पिता ने वषों नाईट शिफ्ट करके बनाये थे पैसे और ली थी एक कट्ठा जमीन, पिता जाते थे - दौरे पर बचाते थे पैसे खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट...... पिता ने कर्ज लिए थे , ऑफिस से सवारी और घर अग्रिम के खाते में फिर खडी की थी दीवारें, पिता ने बेच दिए थे माँ के गहने माँ हो गई थी क्षत-विक्षत इस प्रकार ढली थी छत, पिता बैठे हैं उसी घर के बाहर जिनके लिए कोई भी कमरा खाली नहीं है, पिता सोते हैं ओसारे में चरमराती चारपाई पर पीते हैं बीडियां बकते हैं गालियाँ छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों माँ भी नहीं रही अब खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच बेटे सिर झुकाए अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते आज बडकी/मझली /संझली कोई न कोई दो रोटी दे ही देंगी पिता को कल ही तो उसने दी थी आज फिर ....ना बाबा ना ..... मेरे भी तो..... घर नहीं रह गया पिता का पिता नहीं रह गए बेटों के कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ इसी जीवन यात्रा में.... ताड़ के रिश्ते तले बोनसाई हो गया पिता