| बहुत बेचैन है अखबार की दुनिया |
बहुत बेचैन है अखबार की दुनिया -संजय द्विवेदी ![]() अखबार की दुनिया इन दिनों खासी बेचैन है । बाजार के दबाव और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच उलझी अखबारी दुनिया नए रास्तों की तलाश में है । तकनीक की क्रांति, अखबारों का बढ़ता प्रसार, संचार के साधनों की गति ने इस समूची दुनिया को जहां एक स्वप्नलोक में तब्दील कर दिया है वहीं पाठकों से उसकी रिश्तेदारी को व्याख्यायित करने की आवाजें भी उठने लगी हैं । |
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छमकछल्लो कहिस
महिलाओं के अंतर्वस्त्र? राम-राम, तोबा-तोबा!
बात करते समय यह अक्सर कह दिया जाता है कि "लेडीज़" हैं, बेचारी. यानी लेडीज़ या स्त्री होना एक पूरी की पूरी बेचारगी का बायस है. फलाने जो हैं, अमुक के पिता हैं, या भाई हैं या पुत्र हैं या पति हैं, मगर इसके उलटा जाते ही आवाज़ के तार धीमे पड़ जाते हैं. अंतिम रिश्ते में तो लोग और भी इतने असहज हो जाते हैं, जैसे कोई बड़ी ही गलत बात कहने जा रहे हों.
हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम
हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम दिया तुम्ही ने जीने का जग में मुझको सुन्दर ज्ञान हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम।
माता ने तो जन्म दिया है और पिता ने बस एक नाम इनसे भी अनमोल रत्न-धन गुरु ने दी मेरी पहचान।
मैं शीष झुकाऊँ आदर से ले गुरु चरणन का नाम आशीर्वाद हमें दो गुरुवर कुछ करूँ जगत में काम।
अन्धकार से मुझे बचाकर आँखों में ज्याति डाली देख सका मैं अन्तर्मन से चहुँओर उषा की लाली।
वरद हस्त रखना प्रभु हरदम जिससे मंजिल को पा लूं अज्ञान डगर मंे भटक न जाऊँ नभ के तारे भी छू लूँ। श्रद्धा सुमन समर्पित गुरुवर आज करूँ मैं तेरे नाम आशाओं के दीप जलाकर हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम। गिरीन्द्र प्रसाद हम अखबार वाले हैं हमको जानते हो... हम कौन हैं? जरा तमीज से बात करो हमसे वरना हम........छाप देगे।क्या बात है। आज शहर हो या प्रदेश या फिर देश-दुनिया किसी भी स्थान पर देखने को मिल जाते हैं 'प्रेस' को अपने नाम के साथ जोडऩे वाले। प्रेस का मतलब इनके लिये किसी संस्थान में नौकरी करने वाला एक कर्मचारी नहीं बल्कि खुद प्रेस मालिक अर्थात अखबार वाला होता है। हर किसी से बोलने का लहेजा भी कुछ अलग होता है इनका। कुलदीप कुमार मिश्र
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