| फाइलें दौड़ रही हैं, |
आम लोगांे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि एक दो मगरमच्छों से क्या झारखंड के तालाब में तो मगरमच्छों की भरमार है। दो-चार से क्या होने वाला। चलो संतोष यह है कि ऊँट के मुह में जीरा ही सही। झारखंड के मंत्री अरबपति और अफसर करोड़पति है। नये राज्यपाल महोदय आये तो झारखंड में उन्हें सूखा और उग्रवाद ने स्वागत किया। सूखे से निपटने के लिए ग्रामीण स्तर पर उन्होंने आपाधापी में दो कार्य आरंभ किये। पहले कि आंगनवाड़ी सेविका की बहाली युद्ध स्तर पर करने के आदेश दिये। आदेश फैक्स के जरिये उपायुक्त तक पहुंचा। उपायुक्त के होश उड़ गये। वे नपना नहीं चाहते थे, सो दौड़ा दिये अपने माहततों को। आदेश दिया कि अब चाहे जैसे भी हो, जिस तरह हो, घर बैठे या फिल्ड में जाकर, तुरंत बहाली कर जानकारी दें। नहीं, तो नप जायेंगे। अनुमंडल अधिकारी देर रात तक जग कर आनन-फानन में बहाली कर डाले। इस आपाधापी में 10-5 इधर-उधर हो भी गये हों, तो दोष किसी का नहीं हो सकता। समय का हो सकता है। जो कार्य वर्ष में नहीं कर सकी, वो कार्य राज्यपाल महोदय ने महीनों में नहीं, बल्कि दिनों कर दिखाया। धन्यवाद! के पात्र हैं राज्यपाल महोदय। काम कैसे नहीं हो सकता या काम कैसे होता है, कर दिखला दिया। इन आंगनबाड़ी सेविकाओं का दायित्व है कि कार्य को जिम्मेदारी से निभायें। अब राज्यपाल महोदय गाँव-गाँव, घर-घर घूम कर काम करने तो नहीं जायेंगे। यदि ईमानदारी से काम करे, तो ग्राम का निश्चय ही भाग्योदय हो जायेगा। दूसरा काम राज्यपाल महोदय ने किया कि 1000 की आबादी पर एक-एक राशन दुकान खोलने के लिए आनन-फानन में लाइसेंस देने का निर्णय लिया गया। वह लाइसेंस भी महिलाओं के स्वयंसहायता समूह को दिया गया। इस निर्णय के पीछे गाँव-गाँव में राशन की उपलब्धता सुनिश्चित कराना था। इसमें भी उपायुक्त, अंचलाधिकारी से लेकर प्रखंड के कर्मचारी तक गाँव-गाँव में जाकर स्वयं सहायता समूह से विनती करने लगे कि दीदी-बहना, तुम राशन दुकान का लाइसेंस ले लो। कोई पूछती कि कैसे करना है। क्या हमलोगों को राशन लाने के लिए दौड़ना पडे़गा। क्या हमलोगों को भी सप्लाई विभाग के अफसरों, इंस्पेक्टरों से पाला पड़ेगा। कितना फायदा होगा। तो कोई पूछती कि कितना पैसा लगेगा, तो कर्मचारी बोलते कि बहना हमको कुछ नहीं मालूम। तुम जल्दी से लाइसेंस ले लो। यह सब हमकों नहीं मालूम। धीरे-धीरे पता चल जायेगा। भले बाद में बंद कर देना पर अभी ले लो, नहीं तो हम नप जायेंगे। लाइसेंस लेने में जरूरी कागजात कुछ 19-20 था, उसे जल्दीबाजी में दुरूस्त कर लिया गया। आनन-फानन में लाइसेंस मिल गया। सोचने का यह भी है कि यही अफसर, यही कर्मचारी कैसे आनन-फानन में रात-दिन एक करके आदेश का पालन कर रहे हैं और यही कर्मचारी मंत्रियों के आदेश को डस्टबीन में फेंक देते थे। एक राज्यपाल से जितना डर लग रहा है, वे इतने मंत्रियों और अफसरों से क्यांे नहीं डरते थे। जाहिर है, उस वक्त सभी एक टेबल पर बैठकर रसमलाई खा रहे थे, तो फिर डर कैसा और किसका डर? महिला समूहों को राशन दुकान का लाइसेंस देने के पीछे मकसद यही था कि अभी तक राशन डीलर गाँव तक राशन पहुँचाते ही नहीं, बल्कि उनका ब्लैक शहरों में ही कर देते थे, उनसे उन्हें निजात दिलाना था। गाँव-गाँव में राशन दुकान होने के कारण और खास कर महिला समूहों के हाथों में डीलरशीप होने के कारण गाँव-गाँव में राशन पहुँच तक तो पायेगा। सही वितरण हो पायेगा। दूर-दराज के गाँवों में गरीब से गरीब तक अनाज पहुँच पायेगा। दोनो ही कार्यक्रमों के विचार नेक है। सामाजिक है, पर इनका क्रियान्वयन कैसे हो पायेगा? इनकी सफलता के पीछे यही एक यक्ष प्रश्न है। योजनाएँ सारी अच्छी होती हैं। दोष उनके क्रियान्वयन में होता है। क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं हो पाता। जिस राज्य में पगार, बकाया पगार, पेंशन तक लेने के लिए अपने ही भाई-बंधु को रिश्वत देने पड़ते हैं। उस राज्य में यह कैसे मान लिया जाए कि फाइलें तेजी से बढ़ेगी। राज्यपाल महोदय को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राशन दुकान जो खुले हैं, उन तक समय पर बिना रिश्वत दिये राशन पहुँचे। उनका सही प्रकार से वितरण हो। यह भी देखना है कि आंगनबाड़ी सेविका को जिम्मेदार और जिम्मेवार कैसे बनाया जाए। राज्यपाल महोदय को यह भी देखना है कि बड़े-बड़े मगरमच्छ, जो आदमी को जिन्दा निगल कर गहरे पानी में डूबकी लगा कर बैठ हैं, उन्हें कैसे जाल में फंसाया जाए। अभी तो सूर्योदय की बेला है। देखना है, दोपहर होते-होेते राज्यपाल महोदय क्या कर पाते हैं। दोपहर बाद न जाने सत्ता किसके हाथ जाए! विजय रंजन |
मजदूर बनाम कामगार
म जदूरी शब्द स्वयं में ही बड़ा त्रासदी भरा शब्द है. और उसके साथ जब बाल लग जाए तब तो फिर वह और भी मार्मिक बन जाता है. यहाँ यह बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि काम और मजदूरी दोनो में बड़ा फर्क है. सतही तौर पर देखने से तो यह कहा जा सकता है कि जो काम करता है.वह मजदूरी करता है और दुनिया का लगभग हर व्यक्ति किसी ने किसी रूप में कार्य रत् होता है. अर्थात् इस हिसाब से दुनिया का हर व्यक्ति मजदूर हो गया. परन्तु इस विषय वस्तु की गहराई में जाकर इस पर दृष्टिपात किया जाये, तो यह स्पष्ट हो पायेगी कि हर व्यक्ति मजदूर नहीं है. क्योंकि कार्य और मजदूरी इन दोनों का यदि अलग-अलग विश्लेषण किया जाये, तो हमें पता चलेगा कि इन दोनों में बड़ा भेद है. साधारणतः कार्य वह होता है, जो व्यक्ति विशेष के द्वारा किया जाता है. जिसमें श्रम लगता है, समय लगता है, शारीरिक या मानसिक ऊर्जा लगती है, अनेक में धन भी लगता है.
मजदूरी में भी घन को छोड़ कर करीब-करीब इन्हीं चीजों की आवश्यकता अथवा खपत होती है. मगर इन दोनों के बीच जो सबसे बड़ा फर्क होता है, वह यह होता है कि मजदूरी में हमेशा अधीनता पायी जाती है, जबकि काम में ऐसी बात नहीं होती है.
उपर्युक्त शर्तों को यदि पूरा कर दिया जाये, तो काम बन जाता है. अर्थात् उसे कार्य की संज्ञा दी जा सकती है. और कार्य करने वाले को कामगार कहा जा सकता है.परन्तु मजदूरी उसे कहते हैं, जिसमें कार्यरत् व्यक्ति अथवा कामगार किसी के अधीन हो, उसके कार्य में प्राधीनता की स्थिति हो अर्थात् वह व्यक्ति जो मजदूरी करता है, वह हमेशा किसी के लिए या किसी के अधीन काम करता है. किसी के मातहत कार्य करता है. किसी के हुक्म पर काम करता है. किसी के आदेशानुसार काम करता है. साधरणतः उसे स्वयं निर्णय लेने की स्वाधीनता नहीं रहती. और यदि वह निर्णय लेता भी है, तो उसे उसका जवाब देना पड़ता है. जिसके मातहत या जिसके लिए काम करता है, उसके प्रति उसकी जवाबदेही हमेशा बनी रहती है. मजदूर हमेशा किसी के लिए काम करता है, वहीं कामगारों के साथ ऐसी विवशता नहीं देखी जाती.
आइये हम बलात्कार के लिए प्रस्तुत हैं.
सरायकेला-खरसावा के हितैषी हैं
उपायुक्त राजेश कुमार शर्मा सरायकेला-खरसावां के छठें उपायुक्त राजेष कुमार शर्मा के द्वारा इस जिले में कराये जा रहे विकास कार्य से इस जिले की पहचान विकसित होने लगी है। श्रीशर्मा के योगदान देने के पश्चात से इस जिले में एक ओर जहां मौलिक सुविधाऐं स्वास्थ्य, सड़क एवं षिक्षा को काफी सषक्त किया गया है वहीं दूसरी ओर उपायुक्त के द्वारा कृषि को प्रोत्साहित किये जाने के लिए गम्भीर प्रयास किये गये। जिसका प्रतिफल यह है कि पत्थर वाले क्षेत्र में भी किसानों ने फूल उत्पादन कर एक नया कृर्तिमान बनाया है। |






विचारों की अभिव्यक्ति पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं होती। लोग अपनी तरह से विचार व्यक्त करते रहते हैं। अब झारखंड के पूर्व राज्यपाल के क्रियाकलापों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लोग कहते थे कि राज्यपाल महोदय पूर्व के मंत्रियों की तरह उगाही में लगे थे और मंत्रियों की तरह झारखंड को लूटा। उन्होंने पूर्व की तरह ट्रांस्फर पोस्टिंग उद्योग को बरकरार रखा। अब कारण चाहे जो भी हो, पर रजी साहब विदा हो गये हैं और नये राज्यपाल के.शंकरनारायणन आये तो कहा जाने लगा कि ये झारखंड में कांग्रेस के प्रतिनिधि बन कर आये हैं और चुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाने के लिए केन्द्र से भेजे गये हैं। इन विवादों या दलीलों में जाने से बेहतर है कि विदा होते रजी और स्वागत शंकरनारायणन के समय को देखें, जिसमें झारखंड के मगरमच्छों को जाल में फंसाया गया। उस जाल मं इन मगरमच्छों के करोड़ों की सम्पत्ति, अनेक जमीन-जायदाद फंसे। 


आइये, हम बलात्कार के लिए प्रस्तुत हैं. छाम्मक्छल्लो फिर से बहुत प्रसन्न है. वह प्रसन्न है कि माननीय उच्चतम न्यालालय ने एक मानसिक रूप से विकलांग लड़की के माँ बनाने के अधिकार को सुरक्षित रखा. वह लड़की माँ इसलिए नही बन रही है कि उसकी शादी हुई है और विवाह बंधन में बंध कर वह माँ बनने जा रही है. जी नहीं, हमारा समाज इतना उदार नही है कि वह किसी भी लड़की से अपने होनहार, बीरावान के हाथ पीले कर दे, न ही हमारे ऐसे वीर-बाँकुरे हैं जो इस तरह की लड़कियों के हाथ थाम ले. गिने-चुने उदाहरण हो सकते हैं. मगर यह हमारा देश और इसके नागरिक जबरन कुछ भी लेने में अपनी वीरता समझते हैं. चाहे वह किसी का कुमारी हो, किसी का मान हनन हो या कुछ और. अखबार में छपी खबर के मुताबिक वह लड़की चंडीगढ़ के नारी-निकेतन में रहती थी और वहा उसके साथ रैप किया गया. यह कितनी खुशी की बात है. रक्षण स्थान पर शिकार!









