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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

जब इंसान लाचार होता है

मां-बाप अपने बच्चों के लिए क्या नहीं करते,  लेकिन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक परिवार ऐसा भी है जो अपनी बच्ची की जिंदगी बचाने के लिए अपनी किड़नी बेचना चाहता है... इसके लिए उसने सरकार से गुहार भी लगाई है अंकुर विजयवर्गीय, भोपाल की एक खास रिपोर्ट....

इस मासूम की आंखों में कुछ सपने हैं... ये भी कुछ करना चाहती है... अपने मां-बाप का नाम जहां में रोशन करना चाहती है, लेकिन कुदरत को इसकी इच्छाओं से ज्यादा वास्ता नहीं है ये दौड़ तो सकती है लेकिन बहुत जल्दी थक जाती है इसे जिन्दा रहने के लिए हर हफ्ते खून की जरूरत होती है. असल में ये बच्ची थैलीसीमिया नाम की एक बीमारी से

 

पीड़ित है... 12 साल की दिव्या को बचपन से ही ये बीमारी है... जिन्दा रहने के लिए उसे हर हफ्ते एक यूनिट खून की जरूरत होती है... लेकिन इसके परिवार की हालात ऐसी हो चुकी हैं कि अब उसे खून चढ़वाने की स्थिति में वो नहीं हैं... भोपाल में दिव्या अपने मां-बाप और दो भाईयों के साथ रहती है... अपनी बेटी को जिन्दा रखने के लिए इसके मां-बाप ने नया तरीका निकाला है जिसे सुनकर शायद आपके रौंगटे खड़े हो जाए... दिव्या के मां-बाप अपनी बच्ची के जीवन के लिए अपनी किडनी बेचना चाहते हैं... इसके लिए उन्होंने सरकार से इजाजत भी मांगी है... दिव्या की मां का कहना है कि अब उनके पास इसके अलावा कोई ओर रास्ता नहीं है...इस बीमारी से जूझ रही दिव्या के हौंसले इसके बाद भी कम नहीं हुए है... वो स्कूल नहीं जाती लेकिन घर पर ही अपने भाईयों की मदद से पढ़ाई करती है... साथ ही साथ वह आगे चलकर डॉक्टर भी बनना चाहती है...प्रदेश में लड़कियो और महिलाओं के बीच मामा और भाई के रूप में प्रसिद्ध मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान को इस रिश्‍ते  को निभाने से पहले दिव्या के दर्द को जरूर समझना होगा....
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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन