magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

आइये हम बलात्कार के लिए प्रस्तुत हैं.

आइये, हम बलात्कार के लिए प्रस्तुत हैं. छाम्मक्छल्लो फिर से बहुत प्रसन्न है. वह प्रसन्न है कि माननीय उच्चतम न्यालालय ने एक मानसिक रूप से विकलांग लड़की के माँ बनाने के अधिकार को सुरक्षित रखा. वह लड़की माँ इसलिए नही बन रही है कि उसकी शादी हुई है और विवाह बंधन में बंध कर वह माँ बनने जा रही है. जी नहीं, हमारा समाज इतना उदार नही है कि वह किसी भी लड़की से अपने होनहार, बीरावान के हाथ पीले कर दे, न ही हमारे ऐसे वीर-बाँकुरे हैं जो इस तरह की लड़कियों के हाथ थाम ले. गिने-चुने उदाहरण हो सकते हैं. मगर यह हमारा देश और इसके नागरिक जबरन कुछ भी लेने में अपनी वीरता समझते हैं. चाहे वह किसी का कुमारी हो, किसी का मान हनन हो या कुछ और. अखबार में छपी खबर के मुताबिक वह लड़की चंडीगढ़ के नारी-निकेतन में रहती थी और वहा उसके साथ रैप किया गया. यह कितनी खुशी की बात है. रक्षण स्थान पर शिकार!


 शिकारी कितने वीर-भाव से वहा गया होगा औए उसने उस लड़की को अपना निशाना बनाया होगा. वह उतने ही उन्नत भाव से वहां गया होगा कि वह लड़की तो मानसिक रूप से विकलांग है. अगर उसकी अपनी भाषा में कहें तो पागल. पागल लड़की को पत्नी नही बना सकते, मगर उसे भोग तो सकते ही हैं. उसने यह भी दया दिखाई होगी की उस बिचारी से कोई शादी तो करनेवाला है नही, तो बिचारी जन्म भर ऐसे ही इस एक सुख से वंचित रह जायेगी. तो क्यों न एक पंथ दो काज किये जाएँ. उस लड़की की आत्मा की भी शान्ति और अपनी वासना की भी पूर्ति.
अब यह दूसरी बात हो गई की उन महानुभाव के कृत्य के कारण लड़की बिचारी गर्भवती हो गई. लड़कियां भी बड़ी उर्वरक होती हैं. (सरकार को कही तो रोक लगानी चाहिए). जहां रोक लगाने की बात है, सरकार इतने एड्स के डर दिखाती है, उससे बचने के किये कंडोम के इस्तेमाल.

 विभा रानी  http://chhammakchhallokahis.blogspot.com/

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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन