गांधीजी पर विशेष लेख
माहात्मा गांधी के आर्थिक विचार
नागेन्द्र प्रसाद

दो अक्तूबर 1869 को उस महापुरुष का जन्म पोरबन्दर में हुआ, जिन्होंने भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्त कर आजाद कराया। इनकी प्रारंभिक शिक्षा भारत तथा उच्च शिक्षा इग्लैंड में हुई। बैरिस्ट्री पास कर भारत आए, तो देश सेवा एवं समाज सेवा में लग गए। गांधीजी के नेतृत्व में देश आन्दोलित हुआ और अहिंसा परमो धर्मः के रास्ते पर चलकर भारत ने दुनिया को एक नई दृष्टि दी। गांधीजी के ऊपर विभिन्न धर्मों एवं संतों का व्यापक प्रभाव पड़ा। उन्हांेने ईसाई धर्म से प्रेम और सेवा का पाठ सीखा, तो जैन धर्म से अहिंसा ग्रहण की।
उसी प्रकार हिन्दू धर्म की आध्यात्मिकता उनका जीवन आधार था। गांधीजी पर आधुनिक भारत के रानाडे, गोखले, तिलक, टालस्टाय तथा रस्किन का प्रभाव पड़ा। माहात्मा गांधी अपने आप में कई व्यक्तित्व से भरे पड़े थे। वे एक महान राजनीतिज्ञ, विचारक, संत एवं अर्थशास्त्री थे। गांधी क ेविचार भारतीय आचार-विचार एवं यहाँ के परिस्थितियों के आधार पर अवलम्बित थे। उन्होंने सबसे पहले ग्राम स्वाराज की बात कही। उनका तक था कि अर्थव्यवस्था में गाँवों की प्रधानता हो। गाँव एक परिवार सा हो, उसे कोई भेद-भाव न रहे। परस्पर वे एक दूसरे की सहायता करे तथा प्रत्येक की समस्या को सबकी समस्या समझकर समाधान करें। उन्होंने श्रम के महत्व को विशेष बल दिया। गांधीजी के अनुसार श्रम अत्यंत ही पवित्र वस्तु है। कोई कार्य छोटा नहीं होता, प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वह कितना ही महत्वपूर्ण व उचे पद पर क्यों न हो उसे घंट दो घंटा शारीरिक श्रम अवश्य करना चाहिए। देश के चहुमुखी विकास के लिए जहाँ बुुद्धिबल की आवश्यकता है उससे कहीं अधिक श्रम बल की आवश्यकता है। देश को आत्मनिर्भर बनाना उनका एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था। इसके लिए उन्होंने कहा था, ‘‘हमें अपनी आवश्यकतओं की पूर्ति स्वयं करनी चाहिए। किसी भी देश के भरोसे, अपनी अर्थव्यवस्था को कदापि टिकाए नहीं रह सकते।’’ गांधीजी हमेशा कहा करते थे कि यदि लक्ष्य पाक-साफ है, तो उसे प्राप्त करने का साधन भी उतना ही पवित्र होना चाहिए। दूषित साधन से पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती है। उनके अनुसार सत्य की स्थापना असत्य द्वारा, अहिंसा की हिंसा द्वारा तथा प्रेम की घृणा द्वारा नहीं की जासकती है। यदि हम हिंसा से अहिंसक समाज लाना चाहते हैं, तो यह संभव नहीं है, क्यों कि इससे हिंसा का ही महत्व समाज में बढ़ता है। ‘गांधीजी ट्रस्टीशीप’ का सिद्धांत दिया। उनकी राय में धन समाज का है, व्यक्ति का नहीं। जो धन जब तक व्यक्ति के पास है, उसका नियंत्रणकत्र्ता एंव देख-रेख व प्रयोग करने वाला है। व्यक्ति को उससे आसक्त नहीं होना चाहिए। यदि उस सिद्धांत को मान लिया जाता और समाज में आर्थिक गैर बराबरी नहीं रहती, तो आज उग्रवाद सर चढ़कर नहीं बोलता। गाधीजी यंत्रीकरण के विरोधी थे, क्योंकि भारत में श्रम का बहुतायत है। इस संदर्भ में उन्होंने लिख है कि ‘मशीने’ आधुनिकक सभ्यता का प्रतीक हैं और एक बडे़े पाप का प्रमाण है। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि काम करने वालों की कमी हो, तो मशीनें अच्छी मानी जा सकती हैं, परन्तु यदि काम करने वाले आवश्यकता से अधिक हो, तो मशीनें खराब हैं। गांधीजी छोटे उद्योग धंधे को अधिक महत्वपूर्ण समझते थे। उनका मानना था कि भारत जैसे विशाल देश में लघु उद्योग के बिना रोजगार की समस्या हल भी नहीं हो सकती है। उद्योग के लिए पूंजी और श्रम आवश्यक साधन है। जिन देशों में श्रमशक्ति का अभाव है, वे उद्योग धंधों में अधिक पूंजी तथा श्रम कम लगाना चाहेंगे। लेकिन भारत की स्थिति उससे ठीक विपरीत है। गांधीजी सर्वोदय के समर्थक थे। उसमें गरीब और दलित व्यक्तियों को सबसे पहले उठाने का प्रयास करना है। सर्वोदय का आधार आध्यात्मिकता है। यह ईश्वर तथा आत्मा में आस्था रखता है। परन्तु यह आधार दुराग्रह एवं कट्टरता से मुक्त है। प्रत्येक धर्म को मानने वाले यहाँ तक कि नास्तिक के लिए सर्वोदय के मंच पर स्थान है। गांधीजी के अनुसार सत्य ही ईश्वर है। सत्य साध्य है तथा अन्य सब चीजें साधन हैं। साधन को पवित्र बनाने के लिए अहिंसा प्रथम सिद्धांत और प्रेम दूसरा। इस प्रकार गांधी के दर्शन का मूलमंत्र सत्य, अहिंसा और प्रेम था। तभी तो प्रसिद्ध लेखक रामा रोलांड ने गांधीजी को आधुनिक ईसामसीह कहा था।
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अंतिम अद्यतन (रविवार, 25 अक्टूबर 2009 21:46)


















