magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 
The latest news from the Drishtipat Team
title Filter     प्रदर्शन # 
# अनुच्छेद शीर्षक लेखक हीटस
1 गुरूनानक के दार्शनिक विचार Arun Kumar Jha 101
2 मजहब से न जोड़ें आतंकवाद को Arun Kumar Jha 72
3 गांधीजी पर विशेष लेख Arun Kumar Jha 108
4 गांधीजी पर विशेष लेख Arun Kumar Jha 78
5 फिरंगिया कहता है! Arun Kumar Jha 56
6 क्षमा कुलश्रेष्ठ का कारनामा Arun Kumar Jha 99
7 जब इंसान लाचार होता है Arun Kumar Jha 87
8 विधायिका और न्यायपालिका के सही फैसले Arun Kumar Jha 88
9 समान शिक्षा की गारंटी से ही बचेगा देश Arun Kumar Jha 110
10 झारखंड पुलिस को मिली बड़ी सपफलता Arun Kumar Jha 110
Google Search
पथिक संख्या
mod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_countermod_vvisit_counter
mod_vvisit_counterआज35
mod_vvisit_counterकल65
mod_vvisit_counterइस सप्ताह167
mod_vvisit_counterइस माह519
mod_vvisit_counterकुल20209
Breaking News
बोनसाई

बोनसाई
 
पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खडी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पीते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता


"विजय रंजन"