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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 

Sahitya

झारखंड का प्रकाश स्तम्भ साहित्यकार राधकृष्ण जी की एक अनुपम कृति-

एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी

समय व्यतीत होता जा रहा है ओर यह कहानी अभी तक चल रही है। मगर इस कहानी के शीर्षक को लेकर भ्रम हो जाता है, क्योंकि शीर्षक के साथ कहानी की संगति नहीं बैठती। अतएव, लगता है कि इस कहानी के शीर्षक के संबंध् में एक टिप्पणी की आवश्यकता है। सन 1942-43 का समय था, जब बंगाल में अकाल से और मिथिला में मलेरिया और भूखमरी से लोग मरते जा रहे थे। बंगाल में मरनेवालों की कहानियाँ उजागर हो रही थी, लेकिन बिहार की बातों पर ब्रिटिश सरकार के आतंक से एक पर्दा-सा पड़ा हुआ था। उस समय केवल एक ‘इंडियन नेशन’ था, जो मिथिला के बारे में तब तक लिखता रहा जब तक कि उसके प्रधान संपादक को अपनी नौकरी से हाथ नहीं धेना पड़ा। उस समय बिहार सरकार के सलाहकार थे श्री वाई.एस. गोडबोले। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में बतलाया था कि मलेरिया आदि से मिथिला मंे मरनेवालों की संख्या है ‘‘एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी’’। उसी वक्तव्य को देखकर यह कहानी लिखी गयी थी। यह एक ही परिवार की कहानी नहीं, बल्कि यह एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी व्यक्तियों की अकाल मृत्यु की करुण कहानी है। इसी कारण इस कहानी का शीर्षक ऐसा है। पहले यह कहानी गौडबोले साहब के वक्तव्य के साथ ही छपती थी। कलान्तर में उद्धृत करनेवालों ने वक्तव्य को छोड़ दिया। उसके बाद यह कहानी छात्रों को पढ़ाई जाने लगी। तब से हमेशा यह सवाल पैदा होता रहा कि इस कहानी का शीर्षक ऐसा क्यों है?

      

   यह मिथिला है। देखिए, गाँव के किनारे कोसी नदी बहती जाती है। सामने वह बूढ़ा पीपल है। पीपल के नीचे कभी का तालाब है। वहाँ पक्का घाट है। पुराने जमाने के किसी जमींदार ने इस घाट को बनवाया था। अब के जमींदार तो मुकदमा लड़ते हैं, मैनेजर और रंडी रखते हैं, शराब पीते हैं, और बंगला बनवाते हैं। घाट-वाट बनवाने के फेरे में नहीं पड़ते। सो घाट र्की इंटें दरक गयी है, पलस्तर छूट गया है, टूटी सीढ़ियों में काई जमी रहती है। यह घाट हमारे काम का नहीं। वहाँ तो बस स्त्रियाँ नहाती है। हम बाल-गोपाल घाट की बगल से नदी में उतरते हैं। वहीं गाय और भैंसों को धोते हैं, छपाछप खूब स्नान करते हैं और सर्र-सर्र पानी में तैरते हैं। उस पीपल पर, कहते हैं, भूत भी ऐसा कि ब्रह्मपिशाच। गाँव वाले कहते हैं कि रात को वह घाट पर बैठा रहता है। अगर कोई उधर जा निकला, तो उसे मार डालता है। हम लोग रात में कभी उधर गये ही नहीं। जाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। पता नहीं ब्रह्मपिशाच की बात कहाँ तक सच है।

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हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम

 

 

 हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम

दिया तुम्ही ने जीने का

जग में मुझको सुन्दर ज्ञान

हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम।

 

माता ने तो जन्म दिया है

और पिता ने बस एक नाम

इनसे भी अनमोल रत्न-धन

गुरु ने दी मेरी पहचान।

 

मैं शीष झुकाऊँ आदर से

ले गुरु चरणन का नाम

आशीर्वाद हमें दो गुरुवर

कुछ करूँ जगत में काम।

 

अन्धकार से मुझे बचाकर

आँखों में ज्याति डाली

देख सका मैं अन्तर्मन से

चहुँओर उषा की लाली।

 

वरद हस्त रखना प्रभु हरदम

जिससे मंजिल को पा लूं

अज्ञान डगर मंे भटक न जाऊँ

नभ के तारे भी छू लूँ।

श्रद्धा सुमन समर्पित गुरुवर

आज करूँ मैं तेरे नाम

आशाओं के दीप जलाकर

हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम।

 गिरीन्द्र प्रसाद

 

हम अखबार वाले हैं

प्रयोक्ता योग्यता निर्धारण: / 1
ऊसरउत्कृष्ट 

मको जानते हो... हम कौन हैं? जरा तमीज से बात करो हमसे वरना हम........छाप देगे।क्या बात है। आज शहर हो या प्रदेश या फिर देश-दुनिया किसी भी स्थान पर देखने को मिल जाते हैं 'प्रेस' को अपने नाम के साथ जोडऩे वाले। प्रेस का मतलब इनके लिये किसी संस्थान में नौकरी करने वाला एक कर्मचारी नहीं बल्कि खुद प्रेस मालिक अर्थात अखबार वाला होता है। हर किसी से बोलने का लहेजा भी कुछ अलग होता है इनका।
कुलदीप कुमार मिश्र 

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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन