magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 
प्रवेश फॉर्म
फाइलें दौड़ रही हैं,

विचारों की अभिव्यक्ति पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं होती। लोग अपनी तरह से विचार व्यक्त करते रहते हैं। अब झारखंड के पूर्व राज्यपाल के क्रियाकलापों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लोग कहते थे कि राज्यपाल महोदय पूर्व के मंत्रियों की तरह उगाही में लगे थे और मंत्रियों की तरह झारखंड को लूटा। उन्होंने पूर्व की तरह ट्रांस्फर पोस्टिंग उद्योग को बरकरार रखा। अब कारण चाहे जो भी हो, पर रजी साहब विदा हो गये हैं और नये राज्यपाल के.शंकरनारायणन आये तो कहा जाने लगा कि ये झारखंड में कांग्रेस के प्रतिनिधि बन कर आये हैं और चुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाने के लिए केन्द्र से भेजे गये हैं। इन विवादों या दलीलों में जाने से बेहतर है कि विदा होते रजी और स्वागत शंकरनारायणन के समय को देखें, जिसमें झारखंड के मगरमच्छों को जाल में फंसाया गया। उस जाल मं इन मगरमच्छों के करोड़ों की सम्पत्ति, अनेक जमीन-जायदाद फंसे।

आम लोगांे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि एक दो मगरमच्छों से क्या झारखंड के तालाब में तो मगरमच्छों की भरमार है। दो-चार से क्या होने वाला। चलो संतोष यह है कि ऊँट के मुह में जीरा ही सही। झारखंड के मंत्री अरबपति और अफसर करोड़पति है।

नये राज्यपाल महोदय आये तो झारखंड में उन्हें सूखा और उग्रवाद ने स्वागत किया। सूखे से निपटने के लिए ग्रामीण स्तर पर उन्होंने आपाधापी में दो कार्य आरंभ किये। पहले कि आंगनवाड़ी सेविका की बहाली युद्ध स्तर पर करने के आदेश दिये। आदेश फैक्स के जरिये उपायुक्त तक पहुंचा। उपायुक्त के होश उड़ गये। वे नपना नहीं चाहते थे, सो दौड़ा दिये अपने माहततों को। आदेश दिया कि अब चाहे जैसे भी हो, जिस तरह हो, घर बैठे या फिल्ड में जाकर, तुरंत बहाली कर जानकारी दें। नहीं, तो नप जायेंगे। अनुमंडल अधिकारी देर रात तक जग कर आनन-फानन में बहाली कर डाले। इस आपाधापी में 10-5 इधर-उधर हो भी गये हों, तो दोष किसी का नहीं हो सकता। समय का हो सकता है। जो कार्य वर्ष में नहीं कर सकी, वो कार्य राज्यपाल महोदय ने महीनों में नहीं, बल्कि दिनों कर दिखाया। धन्यवाद! के पात्र हैं राज्यपाल महोदय। काम कैसे नहीं हो सकता या काम कैसे होता है, कर दिखला दिया। इन आंगनबाड़ी सेविकाओं का दायित्व है कि कार्य को जिम्मेदारी से निभायें। अब राज्यपाल महोदय गाँव-गाँव, घर-घर घूम कर काम करने तो नहीं जायेंगे।

यदि ईमानदारी से काम करे, तो ग्राम का निश्चय ही भाग्योदय हो जायेगा।

दूसरा काम राज्यपाल महोदय ने किया कि 1000 की आबादी पर एक-एक राशन दुकान खोलने के लिए आनन-फानन में लाइसेंस देने का निर्णय लिया गया। वह लाइसेंस भी महिलाओं के स्वयंसहायता समूह को दिया गया। इस निर्णय के पीछे गाँव-गाँव में राशन की उपलब्धता सुनिश्चित कराना था। इसमें भी उपायुक्त, अंचलाधिकारी से लेकर प्रखंड के कर्मचारी तक गाँव-गाँव में जाकर स्वयं सहायता समूह से विनती करने लगे कि दीदी-बहना, तुम राशन दुकान का लाइसेंस ले लो। कोई पूछती कि कैसे करना है। क्या हमलोगों को राशन लाने के लिए दौड़ना पडे़गा। क्या हमलोगों को भी सप्लाई विभाग के अफसरों, इंस्पेक्टरों से पाला पड़ेगा। कितना फायदा होगा। तो कोई पूछती कि कितना पैसा लगेगा, तो कर्मचारी बोलते कि बहना हमको कुछ नहीं मालूम। तुम जल्दी से लाइसेंस ले लो। यह सब हमकों नहीं मालूम। धीरे-धीरे पता चल जायेगा। भले बाद में बंद कर देना पर अभी ले लो, नहीं तो हम नप जायेंगे।

लाइसेंस लेने में जरूरी कागजात कुछ 19-20 था, उसे जल्दीबाजी में दुरूस्त कर लिया गया। आनन-फानन में लाइसेंस मिल गया। सोचने का यह भी है कि यही अफसर, यही कर्मचारी कैसे आनन-फानन में रात-दिन एक करके आदेश का पालन कर रहे हैं और यही कर्मचारी मंत्रियों के आदेश को डस्टबीन में फेंक देते थे। एक राज्यपाल से जितना डर लग रहा है, वे इतने मंत्रियों और अफसरों से क्यांे नहीं डरते थे। जाहिर है, उस वक्त सभी एक टेबल पर बैठकर रसमलाई खा रहे थे, तो फिर डर कैसा और किसका डर? महिला समूहों को राशन दुकान का लाइसेंस देने के पीछे मकसद यही था कि अभी तक राशन डीलर गाँव तक राशन पहुँचाते ही नहीं, बल्कि उनका ब्लैक शहरों में ही कर देते थे, उनसे उन्हें निजात दिलाना था।

गाँव-गाँव में राशन दुकान होने के कारण और खास कर महिला समूहों के हाथों में डीलरशीप होने के कारण गाँव-गाँव में राशन पहुँच तक तो पायेगा। सही वितरण हो पायेगा। दूर-दराज के गाँवों में गरीब से गरीब तक अनाज पहुँच पायेगा। दोनो ही कार्यक्रमों के विचार नेक है। सामाजिक है, पर इनका क्रियान्वयन कैसे हो पायेगा? इनकी सफलता के पीछे यही एक यक्ष प्रश्न है।

योजनाएँ सारी अच्छी होती हैं। दोष उनके क्रियान्वयन में होता है। क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं हो पाता। जिस राज्य में पगार, बकाया पगार, पेंशन तक लेने के लिए अपने ही भाई-बंधु को रिश्वत देने पड़ते हैं। उस राज्य में यह कैसे मान लिया जाए कि फाइलें तेजी से बढ़ेगी। राज्यपाल महोदय को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राशन दुकान जो खुले हैं, उन तक समय पर बिना रिश्वत दिये राशन पहुँचे। उनका सही प्रकार से वितरण हो। यह भी देखना है कि आंगनबाड़ी सेविका को जिम्मेदार और जिम्मेवार कैसे बनाया जाए। राज्यपाल महोदय को यह भी देखना है कि बड़े-बड़े मगरमच्छ, जो आदमी को जिन्दा निगल कर गहरे पानी में डूबकी लगा कर बैठ हैं, उन्हें कैसे जाल में फंसाया जाए। अभी तो सूर्योदय की बेला है। देखना है, दोपहर होते-होेते राज्यपाल महोदय क्या कर पाते हैं। दोपहर बाद न जाने सत्ता किसके हाथ जाए!

विजय रंजन

मजदूर बनाम कामगार

म जदूरी शब्द स्वयं में ही बड़ा त्रासदी भरा शब्द है. और उसके साथ जब बाल लग जाए तब तो फिर वह और भी मार्मिक बन जाता है. यहाँ यह बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि काम और मजदूरी दोनो में बड़ा फर्क है. सतही तौर पर देखने से तो यह कहा जा सकता है कि जो काम करता है.वह मजदूरी करता है और दुनिया का लगभग हर व्यक्ति किसी ने किसी रूप में कार्य रत् होता है. अर्थात् इस हिसाब से दुनिया का हर व्यक्ति मजदूर हो गया. परन्तु इस विषय वस्तु की गहराई में जाकर इस पर दृष्टिपात किया जाये, तो यह स्पष्ट हो पायेगी कि हर व्यक्ति मजदूर नहीं है. क्योंकि कार्य और मजदूरी इन दोनों का यदि अलग-अलग विश्लेषण किया जाये, तो हमें पता चलेगा कि इन दोनों में बड़ा भेद है. साधारणतः कार्य वह होता है, जो व्यक्ति विशेष के द्वारा किया जाता है. जिसमें श्रम लगता है, समय लगता है, शारीरिक या मानसिक ऊर्जा लगती है, अनेक में धन भी लगता है.

मजदूरी में भी घन को छोड़ कर करीब-करीब इन्हीं चीजों की आवश्यकता अथवा खपत होती है. मगर इन दोनों के बीच जो सबसे बड़ा फर्क होता है, वह यह होता है कि मजदूरी में हमेशा अधीनता पायी जाती है, जबकि काम में ऐसी बात नहीं होती है.

उपर्युक्त शर्तों को यदि पूरा कर दिया जाये, तो काम बन जाता है. अर्थात् उसे कार्य की संज्ञा दी जा सकती है. और कार्य करने वाले को कामगार कहा जा सकता है.परन्तु मजदूरी उसे कहते हैं, जिसमें कार्यरत् व्यक्ति अथवा कामगार किसी के अधीन हो, उसके कार्य में प्राधीनता की स्थिति हो अर्थात् वह व्यक्ति जो मजदूरी करता है, वह हमेशा किसी के लिए या किसी के अधीन काम करता है. किसी के मातहत कार्य करता है. किसी के हुक्म पर काम करता है. किसी के आदेशानुसार काम करता है. साधरणतः उसे स्वयं निर्णय लेने की स्वाधीनता नहीं रहती. और यदि वह निर्णय लेता भी है, तो उसे उसका जवाब देना पड़ता है. जिसके मातहत या जिसके लिए काम करता है, उसके प्रति उसकी जवाबदेही हमेशा बनी रहती है. मजदूर हमेशा किसी के लिए काम करता है, वहीं कामगारों के साथ ऐसी विवशता नहीं देखी जाती.

और पढ़ें ...

 

आइये हम बलात्कार के लिए प्रस्तुत हैं.

आइये, हम बलात्कार के लिए प्रस्तुत हैं. छाम्मक्छल्लो फिर से बहुत प्रसन्न है. वह प्रसन्न है कि माननीय उच्चतम न्यालालय ने एक मानसिक रूप से विकलांग लड़की के माँ बनाने के अधिकार को सुरक्षित रखा. वह लड़की माँ इसलिए नही बन रही है कि उसकी शादी हुई है और विवाह बंधन में बंध कर वह माँ बनने जा रही है. जी नहीं, हमारा समाज इतना उदार नही है कि वह किसी भी लड़की से अपने होनहार, बीरावान के हाथ पीले कर दे, न ही हमारे ऐसे वीर-बाँकुरे हैं जो इस तरह की लड़कियों के हाथ थाम ले. गिने-चुने उदाहरण हो सकते हैं. मगर यह हमारा देश और इसके नागरिक जबरन कुछ भी लेने में अपनी वीरता समझते हैं. चाहे वह किसी का कुमारी हो, किसी का मान हनन हो या कुछ और. अखबार में छपी खबर के मुताबिक वह लड़की चंडीगढ़ के नारी-निकेतन में रहती थी और वहा उसके साथ रैप किया गया. यह कितनी खुशी की बात है. रक्षण स्थान पर शिकार!

और पढ़ें ...

 

सरायकेला-खरसावा के हितैषी हैं

उपायुक्त राजेश कुमार शर्मा 

सरायकेला-खरसावां के छठें उपायुक्त राजेष कुमार शर्मा के द्वारा इस जिले में कराये जा रहे विकास कार्य से इस जिले की पहचान विकसित होने लगी है। श्रीशर्मा के योगदान देने के पश्चात से इस जिले में एक ओर जहां मौलिक सुविधाऐं स्वास्थ्य, सड़क एवं षिक्षा को काफी सषक्त किया गया है वहीं दूसरी ओर उपायुक्त के द्वारा कृषि को प्रोत्साहित किये जाने के लिए गम्भीर प्रयास किये गये। जिसका प्रतिफल यह है कि पत्थर वाले क्षेत्र में भी किसानों ने फूल उत्पादन कर एक नया कृर्तिमान बनाया है।

और पढ़ें ...

 
Google Search
अभी कौन है
हमने 3 अतिथियों ऑनलाइन
पथिक संख्या
mod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_counter
mod_vvisit_counterआज18
mod_vvisit_counterकल65
mod_vvisit_counterइस सप्ताह284
mod_vvisit_counterइस माह1809
mod_vvisit_counterकुल28100
Breaking News
जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन