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नवम्‍बर  2009
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बहुत बेचैन है अखबार की दुनिया

 

बहुत बेचैन है अखबार की दुनिया

-संजय द्विवेदी

अखबार की दुनिया इन दिनों खासी बेचैन है । बाजार के दबाव और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच उलझी अखबारी दुनिया नए रास्तों की तलाश में है । तकनीक की क्रांति, अखबारों का बढ़ता प्रसार, संचार के साधनों की गति ने इस समूची दुनिया को जहां एक स्वप्नलोक में तब्दील कर दिया है वहीं पाठकों से उसकी रिश्तेदारी को व्याख्यायित करने की आवाजें भी उठने लगी हैं ।
ज्यादा पृष्ठ और ज्यादा सामग्री देकर भी आज अखबार अपने पाठक से जीवंत रिश्ता जोड़ने में स्वयं को क्यों असफल पा रहे हैं, यह मीडियाकर्मियों के सामने एक बड़ा सवाल है । क्या बात है कि जहां पहले पाठक को अपने खासअखबार की आदत लग जाती थी । वह उसकी भाषा, प्रस्तुति और संदेश से एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता था, अब वह आसानी से अपना अखबार बदल लेता है ।

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तितली रंग फूल खुशबू
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स्निग्ध छटामय हो परिज़ाद 
गुलमोहर भरमाया था 
अद्भुत रूप नैनों में भर लूँ 
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झिलमिल रोशन तारे चमके 
चाँद जरा शरमाया था
झरती चाँदनी आँचल में लूँ 
श्रृंगारित हो गाया था
एम.ए. शर्मा ’सेहर’