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नवम्‍बर  2009
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vijay jee
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शर्त है कि जनता बेईमानी छोड़ दे

प्रयोक्ता योग्यता निर्धारण: / 3
ऊसरउत्कृष्ट 

अपने बीच के एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव करे, जो स्वहित से ज्यादा लोकहित का लक्ष्य रखे। भारतीय लोकतंत्रा में आज स्थिति यह है कि जनता अपना महत्व भूल चुकी है। वह अपना प्रतिनिधि नहीं चुनती, बल्कि अपनी जाति के व्यक्ति को चुनती है। वह चुनती है ऐसे व्यक्ति को, जो सड़क-नाली से लेकर उम्मीदों के सपने को जमीं पर उतारने का झूठा आश्वासन देता है। कमाल तो यह है कि वह मीट-भात, हड़िया; दारूद्ध, कम्बल, चादर, साड़ी जैसी चीजों को पाकर उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा हो जाती है, यह जाने बिना कि उसका व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकार कैसा है। यदि ऐसा नहीं होता तो राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान क्षेत्रा के जातीय समीकरण की ओर ध्यान ही नहीं देतीं। जनता यदि समझदार होती, तो जेल में बंद कैदी, भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज चुनाव के मैदान में नहीं उतरते। ये लोग सीना तान कर यह नहीं कहते कि हम पिंजड़े में कैद रह कर भी चुनाव जीत लेंगे। 

यहीं पर लोकतंत्रा पहली बार हारती है। लोकतंत्र की दूसरी हार तब होती है, जब उम्मीदों पर खरे न उतरने वाले ये लोग यहाँ तक कि क्षेत्रा के लिए दिये गये पफंड तक खर्च नहीं करते। और जीत कर आने के बाद पाँच वर्षों तक दिखाई भी नहीं पड़ते और फिर से ये चुनावी मैदान में दाँत निपोड़े जनता के बीच आ जाते हैं। जनता इसका सामाजिक बहिष्कार करने के बदले इनके झंडे ढोने लगती है। यही दूसरी हार इनको मजबूती देती है। जनता अपनी लड़ाई पूर्णतया हार जाती है, जब उसे पता चलता है कि पान की दूकान पर उधरी खाने वाले नेता चंद वर्षों में दुनिया खरीद लेने की ताकत हासिल कर लेते हैं। यह देख जनता की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। जनता चेतना शून्य हो जाती है, वह समझ नहीं पाती कि ऐसा कैसे हो गया, क्यों हो गया। क्या करे जनता! जनता के हाथों में ऐसा कोई भी हथियार नहीं है, जिसके सहारे वो इन नेताओं पर अगले चुनाव तक लगाम कर सके। यहीं पर नेताओं की जीत और जनतंत्र की तीसरी हार होती है। फिर लोकतंत्रा की शवयात्रा शुरू होती है। लोकतंत्र की शवयात्रा और कोई नहीं, बल्कि हमारे देश की राष्ट्रीय पार्टियाँ, क्षेत्रय पार्टियाँ निकालती हैं, क्योंकि ये लोग अब पार्टी नहीं होते, बल्कि पार्टी के रूप में गिरोह की तरह कार्य करते हैं, जिनका मकसद सत्ता पाना और अपने गिरोह के लोगों को सुरक्षा प्रदान करना होता है। निर्दलीय इन गिरोहों के सुरक्षा गार्ड की तरह होते हैं। लोकतंत्र की शवयात्रा अनवरत जारी है। जनता किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ी है इस इंतजार में कि कोई चमत्कार हो और लोकतंत्रा जिंदा हो जाए। जनता और नेता विश्वास के साथ यदि तप करे, तो शायद सावित्री की तरह सत्यवान रूपी लोकतंत्र को वापस लाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए तप की शर्त स्वीकार करनी पडे़गी। और तप की शर्त है कि जनता बेईमानी करना छोड़ दे।

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