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नवम्‍बर  2009
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गांधीजी पर विशेष लेख

माहात्मा गांधी के आर्थिक विचार

नागेन्द्र  प्रसाद  

दो अक्तूबर 1869 को उस महापुरुष का जन्म पोरबन्दर में हुआ, जिन्होंने भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्त कर आजाद कराया। इनकी प्रारंभिक शिक्षा भारत तथा उच्च शिक्षा इग्लैंड में हुई। बैरिस्ट्री पास कर भारत आए, तो देश सेवा एवं समाज सेवा में लग गए। गांधीजी के नेतृत्व में देश आन्दोलित हुआ और अहिंसा परमो धर्मः के रास्ते पर चलकर भारत ने दुनिया को एक नई दृष्टि दी। गांधीजी के ऊपर विभिन्न धर्मों एवं संतों का व्यापक प्रभाव पड़ा। उन्हांेने ईसाई धर्म से प्रेम और सेवा का पाठ सीखा, तो जैन धर्म से अहिंसा ग्रहण की।

 उसी प्रकार हिन्दू धर्म की आध्यात्मिकता उनका जीवन आधार था। गांधीजी पर आधुनिक भारत के रानाडे, गोखले, तिलक, टालस्टाय तथा रस्किन का प्रभाव पड़ा। माहात्मा गांधी अपने आप में कई व्यक्तित्व से भरे पड़े थे। वे एक महान राजनीतिज्ञ, विचारक, संत एवं अर्थशास्त्री थे। गांधी क ेविचार भारतीय आचार-विचार एवं यहाँ के परिस्थितियों के आधार पर अवलम्बित थे। उन्होंने सबसे पहले ग्राम स्वाराज की बात कही। उनका तक था कि अर्थव्यवस्था में गाँवों की प्रधानता हो। गाँव एक परिवार सा हो, उसे कोई भेद-भाव न रहे। परस्पर वे एक दूसरे की सहायता करे तथा प्रत्येक की समस्या को सबकी समस्या समझकर समाधान करें। उन्होंने श्रम के महत्व को विशेष बल दिया। गांधीजी के अनुसार श्रम अत्यंत ही पवित्र वस्तु है। कोई कार्य छोटा नहीं होता, प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कितना ही महत्वपूर्ण व उचे पद पर क्यों न हो उसे घंट दो घंटा शारीरिक श्रम अवश्य करना चाहिए। देश के चहुमुखी विकास के लिए जहाँ बुुद्धिबल की आवश्यकता है उससे कहीं अधिक श्रम बल की आवश्यकता है। देश को आत्मनिर्भर बनाना उनका एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था। इसके लिए उन्होंने कहा था, ‘‘हमें अपनी आवश्यकतओं की पूर्ति स्वयं करनी चाहिए। किसी भी देश के भरोसे, अपनी अर्थव्यवस्था को कदापि टिकाए नहीं रह सकते।’’ गांधीजी हमेशा कहा करते थे कि यदि लक्ष्य पाक-साफ है, तो उसे प्राप्त करने का साधन भी उतना ही पवित्र होना चाहिए। दूषित साधन से पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती है। उनके अनुसार सत्य की स्थापना असत्य द्वारा, अहिंसा की हिंसा द्वारा तथा प्रेम की घृणा द्वारा नहीं की जासकती है। यदि हम हिंसा से अहिंसक समाज लाना चाहते हैं, तो यह संभव नहीं है, क्यों कि इससे हिंसा का ही महत्व समाज में बढ़ता है।गांधीजी ट्रस्टीशीपका सिद्धांत दिया। उनकी राय में धन समाज का है, व्यक्ति का नहीं। जो धन जब तक व्यक्ति के पास है, उसका नियंत्रणकत्र्ता एंव देख-रेख व प्रयोग करने वाला है। व्यक्ति को उससे आसक्त नहीं होना चाहिए। यदि उस सिद्धांत को मान लिया जाता और समाज में आर्थिक गैर बराबरी नहीं रहती, तो आज उग्रवाद सर चढ़कर नहीं बोलता। गाधीजी यंत्रीकरण के विरोधी थे, क्योंकि भारत में श्रम का बहुतायत है। इस संदर्भ में उन्होंने लिख है कि मशीनेआधुनिकक सभ्यता का प्रतीक हैं और एक बडे़े पाप का प्रमाण है। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि काम करने वालों की कमी हो, तो मशीनें अच्छी मानी जा सकती हैं, परन्तु यदि काम करने वाले आवश्यकता से अधिक हो, तो मशीनें खराब हैं। गांधीजी छोटे उद्योग धंधे को अधिक महत्वपूर्ण समझते थे। उनका मानना था कि भारत जैसे विशाल देश में लघु उद्योग के बिना रोजगार की समस्या हल भी नहीं हो सकती है। उद्योग के लिए पूंजी और श्रम आवश्यक साधन है। जिन देशों में श्रमशक्ति का अभाव है, वे उद्योग धंधों में अधिक पूंजी तथा श्रम कम लगाना चाहेंगे। लेकिन भारत की स्थिति उससे ठीक विपरीत है। गांधीजी सर्वोदय के समर्थक थे। उसमें गरीब और दलित व्यक्तियों को सबसे पहले उठाने का प्रयास करना है। सर्वोदय का आधार आध्यात्मिकता है। यह ईश्वर तथा आत्मा में आस्था रखता है। परन्तु यह आधार दुराग्रह एवं कट्टरता से मुक्त है। प्रत्येक धर्म को मानने वाले यहाँ तक कि नास्तिक के लिए सर्वोदय के मंच पर स्थान है। गांधीजी के अनुसार सत्य ही ईश्वर है। सत्य साध्य है तथा अन्य सब चीजें साधन हैं। साधन को पवित्र बनाने के लिए अहिंसा प्रथम सिद्धांत और प्रेम दूसरा। इस प्रकार गांधी के दर्शन का मूलमंत्र सत्य, अहिंसा और प्रेम था। तभी तो प्रसिद्ध लेखक रामा रोलांड ने गांधीजी को आधुनिक ईसामसीह कहा था।

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अंतिम अद्यतन (रविवार, 25 अक्टूबर 2009 21:46)

 
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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन