| कैसे मनाएँ आजादी का जश्न? |
आजादी की 62वीं वर्षगाँठ पर शुभकामनाएँ देने और लेने के बाद, जो समय बचा उसमें एक प्रश्न बार-बार उठा कि स्वतंत्राता का यह राष्ट्रीय पर्व हमें छूअन के एहसास क्यों नहीं दिलाता? मानसिक रूप से क्यों नहीं झकझोरता? हमें उत्प्रेरित क्यों नहीं करता? आजादी के बजते गीत अब कानों को अच्छे क्यों नहीं लगते? इन प्रश्नों के उत्तर ढ़ूंढ़ना उतना आसान नहीं है। ये प्रश्न हमारे सामने आजादी के बाद से ही यक्ष प्रश्न की तरह खडे़ हैं।एक बात, जो जन-जन पूछ रहा है कि आजादी के 62 वर्ष के बाद भी गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की इतनी संख्या क्यों है? आज भी देश में गरीबी इतनी क्यों है? आज भी कृषि प्रधन देश में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? आज आजादी के इतने बरस बाद भी गाँवों में गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, आतंकवाद, बुनियादी समस्याएँ ज्यों की त्यों, क्यों है? गाँव की छोड़ दीजिए शहरों में महानगरों में क्यों झोपरपट्टी बढ़ती जा रही है? आज नक्सलवाद क्यों बढ़ता जा रहा है? आदमी के सिर पे जितने बाल हैं, उससे कहीं ज्यादा सवाल हैं, देश के भाग्य विधता से। आदमी के दो आँखें होती हैं। एक में प्यार बसता है, तो दूसरी में आँसू। जिन आँखों में प्यार बसता है, उनकी पूँजी हर साल करोड़ो-अरबों में बढ़ती जाती हैं। ये हैं -नेता, अपफसर, दलाल, सटोरिए, पूंजीपति, सेठ-साहूकार। ऐसा कैसे हो गया कि एक घर में दिन भर चूल्हा नहीं जलता, दूसरे घर में दिन भर चूल्हे पर दुध् की मलाई बनती रहती है?आज ऐसा क्यों हुआ कि राशन के लिए, गैस के लिए, बिजली के लिए, न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है या फिर सड़कों पर उतरना पड़ता है? वैसे, तो गरीबों को न्याय कहाँ मिलता है! एक केस फाइल करने में 10-20 हजार रुपये लगते हैं और न्याय पाने के लिए 10-20 वर्ष लग जाते हैं?अनगिनत प्रश्न इन तिरंगे झंडे के धगों में उलझे हैं, हम फिर कैसे मनाएँ आजादी का जश्न? हालत तो ये है, ‘‘आजादी का ये जश्न मनाए वे किस तरह, जो आ गये फूटपाथ पर घर की तलाश में?’’ अरुण कुमार झा
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मजदूरीनामा

१ मई अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस दुनिया भर में मजदूर के नाम पर मनाया जाता है। इस दिन को उन मजदूरों की याद में श्रद्धांजलिस्वरूप मनाया जाता है. इनकी लाशें पूंजीतियों एवं सामंतवादी विचारधारा के लोगों के द्वारा सिर्फ इस लिए बिछा दी गयीं थीं कि उन्होंने अपनी मेहनत के एवज में अपनी जायज मांगों को पूरा करने की मांग करने की हिमाकत दिखाया था. साधारनतः दिवसों को किसी खुशी अथवा गम के रूप में मनाया जाता है, मगर मजदूर दिवस गम के साथ-साथ एक ऐसे दिवस के रूप में मनया जाता है, जो हर साल दुनिया के मजदूरों के दिल और दिमाग को एक ऐसा एहसास दिलाता है कि तुम दबे रहो, कुचले रहो, तुम्हे अपनी उचित मांगों को मांगने का भी अधिकार नहीं है. तुम अपने खून-पसीनों को बहाते रहो. अमीरों की गुलामी करते रहो. पसीना बहाकर पानी छान कर लाकर बलवानों का पैर धेते रहो, तुम्हे दबे रहना है. तुम्हे कुचले रहना, तुम्हे अपना मुँह खोलने का अधिकार नहीं है. तुम सामंतो की केवल सेवा करते रहो, उन्हें खुश करते रहो, जिसके बदले में तुम्हारे सामने रोटी डाल दी जायेगी. तुम्हे जरा भी विरोध नहीं करना है. तुम सिर्फ सेवा करने के लिए ही बने हो. क्यों कि तुम ;मजदूर तो इन सामंतवादियों की दृष्टि में मनुष्य नहीं हो? तुम तो केवल हार-मांस के एक टूकड़े हो. तुम्हें इन अमीरों, बाहुबलियों की बराबरी क्यों और कैसे कर सकते हो. तुम तो कमजोर हो. और भला कमजोरों को खुश रहने का अधिकार है? क्या गरीबों को अपनी चाहतों को पूरा करने का अधिकार है? क्या मजदूरों को सामर्थवानों की बराबरी करने का अधिकार है? नहीं न! तुम स्वयं को मनुष्य होने की भूल क्यों करते हो. तुम अपनी औकात? में रहो. वरन् तुम जरा सा भी हिले, तुमने जरा भी अमीरों की बराबरी करने की
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चारा वाला बाबा‘‘का हो हरिशंकर बाबू! गुरुजी को नापिए दिए न’’. हरिशंकर बाबू पान की बट््टी पाॅकेट से निकालते हुए बोले.
‘‘हम का नापेंगे, गुरुजी के अपने ही लोग मिलकर नाप दिये. गुरुजी बेचारे साँप का मंतर जानते नहीं और जब देखिए, तब बिल में हाथ डालते रहते हैं. डँसवायेंगे नहीं, तो और क्या होगा. बेचारे जब हाथ डालते हैं, तब साँप डँस लेता है. अब तो साँप के जहर से उनका देह में जहर भर गया है और देहवे करिया हो गया है.’’ ठाकुरजी गुरुजी का पक्ष लेते हुए बोले. इस पर तिवारीजी थोड़ा चुटकी लेते हुए बोले, ‘‘अरे ऊ सब बात नहीं है. गुरुजी ठहरे बेचारे सीधे-सादे. लोटा लेके देहात में मैदान जाने वाले और लोग उनको इटालियन संडास मंे भेज देते हैं. अब बेचारे परेशान नहीं होंगे, तो और क्या होंगे! सब लोग हँसने लगे. इसी बीच सामने से पलटनवा धड़फड़ आते हुए दीख पड़ा. साथ मंे मिसिर बाबा भी थे. भारत की विशाल संपदा स्विट्जरलैंड में क्यों?
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