Sahitya
झारखंड का प्रकाश स्तम्भ साहित्यकार राधकृष्ण जी की एक अनुपम कृति-एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी समय व्यतीत होता जा रहा है ओर यह कहानी अभी तक चल रही है। मगर इस कहानी के शीर्षक को लेकर भ्रम हो जाता है, क्योंकि शीर्षक के साथ कहानी की संगति नहीं बैठती। अतएव, लगता है कि इस कहानी के शीर्षक के संबंध् में एक टिप्पणी की आवश्यकता है। सन 1942-43 का समय था, जब बंगाल में अकाल से और मिथिला में मलेरिया और भूखमरी से लोग मरते जा रहे थे। बंगाल में मरनेवालों की कहानियाँ उजागर हो रही थी, लेकिन बिहार की बातों पर ब्रिटिश सरकार के आतंक से एक पर्दा-सा पड़ा हुआ था। उस समय केवल एक ‘इंडियन नेशन’ था, जो मिथिला के बारे में तब तक लिखता रहा जब तक कि उसके प्रधान संपादक को अपनी नौकरी से हाथ नहीं धेना पड़ा। उस समय बिहार सरकार के सलाहकार थे श्री वाई.एस. गोडबोले। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में बतलाया था कि मलेरिया आदि से मिथिला मंे मरनेवालों की संख्या है ‘‘एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी’’। उसी वक्तव्य को देखकर यह कहानी लिखी गयी थी। यह एक ही परिवार की कहानी नहीं, बल्कि यह एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी व्यक्तियों की अकाल मृत्यु की करुण कहानी है। इसी कारण इस कहानी का शीर्षक ऐसा है। पहले यह कहानी गौडबोले साहब के वक्तव्य के साथ ही छपती थी। कलान्तर में उद्धृत करनेवालों ने वक्तव्य को छोड़ दिया। उसके बाद यह कहानी छात्रों को पढ़ाई जाने लगी। तब से हमेशा यह सवाल पैदा होता रहा कि इस कहानी का शीर्षक ऐसा क्यों है?
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