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05 | 07 | 2009
Newsflash
साम्प्रदायिकता के खिलाफ जनादेश
१५ वें  लोकसभा चुनाव ऐतिहासिक चुनाव साबित हुआ है. खबरों के धंधेबाजों  एवं चुनाव पश्चात् और चुनाव परिणाम के पूर्व अटकलों में समय नष्ट करने वाले संस्थान और व्यक्तियों से लेकर ज्योतिषियों के सभी भविष्यवाणी  झूठलाते हुए, जो जनादेश आया है, वह कोई चौंकाने  वाला नहीं है. ऐसा कई बार हो चुका है.  
 आज हमारे देश की अधिकांश जनता भयभीत है. उनके दिल में सामाजिक असुरक्षा के भाव भरे हुए है. वह अपने को अकेले और डरे-सहमे रूप में महसूस कर रही है. इसके चलते ही स्वार्थी और अवसरवादी नेता इन्हें आसानी से ठगते रहे हैं. कभी जातपात के नाम पर, तो कभी धर्म-समुदाय के नाम पर, तो कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर. लड़वाते और मरवाते रहे हैं. 
 भूख-प्यास और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे पर कभी अपना मुँह नहीं खोलने वाले ये नेता जरूरी सामाजिक मुद्दों पर कभी कोई आन्दोलन नहीं छेड़ा. अपने चुनावी एजेण्डा में कभी इसे शामिल नहीं किया. नतीजा हर बार जनता अपना गिरवी वोट से इन्हें राजा बनाती रही. लोकतंत्र का बेजा फायदा इन्हें पहुँचाती रही. ये नेता जो 5 साल पहले सड़कों पर मवालीगिरी करते थे, दो जून की रोटी भी नसीब न थी इन्हें, वे सांसद और विधायक बनते ही 3-5 साल मंे करोड़ों के मालिक बन बैठे. बादशाह बन बैठे, लेकिन अब जनता जाग रही है. पढ़ेलिखे युवाओं की भागीदारी राजनीति को एक दिशा प्रदान करने लगी है. 
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साम्प्रदायिकता के खिलाफ जनादेश
१५ वें  लोकसभा चुनाव ऐतिहासिक चुनाव साबित हुआ है. खबरों के धंधेबाजों  एवं चुनाव पश्चात् और चुनाव परिणाम के पूर्व अटकलों में समय नष्ट करने वाले संस्थान और व्यक्तियों से लेकर ज्योतिषियों के सभी भविष्यवाणी  झूठलाते हुए, जो जनादेश आया है, वह कोई चौंकाने  वाला नहीं है. ऐसा कई बार हो चुका है.  
 आज हमारे देश की अधिकांश जनता भयभीत है. उनके दिल में सामाजिक असुरक्षा के भाव भरे हुए है. वह अपने को अकेले और डरे-सहमे रूप में महसूस कर रही है. इसके चलते ही स्वार्थी और अवसरवादी नेता इन्हें आसानी से ठगते रहे हैं. कभी जातपात के नाम पर, तो कभी धर्म-समुदाय के नाम पर, तो कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर. लड़वाते और मरवाते रहे हैं. 
 भूख-प्यास और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे पर कभी अपना मुँह नहीं खोलने वाले ये नेता जरूरी सामाजिक मुद्दों पर कभी कोई आन्दोलन नहीं छेड़ा. अपने चुनावी एजेण्डा में कभी इसे शामिल नहीं किया. नतीजा हर बार जनता अपना गिरवी वोट से इन्हें राजा बनाती रही. लोकतंत्र का बेजा फायदा इन्हें पहुँचाती रही. ये नेता जो 5 साल पहले सड़कों पर मवालीगिरी करते थे, दो जून की रोटी भी नसीब न थी इन्हें, वे सांसद और विधायक बनते ही 3-5 साल मंे करोड़ों के मालिक बन बैठे. बादशाह बन बैठे, लेकिन अब जनता जाग रही है. पढ़ेलिखे युवाओं की भागीदारी राजनीति को एक दिशा प्रदान करने लगी है. 
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माइकल जैक्सन ने चुकाई कामयाबी की कीमत पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
शुक्रवार, 03 जुलाई 2009 01:50
विख्यात पॉप स्टार माइकल जैक्सन को भी अन्य सितारों की तरह शोहरत और कामयाबी की मंजिल हासिल करने के लिए बडी कीमत चुकानी पडी थी। स्टेज पर बिजली-सी चपलता के साथ डांस करने वाले जैक्सन ने इतनी बार कॉस्मेटिक सर्जरी कराई थी कि उनकी नाक की हड्डी तक नहीं बची थी। त्वचा का रंग बदलने के प्रयोग के कारण उन्हें धूप में निकलने की मनाही थी। जैक्सन पिछले कुछ वर्षों में कुछ ही मौकों पर सार्वजनिक तौर पर दिखाई दिए थे। उस दौरान उनके शरीर का अधिकांश हिस्सा यहाँ तक कि चेहरा भी ढँका रहता था। अंतिम समय में तो जैक्सन हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गए थे। उनके शरीर पर जगह-जगह सुइयों के निशान ही दिखाई देते थे और भोजन के रूप में वे सिर्फ दर्द निवारक गोलियाँ लेते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे खुद के भ्रम और संदेह के किले में कैद होकर रह गए थे, जहाँ यातना देने वाला और उसे सहने वाला व्यक्ति एक ही होता है। मुम्बई फिल्म उद्योग के चकाचौंध भरे ग्लैमर वर्ल्ड में अक्सर एक बात कही जाती है कि रील लाइफ यानी परदे की जिन्दगी और रीयल लाइफ यानी वास्तविक जिन्दगी में बहुत फर्क होता है। कड़े संघर्ष के बाद कलाकार को सितारों की दुनिया में जब कामयाबी मिलती है तो उसके मन के जगत में भी बहुत परिवर्तन होते हैं। रील लाइफ और रीयल लाइफ का यही अंतर शायद जैक्सन और शाइनी आहूजा की त्रासद कहानियों को जन्म देता है। वरिष्ठ फिल्म समीक्षक सुनील मिश्र कहते हैं कि फिल्म उद्योग में आज भी गुजरे जमाने के कई ऐसे सितारे हैं जिनकी कहानी जैक्सन से जुदा नहीं है। इस दुनिया में सफलता रातोरात जीने का अंदाज बदल देती है। फुटपाथ पर सोने और वड़ा-पाव खाकर दिन गुजारने का संघर्ष हवा होते ही कामयाबी अपने साथ जिस चमक-दमक को लाती है, वह सितारा बन चुके व्यक्ति के मनोमस्तिष्क को बदल देती है। नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर एक फिल्म निर्माता ने कहा ‘हमारे लिए फिल्म बनाना व्यवसाय है, लेकिन फिल्मों में किरदार निभाने वाले अभिनेता अक्सर यथार्थ और कल्पना के फर्क को भूल जाते हैं। शायद यही वजह है कि इस दुनिया में हर कामयाब सितारा अपनी यातनाओं की सलीब अपने ही कंधों पर ढोने के लिए मजबूर है। एक अन्य फिल्म निर्माता बताते हैं कि गुजरे जमाने की एक अदाकारा आज भी उस दौर के हैंगओवर से उबर नहीं पाई हैं। जब भी वे गाडी से निकलती हैं तो ड्राइवर को यह हिदायत देना नहीं भूलतीं कि कार के शीशे नहीं खोलना वरना भीड़ उन्हें घेर लेगी। श्री मिश्र का कहना है कि यथार्थ से दूर अपने चारों तरफ कल्पना की दुनिया गढ़ लेने के कारण ये सितारे अक्सर खुद को शराब के प्यालों में गर्क कर देते हैं और अवसाद और मनोरोग से घिर जाते हैं। मीना कुमारी और परवीन बाबी जैसी अभिनेत्रियों की जिन्दगी इसी वजह से यातना का सफर बन गई थी। मिश्र ने कहा कि गुजरे जमाने का यह नास्टेल्जिया (अतीत की पीडा बन चुकी याद) वर्तमान को बेहद तकलीफदेह बना देता है। कोई भी सितारा बूढ़ा नहीं दिखना चाहता, भले ही इसके लिए उसे शरीर को छलनी कर देने वाली कॉस्मेटिक सर्जरी से भी क्यों न गुजरना पड़े। उन्होंने बताया कि फिल्म उद्योग में ऐसे कई सितारे हैं, जो अजीबोगरीब अंदाज में जिन्दगी जीने के लिए जाने जाते हैं। अपने संवादों पर दर्शकों की वाहवाही लूटने वाले एक अभिनेता ने अपने पारिवारिक सदस्यों से कह रखा था कि जब उनकी मृत्यु हो तो उनकी अंतिम यात्रा में केवल परिवार के चुनिंदा सदस्य ही शामिल हों। यह सच है कि सितारा बनने की कीमत चुकानी पड़ती है, लेकिन सवाल यह उठता है कि यह कैसी कामयाबी है जो खुद अपने ही शरीर को गलाने और जलाने की तरफ मोड़ देती है। अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि फलां सितारे ने शिकार किया या उसने अपनी आयातित गाडी से फुटपाथ पर सोने वाले लोगों को कुचल दिया। क्या इन सितारों को समाज के नियमों या कानून का डर नहीं होता या वे ऐसी मानसिक स्थिति में पहुँच जाते हैं जहाँ उन्हें लगता है कि सब कुछ जायज है। वास्तव में जिन्दगी जीने के लिए प्राकृतिक और सामाजिक नियम, कायदे और कानून हैं। जो भी उन्हें तोड़ता है उसे कुदरत और कानून से मिलने वाली सजा भुगतनी ही पड़ती है वार्ता से साभार
 
वयस्कों के बीच स्वैच्छिक समलैंगिक सम्बन्ध अब संवैधानिक मूल अधिकार पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
गुरुवार, 02 जुलाई 2009 20:20

2 July, 2009 वयस्कों के बीच स्वैच्छिक समलैंगिक सम्बन्ध अब संवैधानिक मूल अधिकार दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा आज 2 जुलाई, 2009 को दिए गए ऐतिहासिक निर्णय द्वारा भारत में वयस्कों के बीच स्वैच्छिक समलैंगिक सम्बन्धों को संवैधानिक मूल अधिकारों के अंतर्गत मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को इस हद तक शून्य घोषित कर दिया है। अब सहमति से वयस्क समलैंगिकों के बीच संबंध को इस धारा के अंतर्गत दण्डनीय नहीं माना जाएगा। दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय कुल 105 पृष्ठों, 135 चरणों और 26397 शब्दों का है।  इस मुकद्दमे में रूचि दिखाने वाले , 3 ने गवाही दी जिन शब्दों पर गौर किया गया, वे हैं अपराध, दंड प्रक्रिया संहिता, भारतीय संविधान, मूल अधिकार, समलैंगिकता Monday, 29 June, 2009 समलैंगिकता को मान्यता मिलेगी!? केंद्र, भारतीय दंड संहिता की उस विवादास्पद धारा को खत्म करने पर विचार कर रहा है

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माइकल जैक्सन की मौत पर रहस्य पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
शनिवार, 27 जून 2009 00:27



कैसे मौत हुई इस बारे में रहस्य बना हुआ है.
पॉप किंग माइकल जैक्सन की अचानक मौत के बाद इस बारे में अटकलें जारी हैं कि आख़िर किस वजह से उनकी जान गई. यूं तो उन्हें बेहोशी और सांस लेने में दिक्कत की वजह से अस्पताल लाया गया, लेकिन उनके डॉक्टरों पर भी अंगुली उठ रही है.

माइकल जैक्सन ने गुरुवार को लॉस एंजलिस के एक अस्पताल में दम तोड़ा जहां जहां उन्हें दिल का तगड़ा दौरा पड़ने के बाद लाया गया था. हालांकि अभी उनकी मौत की असल वजह का पता नहीं चल पाया है. जैक्सन परिवार के प्रवक्ता ब्रिएन ऑक्समन ने कहा, पूरा परिवार माइकल की सेहत को लेकर चिंतित था और महीनों से उनकी देखभाल की जा रही थी लेकिन सब बेकार साबित हुई.
शुक्रवार को उनके शव का परीक्षण होना है, हालांकि अधिकारियों ने साफ किया है कि मौत की सही सही वजह पता करने में हफ़्ते लग सकते हैं. इसके लिए टोक्सिकोलॉजी टेस्ट भी किए जाएंगे जिनसे पता चलेगा कि क्या जैक्सन के शरीर में कोई नशीली दवा, अल्कोहल या फिर डॉक्टर की बताई दवाएं थी.
Bildunterschrift: मुश्किलों से भरा जीवन दूसरी तरफ़ जैक्सन के पूर्व प्रॉड्यूसर और मित्र टैरेक बेन अम्मार ने उनके डॉक्टरों पर ऊंगली उठाई है. वह कहते हैं, जैक्सन के मामले में अपराधी उनके वे डॉक्टर हैं जिन्होंने पूरे करियर में उनका इलाज किया और उनके चेहरे को बिगाड़ा. उन्हें दर्द कम करने के लिए दवाएं देते रहे. ट्यूनिशियाई मूल के बेन अम्मार का मानना है कि जैक्सन की मौत दिल के दौरे से हुई है. उनके मुताबिक़ जैक्सन लगातार नींद की गोलियां लेते थे. इसके अलावा और कई तरह की दवाएं भी वे लेते रहे, लेकिन बेन अम्मार यह साफ़ करते हैं कि उन्होंने कभी जैक्सन को कभी ग़ैर क़ानूनी दवाएं लेते नहीं देखा.
लॉस एंजिलिस टाइम्स से पहले टीएमज़ेड नाम की मनोरंजन वेबसाइट ने भी इंटरनेट पर माइकल जैक्सन की मौत हो जाने की पुष्टि की. पॉप किंग के नाम से मशहूर जैक्सन के 'थ्रिलर' और 'बिली जीन' जैसे अलबमों ने संगीत की दुनिया के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. माइकल जैक्सन के जादुई डांस की पूरी दुनिया दीवानी हो गई और उनके चाहने वाले कई कई मौक़ों पर इस डांस की नक़ल करते हैं. वह अगले महीने से लंदन में एक बार फिर एक विशाल टूर शुरू करने वाले थे.
माइकल जैक्सन अगले महीने से लंदन में एक विशाल कंसर्ट शुरू करने वाले थे. जुलाई की 13 तारीख़ से शुरू होने वाला यह कंसर्ट अगले साल मार्च तक चलना था. इस सिलसिले में जैक्सन पिछले दो महीनों से लॉस एंजिलिस में रिहर्सल कर रहे थे. उन्हें कुल 50 कंसर्ट करने थे और इन सभी के टिकट पूरी तरह बिक चुके हैं.
बताया जाता है कि माइकल जैक्सन के कुल 75 करोड़ अलबम बिके हैं और उन्हें 13 ग्रैमी अवार्ड मिल चुके हैं, जिसे संगीत का सबसे बड़ा पुरस्कार समझा जाता है. माइकल जैक्सन की ज़िन्दगी में शोहरत के साथ कई बदनामियां भी आईं. क़रीब चार साल पहले एक बच्चे के यौन दुराचार के मामले में बरी होने के बाद से वह अलग थलग जीवन बिता रहे थे. हाल के दिनों में माइकल जैक्सन की तबीयत बहुत ख़राब चल रही थी.
 
चुनरी मे दाग पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
शनिवार, 27 जून 2009 23:27

बॉलीवुड की 'बबली' यानी रानी मुखर्जी फिल्म 'लागा चुनरी में दाग' और 'सांवरिया' में एक वेश्या का किरदार निभाने के बाद एक फिर से एक अलग तरह का किरदार निभाने के लिए तैयार नजर आ रही हैं।


इस बार रानी मुखर्जी 'यशराज फिल्म्स' की अगली फिल्म 'दिल बोले अड़िप्पा' में एक सरदार का किरदार निभाने वाली हैं। इस फिल्म में रानी अपने प्रशंसकों के सामने एक सरदार के रूप में दाढ़ी और पगड़ी के साथ नजर आएंगी।

जानकारों के मुताबिक इस फिल्म में रानी अपने सपनों को पूरा करने के लिए एक सरदार बनती हैं। फिल्म की कहानी बहुत ही रोमांटिक और कॉमेडी है।

फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ने रानी के लिए परंपरागत कुर्ता पायजामा डिजाइन किया है। फिल्म का निर्देशन अनुराग सिंह ने किया है जबकि फिल्म में उनके साथ शाहिद कपूर, अनुपम खेर, राखी सांवत और शर्लिन चोपड़ा हैं। फिल्म के 18 सितम्बर को रिलीज होने की उम्मीद है।

रंजीत राज

 

 
दो हथियार तस्कर पुलिस के कब्जे में पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
शनिवार, 27 जून 2009 23:13

झारखंड की राजधानी रांची में पुलिस ने दो लोगों को हथियार और गोला बारूद के साथ गिरफ्तार किया है। पुलिस इन हथियार तस्कारों की काफी दिनों से तलाश कर रही थी। पुलिस ने बताया कि अपराध जांच विभाग (सीआईडी) और रांची पुलिस के एक संयुक्त अभियान में रेलवे स्टेशन से शमशेर और शम्शुद्दीन नामक दो हथियार तस्करों को गिरफ्तार किया है। दोनों के पास से एक 9 एमएम पिस्टल, एक रिवाल्वर, 400 जीवित कारतूस और 40,000 हजार रुपये बरामद भी किए गए। पुलिस के अनुसार दोनों व्यक्ति राज्य में अपराधियों को हथियारों की आपूर्ति किया करते थे। राज्य सीआईडी एक वर्ष से दोनों की तलाश कर रही थी।

रंजीत राज

 
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बोनसाई 
  
पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खडी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पीते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता
विजय रंजन