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नवम्‍बर  2009
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आखिर कौन है जिम्मेदार...?

खोता हुआ पतित पावन गंगा का अस्तित्व
आखिर कौन है जिम्मेदार...?
-कुलदीप कुमार मिश्र
गंगा नदी हमारे जीवन का आधार व भारतीय संस्कृति- सभ्यता व धार्मिक आस्था का प्रतीक है। गंगा नदी को स्वर्ग से धरती पर लाने के लिये राजा भगीरथ ने बहुत घोर तप किया था। राजा के शापित पुत्रों को मां गंगा ने शाप मुक्त कर मोक्ष प्रदान किया। लेकिन वही गंगा आज ग्लोबल वार्मिंग  तथा मानवीय गतिविधियों और कुकृत्यों के कारण इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि उसका अस्तित्व ही खो सा गया है। पतित  पावन गंगा को लालची और अज्ञानी मानव ने अपने हित के लिये विषैले पदार्थ उसमे बहाकर इसको प्रदूषित कर दिया है।


आज गंगा सहित कई नदियों पर बांध तथा सुरंगे बनाकर उन्हें तेजी से उजाड़ा जा रहा है। इस मानवीय कृत्य से भू-कटाव, भूस्खलन आदि की स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। इससे भूकम्प की सम्भावना बढ़ सकती है।
आज उत्तराखण्ड में जल विद्युत परियोजनाओं पर काफी तेजी से कार्य हो रहा है। कई मायने में तथा बिजली की उत्पादन के आधार पर यह सही हो सकता है लेकिन पर्यावरण तथा स्वस्थ्य सहित कई सामाजिक मानकों के हिसाब से ये योजनाएं स्थानीय जनता तथा पर्यावरण के लिये शुभ नहीं हैं।
हमारा हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म का प्रत्येक व्यक्ति गंगा नदी में स्नान कर मोक्ष की कामना करता है। गंगा हमारी कामना को आकार देती हैं हमें मोक्ष दिलाती हैं। लेकिन आज हमारे अमानवीय भूलों व विकास की अन्धी दौड़ ने गंगा नदी के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
फैक्ट्रियों का गंदा पानी तथा उनके उत्पादन से बचा हुआ अवशिष्ट पदार्थ जो कि गंगा नदी में बहा दिया जाता है। सीवर लाइन का पानी, उसका भी रास्ता कहीं न कहीं से  गंगा नदी को ही मिला दिया जाता है। जिससे गंगा नदी दिन प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है। यही कारण है कि गोमुख ग्लेशियर प्रतिवर्ष २० से ३० मीटर पीछे खिसक रहा है। यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं जब यह नदी पूरी तरह सूख जायेगी। आज गंगा नदी की स्थिति बहुत भयावह हो चुकी है। अगर बहुत जल्द इसके विषैले किये जाने पर कोई अंकुशनहीं लगाया तो गंगा नदी का नाम-ओ-निशान मिट जायेगा।
गंगा नदी के किनारे बसे शहरों की गन्दगी, मल-मूत्र तथा फैक्ट्रियों का विषैला-जहरीला पदार्थ, अधजले मानव व मवेशियों के अवशेष आदि जगह-जगह डाले जाते हैं। धार्मिक आयोजनों तथा पूजा आदि करने के बाद अतिधार्मिक तथा सहिष्णु लोग अपनी पूजा सामग्री तथा कूड़ा करकट आदि सब गंगा नदी में विसर्जित कर देते हैं। ये धार्मिक लोग अपने पापों का प्रायश्चित इन नदियों को गंदा करके करते हैं। अब हालात यह है कि गंगा नदी का पानी पीने लायक तक नहीं रह गया है। हरिद्वार में भी गंगा का पानी जिसको लोग पीने में हिचकिचाते हैं।
हमारे हिन्दू धर्म में गंगा नदी को पाप नाशिनी तथा मोक्षदायिनी कहा गया है। हो भी क्योंनहीं? गंगा नदी का जल कई वर्षों तक बोतल आदि में बन्द कर रखने से खराब नहीं होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि उत्तराखण्ड हिमालय से गंगा नदी में जड़ी-बूटियों के रसायनिक तत्व बहकर आते हैं जिस कारण गंगा का जल दशकों तक भी खराब नहीं होता है। लेकिन आज यह नही काफी प्रदूषित हो चुकी है। गंगा नदी ही क्या ऐसी बहुत सी नदियां हैं जो कि प्रदूषित हो चुकी हैं। एक आंकलन के अनुसार उनमें से कई नदियों का अस्तित्व संकट में है। उनमें गंगा नदी भी एक है।
एक अनुमान के अनुसार १९३५ से लेकर १९५० तक इस ग्लेशियर की पिघलने की दर सामान्य थी लेकिन १९५२ के बाद यह क्रम लगातार बढ़ता गया और सबसे अधिक १९९४ से २००८ के बीच यह ग्लेशियर पिघला। जिसके गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष २५ से ३० मीटर पीछे खिसक रहा है। अगर यही हाल रहा तो आने वाले बीस सालों में मध्य हिमालय से निकलने वाली छोड़ी-बड़ी नदियां सूख जायेंगी और कई नदियों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा।
गंगा नदी की सफाई तथा प्रदूषण मुक्त बनाने की कवायद पर अब तक लगभग २२ करोड़ खर्च किये जा चुके हैं। लेकिन गंगा का प्रदूषण अभी तक कम नहीं हो पाया है। अगर समय रहते गंगा सहित तमाम नदियों को बचाया नहीं गया तो वह दिन दूर नहीं है जब ये नदियां पूरी तरह से सूख जायेंगी जिससे मानव सहित तमाम जीव जगत का अस्तित्व भी संकट में पड़ जायेगा। क्योंकि नदियों के बिना हम अधिक समये तक जीवित नहीं रह सकते हैं। इसलिये समय रहते ईमानदारी पूर्वक इन नदियों को बचाया जाना चाहिये। विकास की अवधारणा सकारात्मक होनी चाहिए, विकास के नाम पर प्रकृति को छिन्न-भिन्न करना सही नहीं है। हम विकास विरोधी बात नहीं कह रहे हैं लेकिन उस विकास से क्या फायदा जिससे मानवीय सभ्यता पर ही संकट मंडऱाता रहे।

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अंतिम अद्यतन (सोमवार, 20 जुलाई 2009 20:39)

 
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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन