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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

सवालों के बीच पत्रकारिता

प्रयोक्ता योग्यता निर्धारण: / 1
ऊसरउत्कृष्ट 
जून अंक पत्राकारिता को समर्पित हैं. सबसे पहले सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता अपने ध्र्मों का पालन कर रही है? आज पत्रकारिता की कितनी जरूरत है? आज पत्रकारों की हैसियत क्या है? बड़े पत्र और छोटे पत्र के बीच संबंध क्या है और इन दोनों का आम आदमी के साथ सरोकार क्या  है, उनकी पहँुच कितनी है?
यह सवाल हमसे भी है आप से भी है, जिसका जवाब आज न कल हमे देना ही है.
फिलहाल तो यह कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी सफलता यही है कि जनता को नंगा, भीखमंगा करने वाली विधयिका और कार्यपालिका को नंगा करने में आज भी वह सबसे आगे है. अगर पत्रकारिता और न्यायपालिका नहीं होती, तो ये लोग जनता को भेड-बकरी से ज्यादा महत्व नहीं देते, पर पत्रकारिता के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि आज पत्रकारिता पूंजीपतियों के हाथ में चली गई है. पत्र-पत्रिका चलाना अब उतना आसान नहीं रह गया है. ऐसे में पत्रकारिता वही करती है, जो उसके पूंजीपति मालिक चाहते हैं. मालिक चाहते हैं कि कमाई हो और उनका हित भी सुरक्षित रहे. ऐसे में पत्रकारों की स्थिति चाबी से चलने वाली खिलौने की तरह होकर रह जाती है.

आज स्थिति यह है कि पैसे लेकर विज्ञापन को खबर के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है.
जाहिर है, वह उसी रूप में होगा, जिसे जिस रूप में प्रकाशित करने के लिए कहा जाएगा.
पत्रकारिता के मठाधीश (संपादक कम प्रबंधक ज्यादा) खबर को खबर के रूप में छापने के लिए एक तरफ आन्दोलन चलाते हैं, वहीं दूसरी ओर तर्क के साथ वे वही काम करते हैं यानि कम्बल ओढ़कर घी पीना. और उनका तर्क यह होता है कि डाॅक्टर ने ही कहा था कम्बल ओढ़ कर घी पीने के लिए. 
छोटी पत्र-पत्रिकाओं का कल भी एक महत्व था आज भी है. चमक के दौड़ में छोटी पत्र-पत्रिकाएँ चमकीलें भले न हो, पर नूकीले तो हैैं हीं. इनका व्यापारिक स्वरूप कुछ भी नहीं होता, पर इनके पास ईमानदारी होती है.
आजादी के समय को अपनी यादों में रखने वाले को यह याद होगा कि आजादी की लड़ाई में छोटी पत्र-पत्रिकाओं ने अहम भूमिका निभाई थी, पर आज वे किस हाल में हैं, इसकी सुधि किसी को नहीं है.
विज्ञापनों की दुनिया में बड़े पत्र-पत्रिकाओं के प्रतिनिधि साहब के चैम्बर में चाय-काफी, ठंडा और न जाने क्या क्या पीते हैं, जबकि लघु पत्र-पत्रिकाओं के मालिक साहब से मिलने के लिए इंतजार में घंटो बाहर बैठे रहते हैं. ये दोहरा चरित्र साहबों की और ऐसेे पत्र प्रतिनिध्यिों की, जो गरीबों के मसीहा अपने को समझते हैं, से देश के गरीब समाज को क्या भलाई हो सकती है, भला? 


कुछ इसी तरह की हालत पत्रकारों की भी है. वे अपने संपादकों के सामने घुटने टेक के खड़े रहते हैं, क्योंकि वे नौकरी करते हैं और नौकरी करना जीवन के लिए जरूरी है न कि खबरें. 
अन्दर के पृष्ठों पर आप देखेंगे कि हमारे ही देश में शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकार हुए, और कई महान विभूति भी और जो कभी पत्रकारिता के विपरीत आचरण नहीं किया. ऐसे सपूतों को हमारा कोटी-कोटी नमन.
आप दृष्टिपात मासिक पत्रिका के लिए अपना डाक पता भेजें. आपको पत्रिका की नमूना प्रति निःशुल्क भेजी जाएगी. ऊपर कार्यालय के पते पर संपर्क करें. संभव हो, तो अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत करवाएँ कि आपको यह साइट कैसी लगी. यदि आप कुछ लिखना चाहते हैं, तो आप अपना एक खाता बना ले. और हमें सूचित करें आपको आगे क्या करना है, बताया जाएगा.
दुनिया से जुड़िए, दुनिया को अपने से जोड़िए.

अरुण कुमार झा  

Comments
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सुशील कुमार  - सबद-लोक     |218.248.80.xxx |2009-07-21 15:04:08
आपने बहुत सही बात कही। सभी
अपने-अपने लोभ-लाभ और
यशस्वी मायालोक में
फंसे हैं।पत्रकार भी इससे
अछूते नहीं। इनको अपनी
मानसिकता बदलनी होगी और
जन-गण के दु:ख-तकलीफ़ को बयां
करना होगा सच्चे मन से।
तभी सही पत्रकारिता
का लक्ष्य पाया जा सकेगा।
kuldeep kumar  - कृपया मेरी बात पर ध्यान दीजियेगा   |123.237.112.xxx |2009-07-22 09:24:07
नमश्कार!
सर जी कृपया आप
टिप्पणी के साथ जो
शब्द
पुष्टिकरण करना होता है उसको
हटा
दीजिये. किसी ऐसे व्यक्ति
जिसकी आखें
कमजोर हों उसको
किसी भी लेख पर
अपनी
प्रतिक्रिया देने में परेशानी
होती है.
कृपया मेरी बात पर
ध्यान दीजियेगा
Sant Sharma     |124.125.56.xxx |2009-08-02 15:28:49
आपने आधुनिक पत्रकारिता
की सच्ची तस्वीर पेश की है |
वाकई आज उन्ही खबरों
को विशेष महत्त्व दिया जाता
है जो पूंजीपतियों
के 
वाणिज्यिक मापदंड के
अनुरूप होते है | यू ही अपनी
कलम के द्वारा
जनजागृति फैलाते रहें |
रजनीश के झा     |59.90.33.xxx |2009-08-04 07:06:56
सटीक लेख,
पत्रकारिता की
व्यवसायिकता ने निसंदेह
पत्रकारिता धर्म को प्रभावित
किया है, मगर इस बात से भी इनकार
नहीं किया जा सकता कि पत्रकारों
ने भी पत्रकारिता को कम नुक्सान
नहीं पहुंचाया है,

सुन्दर
प्रयास,
शुभकामना
rekha Srivastava  - patrakarita dharm   |202.3.77.xxx |2009-10-22 12:15:12
पत्रकारिता बड़े संस्थानों के
लिए नहीं है, वे व्यापारी हैं और
व्यापार में सब कुछ जायज है.
पत्रकारिता धर्म तो सिर्फ वे ही
निभा रहे हैं जो कि किसी के
ख़रीदे हुए नहीं है यानि कि
छोटी ही सही अपनी कृति ईमानदारी
से निर्मित कर रहे हैं. यहाँ
पैसा नहीं बल्कि एक सजग प्रहरी
कि तरह से विषयों को छुआ जाता है.
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गुलमोहर भरमाया था 
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मन मयूर लहराया था
झिलमिल रोशन तारे चमके 
चाँद जरा शरमाया था
झरती चाँदनी आँचल में लूँ 
श्रृंगारित हो गाया था
एम.ए. शर्मा ’सेहर’