magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

सदर्भ झारखण्ड में ऩक्सलवाद

प्रयोक्ता योग्यता निर्धारण: / 0
ऊसरउत्कृष्ट 

चिदम्बरम का स्वागत योग्य ऐलान

जिस दिन रक्तबीज, चंडमुंड, महिसासुर जैसे राक्षसों का बध करने वाली माँ दुर्गा के पंडालों के पट खुल रहे थे, उसी दिन देश के गृहमंत्री श्री पी0 चिदम्बरम झारखंड के राजभवन में नक्सली समस्या पर आयोजित समीक्षा बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेंस में नक्सलियों के नाम के लिए लम्बी लड़ाई की घोषणा कर पट खोल रहे थे।

उन्होंने बताया कि केन्द्र सरकार इसे चुनौती के रूप में ले रही है। उनके वक्तव्यों के जो अनमोल वचन हैं, वे हैं कि नक्सलियों के साफाये के लिए अर्धसैनिक बल ही काफी है। सेना की सहायता लेने की जरूरत नहीं हैं। दूसरे कि झारखंड में फोर्स की कमी नहीं होने दी जायेगी। तीसरे कि राजनेता और नक्सली के बीच रिश्ते के बावत उन्हें कोई जानकारी नहीं है। यह पूछे जाने पर कि दुर्गा माता, महिषासुर बध के लिए कब हथियार उठायेंगे, तो उन्होंने इसका जवाब नहीं दिया। और फिर वे राजधानी दिल्ली को उड़ गये।

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच वे आये और जब उड़े, तो कहीं जाकर सुरक्षा में लगे अधिकारियों ने चैन की संास ली।

कहा तो यह जाता है कि राज्य के 24 जिलों में से 22 जिलों में नक्सलियों का शासन है। नक्सली अपना शासन फैलाते चले गये और सरकार अपना हाथ-पाँव सिकोड़ती चली गयी।

झारखंड की जनता का न सरकार, न नेता, न शासन, न पुलिस किसी पर भरोसा नहीं है। जिस शेर के बल पर गृहमंत्री लड़ाई का ऐलान कर रहे हैं, वह शेर तो मांद में घुस कर बैठा रहता है। उनकी तो अपनी जान बचाने की फिक्र रहती है। उसकी बंदूकें लूटी जाती हैं, जवान मारे जाते हैं, हत्या-लूट के बाद नक्सली आराम से क्षेत्र से निकल जाते हैं। और पुलिस छापेमारी की योजना और छापेमारी करती रह जाती है। करोड़ों रुपये लूट गये, पुलिस नाकेबंदी, छापेमारी, सीमा सील करती रह गयी। और रुपये कपुर की भांति उड़ गये। वाह! कमाल की व्यवस्था है। खैनी फांकती, दो नलियाँ बंदूक थामें डरी-सहमी पुलिस क्या करेगीं एके-47, एके-56 के सामने?

नक्सलियों के इतिहास को तीन अध्यायों में बाँटा जा सकता है। पहला कि वे झारखंड में आये तो पहला काम यह किया कि बडे़-बड़े जमींदारों को अपना निशाना बनाया और उनके खेतों में लाल झंडा गाड़ दिये। उनसे पैसे और बंदूक की मांग की गयी। जमींदारों और गाँव के बड़े लोगों को पकड़ कर गाँव की गरीब जनता के सामने प्रताड़ित कर उनका नैतिक बल को तोड़ दिया गया। इससे दो बातें हुईं। पहली कि जो जमींदार समर्थ थे, वो गाँव छोड़कर पास के शहर में जाकर छोटे-मोटे रोजगार में व्यस्त हो गये। दूसरे कि जो समर्थ नहीं थे, उनलोगों ने अपना सर नक्सलियों के सामने झुका दिये और पैसे और बंदूक देकर खेती करने लगे। इससे गाँव के गरीब लोगों में यह विश्वास घर कर गया कि ये नक्सली उनके हितैषी हैं और उनसे इनको लाभ मिलेगा और इस तरह जमींदार गाँव से खदेड़ दिये गये। और गरीबों में इनकी पहचान बन गयी।

दूसरे अध्याय मंे इनलोगों ने सरकारी अफसरों, ठेकेदारों, पुलिस और सरकारी भवनों को धड़ाधड़ बम से उड़ाये जाने लगे। ठेकेदारों से लेवी की मांग आरंभ हो गयी। पुलिस और प्रखंड स्तर के सरकारी कर्मचारियों मे डर बैठाया गया और लेवी ली जाने लगी।

पुलिस इतनी सहम गयी कि खामोश रहने में ही अपनी भलाई समझी। फिर लुभाने के लिए जन-समस्याओं को लेकर बंद का आयोजन और फिर जन-समस्याओं को सुलझाने के लिए अदालतें लगाई जाने लगीं। इन सब का मतलब गरीब जनता के बीच अपनी अपनी पैठ बनाना था।

तीसरे चरण का दौर तब शुरू हुआ, जब जनता गौण हो गयी और लेवी प्राथमिकता बन गयी। नक्सलियों का आन्दोलन जो जन-आन्दोलन के रूप में जाना जाता था, वह लेवी वसूली और आतंक के रूप में जाना जाने लगा। गाँव के ग्रामीण जो हितैषी मानने लगे थे, वही हितैषी लोगों को जबरन अपनी सेना में भर्ती कर हथियार थमा दिए। हर गाँव के नौजवान इनकी सेना में भर्ती होने लगे। मौसम की मार, बेरोजगारी और बड़े किसानों द्वारा कृषि कम कर दिये जाने के कारण उत्पन्न्ा भयावह समय में इनके पास इन नक्सलियों के बंदूक ढोने के अलवा कोई काम नहीं बचा। अब डरी-सहमी पुलिस, डरा-सहमा प्रशासन, भय से काँपते ग्रामीण के ऊपर ये लोग अपने बचाव के लिए या फिर कहिए कि नेता अपने कारणों से एक दूसरे के समीप आ गये। दोनों के बीच याराना बढ़ गया। साम्राज्य स्थापित होने का प्रमाण यह है कि नक्सली की ओर से कोई संदेश हो या न हो, खबरों में आते ही शहर, रेल, बस, सभी बंद हो जाते हैं।

बंद इनके लिए मनोरंजन का साधन बन गया। जन सरोकार के लिए नक्सली आन्दोलन का स्वरूप बदल गया और ये लोग करोड़ों के मालिक हो गये। करोडों की वसूली होने लगी। इस कारण कई गुट बने और सबका मकसद लेवी ही रहा। खैर जो भी हो। चिदम्बरम महोदय आये और नक्सलियों से आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर गये। यह स्वागत योग्य है, वशर्ते कि यह चुनाव पूर्व के लुभावने वायदे की तरह न निकले! अब चूँकि चिदम्बरम महोदय अंग्रेजी बोलनेवाले हैं और हमारे महामहिम अंग्रेजी समझनेवाले हैं, इस लिए इनमें क्या बातें हुई, कोई किसको क्या समझाया, इसकी समझ झारखंड की जनता को नहीं है। यह तो समय ही बताएगा कि जिन नक्सली ने झारखंड की नाक में दम कर रखा है, उसकी नाक में नकेल कसने में चिदम्बरम महोदय कामयाब हो पाते हैं कि नहीं! यह भी देखना है कि नक्सलियों के समर्थन और सहयोग इस चुनाव में कौन-कौन नेता लेते हैं और कौन-कौन उनके खिलाफ जंग में शामिल होते हैं। देखना यह भी है कि जो केन्द्र सरकार यह घोषणा करती है कि झारखंड में उद्योग के लिए जमीन की अधिग्रहण नहीं की जायेगी, उस झारखंड का विकास कैसे होगा? यह भी देखना है कि चिदम्बरम महोदय तो हवन करने निकले हैं, कहीं हाथ न जला बैठे!

दृष्टिपात ब्यूरो   

Comments
Add New Search
Write comment
Name:
Email:
 
Website:
Title:
UBBCode:
[b] [i] [u] [url] [quote] [code] [img] 
 
 
:angry::0:confused::cheer:B):evil::silly::dry::lol::kiss::D:pinch:
:(:shock::X:side::):P:unsure::woohoo::huh::whistle:;):s
:!::?::idea::arrow:
 

3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved."

 
Google Search
पथिक संख्या
mod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_counter
mod_vvisit_counterआज33
mod_vvisit_counterकल65
mod_vvisit_counterइस सप्ताह165
mod_vvisit_counterइस माह517
mod_vvisit_counterकुल20207
Breaking News
जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन