुरुषोत्तम राम अपना राजपाट राजमुकूट, वस्त्राभूषण सभी कुछ छोड़ गये पर खडाऊँ को नहीं छोड़ सके. छोटे भाई को जैसे ही पता चला कि खड़ाऊँ को लेते गये, तो भरत से रहा नहीं गया. वे पीछा करते हुए राम तक पहँच ही गये और खड़ाऊँ लेकर ही माने. आदि काल से आज तक इसके रूप और नाम बदलता गया. वर्तमान् में इसे चमरौधा जूता, जूता, जूती, सैंडल, स्लीपर, हवाई चप्पल के अलावा कई और नामों से भी जाने जाते हैं.
    जूता देश की सीमा पार कर विदेशों में भी पहँच गया है. दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के सबसे ऊँचे पद आसीन राष्ट्रपति जार्ज बुश (अब सेवानिवृत) को अपने कार्यों से जितनी प्रसिद्धि नहीं मिली, उससे कहीं ज्यादा प्रसिद्धि उन्हें जूते ने दिलाई. इस देश के नेता स्वीस बैंक मंे संपत्ति जमा करने में जितने लालायित रहते हैं, उससे कहीं ज्यादा लालायित जूता पाने में होते हैं. वैसे कुछ गिने-चुने भारतीय नेताओं को जूते मिले हैं, परन्तु इसके लिए लम्बी कतार है, जो नेता लम्बे समय तक जूते पाने का इंतजार नहीं कर सकते, वे अपने कार्यकत्र्तओं का सहारा ले रहे हैं. वे अपने ही कार्यकत्र्ताओं से अपनी ही सभा में जूते फिंकवाते हैं और रातों रात प्रसिद्धि पा लेते हैं. इसी से प्रेरणा पाकर बड़े-बड़े फिल्मी कलाकार, उद्योगपति आदि राजनीति में आने लगे हैं. करोडों-अरबों कमा कर क्या किया, जब जूते ही नहीं पड़े. राजनीति में आने से जूता पड़ने की गारंटी होती है.
    टिकट पाने के लिए छूटभैये नेता आलाकमान के जूते पर नाक रगड़ते हैं, तो कितने कर्मचारी पो्रमोशन के लिए बाॅस के जूते पर नाक रगड़ते मिल जायेंगे. एक समय था, जब देश की दिशा राजनीति तय करती थी. परन्तु आज जूता राजनीति की दिशा तय करती है. सारे नेता अपने अपने जूते एक अंधेरे कमरे में रख देते हैं. उन जूतों को विभिन्न खानों में रख दिया जाता है. जिस नेता के जूते जिस खाने में मिलते हैं, वही उसी दल को हो जाता है. इसी तरह का खेल समय-समय खेला जाता है. और जनता का भविष्य तय किया जाता है. वैसे चुनाव के पहले और चुनाव के बाद जूते बदलने की परम्परा कुछ दिनों से जारी है.
    कसी व्यक्ति की समाज में कितनी प्रतिष्ठा है, इसकी जाँच जूते से की जाती है. आप किसी फ्लैट में या आलिशान घरों में जायेंगे, तो सबसे पहले आपको एक रैक दिखेगा, जिसमें करीने से जूते सजे रहेंगे. जूते को देख कर आप उस आदमी की हैसियत का आकलन कर सकेंगे. आदमी घर से बाहर निकलता है, तो और कुछ करे या न करे अपना जूता जरूर चमकाता है. चमकता हुआ जूता न हो, तो आदमी का सिर शर्म से झूक जाता है. किसी पार्टी में जाते समय औरतें पेटीकोट भले ही कोई और कलर का पहन ले, पर सैंडील तो सूट के मैंचिग की पहनती है. एक समय था, जब लड़कियाँ छेड़छाड़ पर लड़कों पर चप्पल दे मारती थी, परन्तु अब जमाना बदल गया, लडकियाँ अपने-अपने ब्वाय फ्रेंड के बीच हर रात तूतिया बदलती है.
    सिर पे पगड़ी का महत्व जितना है, उतना ही महत्व पैर में जूते का है. इसी कारण लोग अपने सिर के पगड़ी को जूते पर रख देते हैं. वैसे पगड़ी उसी के पैरों पर रखते हैं, जिनके पैरों में जूते होते हैं. जूते के महत्व के कारण ही लोग औरतों को पाँव की जूती मानते हैं. जूते का महत्व जानना है, तो ट्रेनों में जाकर देखिए. लोग लाखों के सामान अपने वर्थ के नीचे छोड़ देते हैं, पर जूते को अपने सिर के नीचे दबा कर आराम से सोते हैं. मंदिर में भगवान के दर्शन करने के वक्त भले ही हाथ जोड़े खड़े होते है, पर उनका ध्यान भगवान से ज्यादा बाहर पड़े अपने जूते होता है. पता नहीं कब उनका जूता चोरी कर ले जाए.
    अरे हाँ! शादी के शुभ अवसर पर सालियाँ और कुछ चुराए या न चुराए, पर अपने जीजा के जूते जरूर चुराती है. और अपने दिल से तोल-मोल करती है.
    जूता को अंग्रेजी में शू कहते हैं. और यह ‘‘शो’’ का मतलब होता है दिखावा. इसलिए चेहरा चमकाने का क्रीम है, तो जूता चमकाने का भी क्रीम है. फैशन शो में कैटवाक करती हुई भद्र महिलाओं की देह पर कपड़े हो या न हो पर पैरों में जूती जरूर होती है. जूती के बिना कैटवाक हो ही नहीं सकता.
    जूते में शक्ति होती है. दैवी शक्ति. तभी तो लोग बुरी नजरे उतारने के लिए ट्रकों के पीछे जूते लटकाते है. जूता डराने-धमकाने के काम में भी आते हैं, तभी तो लोग घमकाते हुए लोग कहते हैं -मारेंगे चार जूता कि..... या फिर मारो तो साले को चार जूता. बड़े लोग अपने नौकरों को जूता फेंक कर मारते हैं. अच्छे कामों के लिए जूते का हार पहनाया जाता है. गरीबी और अमीरी की पहचान जूता कराती है. जिसके पाँच जूते नहीं व गरीब. मेरा एक सुझाव है कि गरीबी रेखा तय करते समय जूते को ध्यान में रखा जाए. गरीबी रेखा के नीचे वही होंगे, जिनके पाँव में जूते नहीं हांेगे. और उन्हें ही सरकार सुविधाएँ दें, जिस क्षेत्र में बिना जूते वाले लोगों की संख्या अधिक हो. उस क्षेत्र को आरक्षित कर दिया जाए और चुनाव में टिकट बिना जूते वाले को ही दिया जाए.
    फटे हुए कपड़े पहन कर आदमी रह लेता है. बासी रोटी खा कर आदमी रह सकता है, भूखे पेट रह सकता है, पर फटे हुए जूते के साथ एक कदम भी नहीं चल सकता. तभी तो बाजार से लेकर रेलवे स्टेशन, बस-स्टैंड हर जगह जूते मरम्मत की दुकान होती है.
    सुख शरीर के किसी अंग में नहीं होता न ही कपड़े में होता है, सुख होता है, आदमी के तलवे में तभी तो अपने जूते में सुखतल्ला लगवाता है और सुख प्राप्त करता है. यदि आदमी के पाँ में जूते हो और जूते में सुखतल्ला हो, तो उस आदमी से भाग्यशाली और कोई हो ही नहीं सकता.
    लेखक -विजय रंजन
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अंतिम अद्यतन (शुक्रवार, 05 जून 2009 21:48)

 
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पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खडी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पीते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता


"विजय रंजन"