
खोता हुआ पतित पावन गंगा का अस्तित्व
आखिर कौन है जिम्मेदार...?
-कुलदीप कुमार मिश्र
गंगा नदी हमारे जीवन का आधार व भारतीय संस्कृति- सभ्यता व धार्मिक आस्था का प्रतीक है। गंगा नदी को स्वर्ग से धरती पर लाने के लिये राजा भगीरथ ने बहुत घोर तप किया था। राजा के शापित पुत्रों को मां गंगा ने शाप मुक्त कर मोक्ष प्रदान किया। लेकिन वही गंगा आज ग्लोबल वार्मिंग तथा मानवीय गतिविधियों और कुकृत्यों के कारण इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि उसका अस्तित्व ही खो सा गया है। पतित पावन गंगा को लालची और अज्ञानी मानव ने अपने हित के लिये विषैले पदार्थ उसमे बहाकर इसको प्रदूषित कर दिया है।
आज गंगा सहित कई नदियों पर बांध तथा सुरंगे बनाकर उन्हें तेजी से उजाड़ा जा रहा है। इस मानवीय कृत्य से भू-कटाव, भूस्खलन आदि की स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। इससे भूकम्प की सम्भावना बढ़ सकती है।
आज उत्तराखण्ड में जल विद्युत परियोजनाओं पर काफी तेजी से कार्य हो रहा है। कई मायने में तथा बिजली की उत्पादन के आधार पर यह सही हो सकता है लेकिन पर्यावरण तथा स्वस्थ्य सहित कई सामाजिक मानकों के हिसाब से ये योजनाएं स्थानीय जनता तथा पर्यावरण के लिये शुभ नहीं हैं।
हमारा हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म का प्रत्येक व्यक्ति गंगा नदी में स्नान कर मोक्ष की कामना करता है। गंगा हमारी कामना को आकार देती हैं हमें मोक्ष दिलाती हैं। लेकिन आज हमारे अमानवीय भूलों व विकास की अन्धी दौड़ ने गंगा नदी के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
फैक्ट्रियों का गंदा पानी तथा उनके उत्पादन से बचा हुआ अवशिष्ट पदार्थ जो कि गंगा नदी में बहा दिया जाता है। सीवर लाइन का पानी, उसका भी रास्ता कहीं न कहीं से गंगा नदी को ही मिला दिया जाता है। जिससे गंगा नदी दिन प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है। यही कारण है कि गोमुख ग्लेशियर प्रतिवर्ष २० से ३० मीटर पीछे खिसक रहा है। यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं जब यह नदी पूरी तरह सूख जायेगी। आज गंगा नदी की स्थिति बहुत भयावह हो चुकी है। अगर बहुत जल्द इसके विषैले किये जाने पर कोई अंकुशनहीं लगाया तो गंगा नदी का नाम-ओ-निशान मिट जायेगा।
गंगा नदी के किनारे बसे शहरों की गन्दगी, मल-मूत्र तथा फैक्ट्रियों का विषैला-जहरीला पदार्थ, अधजले मानव व मवेशियों के अवशेष आदि जगह-जगह डाले जाते हैं। धार्मिक आयोजनों तथा पूजा आदि करने के बाद अतिधार्मिक तथा सहिष्णु लोग अपनी पूजा सामग्री तथा कूड़ा करकट आदि सब गंगा नदी में विसर्जित कर देते हैं। ये धार्मिक लोग अपने पापों का प्रायश्चित इन नदियों को गंदा करके करते हैं। अब हालात यह है कि गंगा नदी का पानी पीने लायक तक नहीं रह गया है। हरिद्वार में भी गंगा का पानी जिसको लोग पीने में हिचकिचाते हैं।
हमारे हिन्दू धर्म में गंगा नदी को पाप नाशिनी तथा मोक्षदायिनी कहा गया है। हो भी क्योंनहीं? गंगा नदी का जल कई वर्षों तक बोतल आदि में बन्द कर रखने से खराब नहीं होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि उत्तराखण्ड हिमालय से गंगा नदी में जड़ी-बूटियों के रसायनिक तत्व बहकर आते हैं जिस कारण गंगा का जल दशकों तक भी खराब नहीं होता है। लेकिन आज यह नही काफी प्रदूषित हो चुकी है। गंगा नदी ही क्या ऐसी बहुत सी नदियां हैं जो कि प्रदूषित हो चुकी हैं। एक आंकलन के अनुसार उनमें से कई नदियों का अस्तित्व संकट में है। उनमें गंगा नदी भी एक है।
एक अनुमान के अनुसार १९३५ से लेकर १९५० तक इस ग्लेशियर की पिघलने की दर सामान्य थी लेकिन १९५२ के बाद यह क्रम लगातार बढ़ता गया और सबसे अधिक १९९४ से २००८ के बीच यह ग्लेशियर पिघला। जिसके गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष २५ से ३० मीटर पीछे खिसक रहा है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले बीस सालों में मध्य हिमालय से निकलने वाली छोड़ी-बड़ी नदियां सूख जायेंगी और कई नदियों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा।
गंगा नदी की सफाई तथा प्रदूषण मुक्त बनाने की कवायद पर अब तक लगभग २२ करोड़ खर्च किये जा चुके हैं। लेकिन गंगा का प्रदूषण अभी तक कम नहीं हो पाया है। अगर समय रहते गंगा सहित तमाम नदियों को बचाया नहीं गया तो वह दिन दूर नहीं है जब ये नदियां पूरी तरह से सूख जायेंगी जिससे मानव सहित तमाम जीव जगत का अस्तित्व भी संकट में पड़ जायेगा। क्योंकि नदियों के बिना हम अधिक समये तक जीवित नहीं रह सकते हैं। इसलिये समय रहते ईमानदारी पूर्वक इन नदियों को बचाया जाना चाहिये। विकास की अवधारणा सकारात्मक होनी चाहिए, विकास के नाम पर प्रकृति को छिन्न-भिन्न करना सही नहीं है। हम विकास विरोधी बात नहीं कह रहे हैं लेकिन उस विकास से क्या फायदा जिससे मानवीय सभ्यता पर ही संकट मंडऱाता रहे।