उच्चतम न्यायालय ने निजी विद्यालयों में मनमाने ढंग से फिस वृद्धि में रोक लगा कर निश्चित रूप से एक प्रसंशनीय कार्य किया है. पूर्व के अपने ही फैसले को कायम रखते हुए न्यायालय के द्वारा यह आदेश पारित किया गया कि अब भविष्य में निजी विद्यालय मनमाने ढंग से फिस में बढोत्तरी नहीं कर सकेंगे. ऐसा कर माननीय न्यायाधीशों ने अत्यंत ही न्यायपूर्ण, विवेकपूर्ण एवं लोकप्रिय कार्य किया है. यह फैसला ठीक उसी समय आया, जब लोकसभा में शिक्षा के अधिकार का बिल पास हुआ. अतः यह कहा जा सकता है कि ऐसे भाग्यशाली क्षण् देश में कभी-कभी ही आते हैं. जब लोकतंत्र के एक से अधिक खम्बे लोकहित के प्रति एक साथ गंभीर दिखते हैं. एक ओर जहाँ विधायिका ने देश के नौनिहालों के भविष्य के प्रति सजगता दिखा कर उन्हें शिक्षा के मौलिक अधिकार की सुविधा उपलब्ध करवाई, वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका ने निजी स्कूलों के व्यावसायिकरण पर लगाम कसने का काम किया है. जिससे देश के गरीब एवं आम जनता के बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में आसानी होगी. इन कार्या के लिए विधायिका और न्यायपालिका बधाई के पात्र हैं
. शिक्षा जो जीवन के लिए अत्यंत अनिवार्य है, आज देश में एक अतिलाभदायक व्यावसाय का रूप ले चुका है. साक्षरता एवं समाज सेवा के नाम पर लोग शिक्षण संस्थाएँ खोल कर गरीबों को लूट रहे हैं. हलांकि कुछ ऐसे शिक्षण संस्थान भी हैं, जो निस्वार्थ और लगन से मानव सेवा में लगे हुए हैं, मगर अधिकतर शिक्षण संस्थानों के कार्यकलापों, उनकी कार्यशैली अवस्था एवं स्थिति को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि किस प्रकार वे शिक्षण संस्थाएँ शिक्षा और आदर्श के नाम पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं. अनेक शिक्षण संस्थाओं में धूर्त लोगों का जमावड़ा है. साथ ही साथ इनका अपना अलग एक गुट भी हैं, ऐसे निजी संस्थाएँ अपने स्वार्थ सिद्धि हेतु आपस में तालमेल बैठाकर एक दूसरे की मदद भी करते हैं. यदि कोई भुक्त भोगी, अभिभावक अथवा अन्य इनके विरूद्ध आवाज उठाता है, तो ये तत्परता दिखाते हुए एक जूट हो कर आन्दोलन चलाना शुरू कर देते हैं, जिसमें संस्थानों को अनिश्चितकालीन बंद करने से लेकर गरुओं के प्रति अनादर की पारंपरिक एवं नैतिक भावनात्मक अत्याचार तक शामिल होता है. बच्चों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले शिक्षकों की भी आज कमी नहीं है. शिक्षकांे एवं शिक्षण संस्थानों से संबंधिता व्यक्तियों की गैरजिम्मेदराना हरकतों की खबरें आज आम बात हो गई हैं. यहाँ तक कि कई विद्यार्थी इनसे तंग आकर आत्महत्या तक कर चुके हैं अथवा मानसिक रोगी हो गये हैं. निश्चित रूप से उच्चतम न्यायालय ने ऐसे धूर्त संस्थानों पर मनमाने ढंग से शिक्षा के व्यापार करने पर रोक लगाकर प्रशंसनीय किया है. केन्द्र सरकार ने भी शिक्षा के अधिकार बिल को पास कर गरीबों के लिए भलाई का काम किया है. परन्तु इस मुद्दे पर जो सबसे गंभीर बात है, वह यह है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर एवं दूसरी सुविधओं को बेहतर बनाना होगा. सरकारी अफसरों एवं दलालों के गठजोड़ को खत्म कर शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार लाना होगा. सरकार स्कूलों में शिक्षा का निम्न स्तर एवं शिक्षकों की कार्य के प्रति लापरवाही के कारण ही लोग मजबूर हो कर निजी संस्थानों
की ओर आकर्षित होते हैं, जिनका अनुचित लाभ निजी शिक्षण संस्थाएँ उठाती हैं. देश की अनेक सरकारी शिक्षण संस्थानें खंडहर का रूप ले चुकी हैं, जहाँ करोड़ों रुपयें के उपस्कर (फनिचर्स), और दूसरी चीजें सड़ गयी हैं. जिन पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है. आवश्यकता है, उनके पुनुरूद्धार की देश के सुनहरे भविष्य के लिए सरकार को शिक्षा के प्रति गंभीर प्रवृति का प्रदर्शन करना होगा, जिससे कि आने वाली नस्लों को हम एक कुशल और बेहतर वातावरण उपलब्ध करवा सकें ताकि विकास और प्रतिस्पर्धा के इस युग में वे देश का नाम सफलतापूर्वक रौशन कर सकें. के. ई. सैम