magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

गुरूनानक के दार्शनिक विचार

किसी भी धर्म की स्थापना कुछ आधारभूत सिद्धांतों पर निर्भर करती है। जिस धर्म के दार्शनिक सिद्धांत जितने अधिक व्यवहारिक और उपयुक्त होंगे, उस धर्म की पैठ उतनी ही गहरी होगी। सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानजी के द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांत बहुत ही सरल, व्यवहारिक, गंभीर तथा वैज्ञानिक आधार लिए हुए है। उन्होंने सिक्ख धर्म को परिभाषित करते हुए कहा- ‘‘किसी  फिलास्फी को जाँचने का नाम सिख धर्म नहीं और न ही यह सिद्धांतों का जमघट है। यह धर्म ऐसा उपदेश नहीं देता कि जगत मिथ्या है, इसे त्याग दो, न ही यह भविष्य की आशा पर इस रत्नरूपी शरीर को कष्ट देने की इजाजत देता है न ही ऐशों-आराम में इसे गवाँ देना जीवन का आदर्श समझता है। सिख-धर्म ‘‘माया विच उदासी ओर ‘‘राजविच योग कमाने का नाम है। सिख-धर्म संसार को समुद्र मानते हुए कहता है कि बेशक इस नाव रूपी शरीर को समुद्र में चलाओ पर यह याद रहे कि इस नाव में सांसारिक विकारों का पानी न आने पाये। यह धर्म किनारों को परिपक्व करना चाहता है, न कि तूफान को रोकना। यह धर्म अशुभ से बच कर भागना नहीं सिखाता, बल्कि उस पर विजय प्राप्त कर आत्मा एवं परमात्मा के मिलन की राह बताता है।

गुरुनानकजी ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए जंगलों में भटकने को व्यर्थ बताते हुएअंजन माहि निरंजन का उपदेश दिया है। कालिसार भट्ट ने अत्यंत समर्थ गवाही देते हुए कहा कि गुरुनानक ने अपने दैनिक जीवन में राजयोग के आदर्श को निरूपित किया है- ‘‘कवि कलि सुजल गावो गुरुनानक राजयोग जिन मान्यो गुरुनानक रूपी सूर्य का उदय सन् 14690 मंे लाहौर केननकाना’’ साहिब में हुआ जो पहले तलवंडी के नाम से जाना जाता था।

पिता मेहता कालू एंव माता तृप्ता की कोख से जन्म लेने वाले विलक्षण बालक को ईश्वर ने अपने अवतार के रूप में भेजा। गुरुनानकजी को जो समाज मिला यह विसंगतियों से भरपूर था। तत्कालीन समय की राजनैतिक, सामाजिक , धार्मिक एवं आर्थिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी। समाज में अंधविश्वास, कर्मकांड, बाह्य आडंबरों आदि का बोल-वाला था। एक संत पुरुष होने के नाते उन्हें इस बात का गहरा एहसास था कि किस प्रकार समाज का रूढ़िवादी स्वरूप भारतीय समाज के एक बहुत बडे़ अंश को भारत के सांस्कृतिक एंव धार्मिक जीवन को रिक्तता एंव गतिरोध की अवांछित भूमिकाओं की ओर बढ़ाता जा रहा है। उन्होंने विविध धर्माें की एकता के महत्व को भी समझा। समय की आवश्यकता को भांप कर ही उन्होंने 15वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में सिख-धर्म की नींव डाली।

उनकी महानता यह नहीं है कि उन्होंने सिख-धर्म की नींव डाली, बल्कि वे इसलिए महान हैं कि तत्कालीन समाज में व्याप्त विसंगतियों को न केवल रेखांकित किया, बल्कि वे हर अन्याय के खिलाफ डट कर खड़े हुए। एक उच्च कोटि के साहित्कार के रूप में उनकी ख्याति इस लिए भी बढ़ गई कि उन्होंने मध्ययुगीन भक्ति काव्य परम्परा को नए तेवर दिए। तत्कालीन मुगल साम्राज्य के जुल्मों को उन्होंने अपनी सरल भाषा में लिखे सादगीपूर्ण काव्य से दृढ़तापूर्वक प्रतिकार किया। एक शक्तिमान शासक वर्ग का इतना निर्भीक व प्रखर विरोध भारतीय इतिहास में दुर्लभ है।

गुरुनानकजी ने अपने जीवन के पचीस वर्ष सुदूर यात्राओं में व्यतीत किए। उस समय जब कहीं आवागमन के साधन उपलब्ध नहीं थे, गुरुनानकजी ने विश्वकल्याण हेतु पैदल यात्राएँ की, जिन्हेंचार उदासियों’’ के रूप में जाना जाता है। एक मुसलमान भक्त भाई मरदाना हमेशा इनके साथ रहा करते थे।

पहली यात्रा सन् 1497 से 15100 तक की जिसमें वे हिन्दू तीर्थ स्थलों कुरूक्षेत्र, हरिद्वार, वृंदावन, बनारस, जगन्नाथपुरी इत्यादि धार्मिक केन्द्रों पर गए एवं अपने उपदेश दिए। दूसरी यात्रा सन् 1510 से 15150 तक की, जिसमें गुरुनानकजी ने सुमेर पर्वत जैन व बौद्ध धर्म से संबंधित स्थलों का भ्रमण किया एवं श्री लंका तक गए। तीसरी यात्रा सन् 1515 से 15170 तक की, जिसमें गुरुनानकजी जम्मू, श्रीनगर कैलाश मानसरोवर आदि हिमालय की शृंखलाआंे एंव तिब्बत तक पहुँचे। चैथी एवं अंतिम उदासी में सन् 1517 से 15210 तक मुसलमानों के पवित्र स्थानों की यात्रा की, जिसमें वे मक्का मदीना इराक ईरान अफगानिस्तान आदि देशों में गए। बगदाद में आज भी उनकी स्मृति में गुरुद्वारा मौजूद है। दुनिया में बहुत प्रचारक ऐसे हुए जिन्होंने लोककल्याण हेतु इतनी व्यापक यात्राएँ की।

अपनी रचना जपु जीद्वारा उन्होंने अपना दार्शनिक दृष्टिकोण प्रारंभ किया एंवएक ओंकार पर अपने दर्शन की नींव रखी। अपने दर्शन की शुरूआत में ही उन्होंने ईश्वर के गुणों की व्याख्या करते हुए यह मूलमंत्र दिया- ‘‘एक ओंकार, सतनाम, करता पुरख, निरभौ, निरवैर, अकाल मूरत, अजूनी सैभंग गुर प्रसाद।

अर्थात् ईश्वर एक है वह सत्य है वह सृष्टि का कर्ता है उसे किसी का डर नहीं उसे किसी से वैर नहीं उसका कोई स्वरूप नहीं वह पैदा नहीं होता एवं उसे गुरु की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है।

उसे चेतन शक्ति को पहचान कर गुरुजी ने यह अनुभव किया कि सभी जीवों में जो आत्मज्योति है वह उसी परम ज्योति का ही अंश है उसी के प्रकाश से सभी जीवों में प्रकाश है। अतः यदि हमें उस परम ज्योति को पहचानना है तो उसके द्वारा बनाए गए मनुष्यों से प्रेम करना होगा।

अपने भक्ति अभ्यास में उन्होंने यह स्वीकार किया है कि शरीर के नौ दरवाजे बाहर की ओर खुलते हैं पर दसवाँ दरवाजा अंदर की ओर खुलता है उसी से उस परम ज्योति के दर्शन होते हैं और सच्चा आनन्द प्राप्त होता है। गुरुनानक देवजी का यह दार्शनिक उपदेश है कि मनुष्य पंच विकारों (काम क्रोध लोभ, मोह एवं अहंकार) में फँस कर अपनी जीवन नष्टकर लेता है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इंद्रियों को वश में रखें जीवों पर दया करें बेईमानी चोरी झूठ का त्याग करें किसी का अधिकार न छीनें अपनी आत्मा शुद्ध रखें तभी वह परम ज्योति के दर्शन कर सकता है एवं सुखद जीवन व्यतीत कर सकता है।

गुरुजी ने कहा, ‘‘मोह को जलाकर उसकी स्याही बनाओ, बुद्धि को श्रेष्ठ कागज बनाओ भाव को लेखनी और चित्त को लेखक बनाओ। गुरु से पूछकर विचारपूर्वक उस बेअंत और असीम परमात्मा की स्तुति लिखो एवं उसका गुणगान करो, तो ईश्वर की कृपा होगी एवं जीवन में सदा सुख एवं आनंद रहेगा।

गुरुनानकजी ने ईश्वर के जिस सगुण स्वरूप को स्वीकार किया वह किसी मूर्ति का नहीं अपितु ईश्वर के सत्य स्वरूप का ही नाम है जिसे हम ईश्वर हरि राम अल्ला भगवान आदि के नाम से कल्पना करते हैं। ईश्वर जब तक निराकार ब्रह्म हैं वह सृष्टि का जनक नहीं हो सकता। प्रकृति का सृजन करने हेतु वह अकाल मूर्त का रूप धारण करता है। जिसे हम ईश्वर कहते हैं। वह कत्र्ता है वहीं पुरुष है। उसका चेतन स्वरूप सत्य चित आनन्द है। सृष्टि का कण-कण उसकी आज्ञानुसार चलता है जो उसकी आज्ञा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है वह मानवीय कमजोरी अहंकार पर अधिकार पा लेता है।

हुकमे अंदर सब को बाहर हुकम न कोए

नानक हुकमे जे बुझै तां हौमे कहे न कोए।

गुरुनानकजी ने यह स्पष्ट कर दिया कि सृष्टि निराकार सगुण स्वरूप की देन है। वह नित्य स्वरूप बदलता रहता है पर वह अदृश्य है। उसकी अनुपस्थिति मृत्यु की बोधक है। कोई उसे राम कहता है कोई उसे रहीम कहता है। अतः उसके नाम स्वरूप एवं आस्था को धर्म की ओट में विवादस्पद बनाना निश्चय ही आपत्तिजनक एवं अविवेकपूर्ण है। गुरुजी ने ईश्वर के अस्तित्व की केवल आध्यात्मिक व्याख्या ही नहीं की बल्कि उसके अस्तित्व के आधार पर सामाजिक व्यवहार के सिद्धांत भी स्थापित किए। उस परम परमेश्वर की सत्यता ढंwaढने के लिए उन्होंने गुरु की शरण में जाने को कहा।

यदि आध्यात्मिक रूप में प्रभु अपनी कृपा से ज्ञान की ज्योति जला देता है और उसी से अन्य जीवों में नव ज्योति प्रस्फुटित होती है। गुरु की कृपा से जीवन-मरण के जंजाल से मुक्ति मिलती है।

सिक्ख-धर्म में दस गुरुओं का गुरुपद उनकी वंश परम्परा से नहीं बल्कि योग्यता के अनुसार प्राप्त हुआ। अंतिम एंव दशवें गुरु गोबिन्द सिंहजी ने गुरु परम्परा समाप्त करके गुरु ग्रन्थ साहिब को गुरु मानने का आदेश दिया। गुरु ग्रन्थ साहिब में केवल छः गुरुओं की वाणी है। इसके अलावा उसमें सभी जाति-धर्म के अन्य 36 भक्तों महापुरुषों की वाणी गुरुपद के रूप में प्रतिष्ठित हुई हैं।  सिख-धर्म में वर्तमान मंs गुरु कोई व्यक्ति नहीं बल्कि ‘‘गुरुवाणी है जिसके पथ प्रदर्शन में प्रभु प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है एवं सभी कार्य सफल होते हैं।

‘‘गुरु की पैरी पए काज संवारियन

गुरुजी ने जीवन में तीन मुख्य सिद्धांतों पर बल दिया। नाम जपना किरत करनी एवं वंड छकना (बाँट कर खाना)। प्रभु भक्ति को ही नाम जपना कहा गया है। गुरुवाणी सुनना, गाना, पढ़ना, मनन करना आदि सभी कार्य नाम जपना के अन्तर्गत आते हैं। गुरुवाणी में नाम के जाप को वाहेगुरु (ईश्वर) के जाप की संज्ञा दी गयी है जो जिज्ञासू को हमेशा के लिए वाहेगुरु के चरणों में जोड़ देता है।

सच्ची भक्ति से मनुष्य को एक ऐसी सहज अवस्था प्राप्त होती है जहाँ संसार के सारे संबंध मिथ्या प्रतीत होते हैं। यही सर्वोच्च ज्ञान की अवस्था है। गुरुनानक ने लोगों को सर्वप्रथम चरित्र निर्माण करने का उपदेश दिया। जिसका अभिप्राय था कि वे जीवन के उतार चढ़ाव में ठोकर खाकर पथभ्रष्ट न हो जाएँ। समय रहते ही उनमें जागृति एवं नैतिकता के विकास पर बल दिया। उन्होंने सत्य को सर्वोपरि कहा, परन्तु सत्य से ऊपर भी जो है वह है सत्य में रहना उवं उसे व्यवहार में लाना।

गुरुनानक के दार्शनिक विचारों के संदर्भ मंs सेवा और श्रम इन सिद्धांतों की व्यवहारिकता ज्वलंत प्रतीक है। उन्होंने तीन प्रकार की सेवाएँ बताईं- शारीरिक मानसिक एवं राजकीय। शारीरिक सेवा का अर्थ है समर्थ व्यक्तियों द्वारा असमर्थ लोगों की सेवा करना अर्थात् दया भाव पैदा करना।

मानसिक सेवा का तात्पर्य है- भक्तों द्वारा जिज्ञासुओं को गुरु सिद्धांतों का अध्ययन एवं पठन-पाठन कराना। राजकीय सेवा का अर्थ है- राजकीय प्रबंध को मानवतावादी तत्वों पर आधारित करना। धर्म एंव देश की उन्‍नति के लिए भक्तों द्वारा आत्मबलिदान उनकी शारीरिक सेवा का ही एक अंग है। उन्होंने संसार में रहते हुए गुरु उपदेश के दार्शनिक तथ्यों को समझने के लिए प्रभु भक्ति को सर्वोपरि माना और मानवता के सथ प्रेम को प्रभु भक्ति का सर्वाेच्च साधन बताया।

गुरुनानक ने मेहनत की कमाई एवं दान देने को प्राथमिकता दी एवं स्वरूप भी खेतों में श्रम कर इसे व्यवहारिकता का रूप दिया।

उस घोर नारी निंदक युग में भी गुरुनानक ने स्त्रियों को उच्च दर्जा देते हुए कहा सो क्यों मंदा आखिये जित जम्मे राजान

अर्थात् उसे क्यों बुरा कहा जाए, जो बड़े-बड़े राजाओं को जन्म देती है। उन्होंने नारी को सम्मान देते हुए अपनी भक्ति का आधार सोहागन का जीवन बनाया तथा प्रियतम के रूप में ईश्वर को राखा। उन्होंने कहा पुरुष एंव स्त्री दोनों को ही ईश्वर के पा जा कर अपने कर्मों का हिसाब देना पड़ेगां स्त्री पुरुष को अपने धर्म से गिराती नहीं बल्कि डटे रहने की शक्ति देती है। गुरुजी ने जाति को नहीं, बल्कि कर्म को प्रधानता दी। वहीं ऊँची जाति के है जो अहंकार भाव त्याग कर प्रभु भक्ति में लीन रह कर शुभ कर्म करते हैं।  सही अर्थों में देखा जाए तो गुरुनानक जी के जीवन दार्शनिक विचार मानवतावाद का संदेश देते हैं। ईश्वर की स्तुति, जीवात्मा में परमात्मा का अंश सभी धर्मों का आदर, स्त्री-पुरुष समानता, पराये हक का त्याग, जाति-पाति का विरोध प्रभुभक्ति इत्यादि सिद्धांतों का प्रतिपादन कर गुरुनानक ने मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाया एवं देश की सामाजिक राजनैतिक विषमताओं को दूर कर हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित कर प्रेम का बीज बोया। गुरुनानक ने जिस अभिनव दर्शन का प्रतिपादन किया वह समय की आवश्यकता थी और तत्कालीन परिस्थितियों के अनुकूल उनके दार्शनिक विचारों ने गहरा प्रभाव डाला, किन्तु आज के सामाजिक परिवेश में पुनः गुरुजी के उपदेशों को अमल में लाने की आवश्यकता है ताकि हम प्रेमभाव पैदा कर एकता के सूत्र को मजबूत कर देश को खंडित होने से बचा सके।  

डॉ0 सुरिन्‍द्र कौर नीलम 

Comments
Add New Search
Write comment
Name:
Email:
 
Website:
Title:
UBBCode:
[b] [i] [u] [url] [quote] [code] [img] 
 
 
:angry::0:confused::cheer:B):evil::silly::dry::lol::kiss::D:pinch:
:(:shock::X:side::):P:unsure::woohoo::huh::whistle:;):s
:!::?::idea::arrow:
 

3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved."

अंतिम अद्यतन (बुधवार, 09 दिसम्बर 2009 21:57)

 
Google Search
पथिक संख्या
mod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_counter
mod_vvisit_counterआज38
mod_vvisit_counterकल41
mod_vvisit_counterइस सप्ताह105
mod_vvisit_counterइस माह457
mod_vvisit_counterकुल20148
Breaking News
जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन