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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

मजदूर बनाम कामगार

म जदूरी शब्द स्वयं में ही बड़ा त्रासदी भरा शब्द है. और उसके साथ जब बाल लग जाए तब तो फिर वह और भी मार्मिक बन जाता है. यहाँ यह बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि काम और मजदूरी दोनो में बड़ा फर्क है. सतही तौर पर देखने से तो यह कहा जा सकता है कि जो काम करता है.वह मजदूरी करता है और दुनिया का लगभग हर व्यक्ति किसी ने किसी रूप में कार्य रत् होता है. अर्थात् इस हिसाब से दुनिया का हर व्यक्ति मजदूर हो गया. परन्तु इस विषय वस्तु की गहराई में जाकर इस पर दृष्टिपात किया जाये, तो यह स्पष्ट हो पायेगी कि हर व्यक्ति मजदूर नहीं है. क्योंकि कार्य और मजदूरी इन दोनों का यदि अलग-अलग विश्लेषण किया जाये, तो हमें पता चलेगा कि इन दोनों में बड़ा भेद है. साधारणतः कार्य वह होता है, जो व्यक्ति विशेष के द्वारा किया जाता है. जिसमें श्रम लगता है, समय लगता है, शारीरिक या मानसिक ऊर्जा लगती है, अनेक में धन भी लगता है.

मजदूरी में भी घन को छोड़ कर करीब-करीब इन्हीं चीजों की आवश्यकता अथवा खपत होती है. मगर इन दोनों के बीच जो सबसे बड़ा फर्क होता है, वह यह होता है कि मजदूरी में हमेशा अधीनता पायी जाती है, जबकि काम में ऐसी बात नहीं होती है.

उपर्युक्त शर्तों को यदि पूरा कर दिया जाये, तो काम बन जाता है. अर्थात् उसे कार्य की संज्ञा दी जा सकती है. और कार्य करने वाले को कामगार कहा जा सकता है.परन्तु मजदूरी उसे कहते हैं, जिसमें कार्यरत् व्यक्ति अथवा कामगार किसी के अधीन हो, उसके कार्य में प्राधीनता की स्थिति हो अर्थात् वह व्यक्ति जो मजदूरी करता है, वह हमेशा किसी के लिए या किसी के अधीन काम करता है. किसी के मातहत कार्य करता है. किसी के हुक्म पर काम करता है. किसी के आदेशानुसार काम करता है. साधरणतः उसे स्वयं निर्णय लेने की स्वाधीनता नहीं रहती. और यदि वह निर्णय लेता भी है, तो उसे उसका जवाब देना पड़ता है. जिसके मातहत या जिसके लिए काम करता है, उसके प्रति उसकी जवाबदेही हमेशा बनी रहती है. मजदूर हमेशा किसी के लिए काम करता है, वहीं कामगारों के साथ ऐसी विवशता नहीं देखी जाती.

काम तो दोनों करते हैं, मजदूर भी और कामगार भी. मगर मजदूरों के साथ प्राधीनता की स्थिति बनी रहती है, जबकि कामगारों के साथ स्वाधीनता की स्थिति होती है.

इस प्रकार देखा जाये, तो यह बात स्पष्ट होती है कि मजदूरी का दूसरा नाम गुलामी है. मजदूर हमेशा कार्य (मजदूरी) करते हुए दूसरों का गुलाम बना रहता है. शायद यही मानसिकता एवं कारण है कि प्रायः लोग मजदूरी (कार्य) करते हुए अपने बॉस अर्थात् जिसके अन्तर्गत वे काम (मजदूरी) करते हैं, उन्हें मालिक कह कर पुकारते हैं. आम बोलचाल की भाषा में वे अपने बॉस को मालिक कह कर संबोधित करते हैं. मालिक केवल परमात्मा, गॉड ही हो सकता है. क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के अधीन है, मालिक कहलाने का अधिकारी सिर्फ परमेश्वर है.पर चूंकि मजदूरी में भी लोग स्वयं को दूसरे के अधीन पाते हैंं, इसलिए वे सामान्यतः अपने बॉस को मालिक का संज्ञा दे बैठते हैं. यह शब्द उनके मुख से यूँ ही नहीं निकलता, बल्कि उनके इस संबोधन के नेपथ्य में वही गुलामी और पराधीनता की मानसिकता काम करती है. वस्तुतः दूसरों से नौकरी करवाने या दूसरों को नौकरी पर रखने के पीछे भी लोगों में वही गुलामी की मानसिकता का प्रभाव हावी रहता है.

अतः लोगों को यदि सच्चे दिल से समाज में एकरूपता एवं समानता लाने की चाहत है, तो उन्हें इस मजदूरी की प्रथा को समाप्त कर देना चाहिए, पर यह प्रथा तो क्या समाप्त होगी उल्टे उसमें और वृद्धि ही हो रही है. त्रासदी यह  है कि छोटे-छोटे  मासूम बच्चों को भी नहीं बख्शा जाता. आज दुनिया भर मंे बड़ी संख्या में बाल मजदूर देखे जाते हैं. हालांकि बाल मजदूरी के विरूद्ध सरकार एवं सामाजिक संगठनों के द्वारा अभियान चलाने का नाटक किया जाता है, पर सरकार एवं निजी संस्थाओं के जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोगों के घरों एवं कार्यालयों में भी छोटे-छोटे मासूम बच्चे धड़ल्ले से मजदूरी (कार्य) करते हुए देखे जाते हैं. लोगों को यह भी एहसास नहीं है कि आखिर इन बच्चों का भविष्य क्या होगा. अपने बच्चों के लिए सारी सुविधा उपलब्ध करवाने एवं उन्हें अंग्रेजी स्कूलों, बड़े नामी संस्थाओं में पढ़ाने के साथ-साथ अन्य मनोरंजन की सुविधा मुहैया कराने के लिए बेताब ऐसे लोग क्या कभी सोचते हैं कि इन गरीब बेसहारा नौनिहालो का भविष्य भी होता है. उन्हें भी कालचक्र की सीढ़ियों को चढ़ते हुए ही भविष्य की अंधेरी गलियों से होकर अपना रास्ता तलाशना है. मगर नहीं अधिकतर लोग ऐसा नहीं सोचते. क्योंकि उनके अन्दर तो स्वार्थ की मानसिकता ने  पैठ जमा लिया है. वे क्यों दूसरों के लिए सोच कर अपना बहुमूल्य समय एवं ऊर्जा बरबाद करंेगे.

देश और समाज को यदि सुधारना है, तो पहले बच्चों के भविष्य को सँवारना होगा, मगर यह सोचने की फुर्सत किसे है. सभी अपने में ही मगन हैं. दूसरों से क्या लेना-देना. आज विडम्बना यह है कि हर गाँव शहर में बाल मजदूर नजर आते हैं. लोग उनसे बेझिझक मजदूरी करवाते हंै. इन छोटे मासूमों का भविष्य अंधेरे कोने में गुम हो गया है. पता नहीं लोग कब इस विषय में व्यापक रूप से संवेदनशील होंगे? पता नहीं कब इन मासूमों का भविष्य अंधेरे कोने से निकल कर बाहर आकर चमके्रगा?

जब तक लोगों के द्वारा इसे सामजिक अभिशाप समझकर दूर करने का काम नहीं किया जायेगा, तब तक इन सामाजिक कुरीतियों को नहीं सुधारा जा सकता है. केवल कानून बनाने और कागजी खानापूर्ति करने से काम नहीं चलेगा. इस अभियान को धरातल में लाकर व्यवहारिक रूप देना होगा. तभी लाखों बालकों के भविष्य को सुधारा जा सकेगा.

के.ई. सैम 

 

 

 

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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन