magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
अरुण कुमार झा
प्रधान सम्पादक
पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक
विजय रंजन
सम्पादक
विनय कुमार मिश्र
सम्बद्ध सम्पादक
प्रवेश फॉर्म
हिन्दी का ब्रह्मभोज

राष्ट्र की भाषा, राज-काज की भाषा, जन-जन की भाषा, वह भाषा, जो सैंकड़ों देशों में बोली जाती है। वह भाषा, जो सहृदय है और देशज, आंचलिक सभी बोलियों को अपने हृदय में समोये हुए है। वही भाषा हिन्दी आज अपने ही देश में वधिवा -विलाप कर रही है। साल में 1 दिन या एक सप्ताह पुण्य तिथि मनाते हैं और ब्रह्म भोज की तरह हिन्दी दिवस या हिन्दी सप्ताह मनाते हैं। हिन्दी उस गरीब की तरह है, जो बड़ों और सम्मानित लोंगों की जमात में जाने में डरती है, घबराती है, शरमाती है। आज न्यायालय से लेकर सचिवालय तक हिन्दी कहाँ हैं? इसी तरह देखिए कि देश के बड़े संस्थान जिसमें रेलवे, डाक विभाग, दूस संचार विभाग, एवं बड़ी-बड़ी सार्वजनिक क्षेत्रों की कंपनियाँ, जहाँ रश्मआदयगी के लिए हिन्दी विभाग खोल रखा है, लेकिन हिन्दी में उनका काम के बराबर होता है। और निजी क्षेत्रों की कंपनियाँ! उनकी जिम्मेवारी नहीं होती कि वे राष्ट्रीय अस्मिता को बचाने में साथ दें। सिर्फ सरकारी जिम्मेवारी से हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलवाने की उमीद करना बेमानी होगी। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि हमारे देश और कई राज्य के मुखिया, कई बार अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के होते हैं, लेकिन सैद्धांतिक  तौर पर हिन्दी दिवस पर उनका संदेश होता है, जनता के नाम हिन्दी को अपनाने के लिए। यह गर्व की बात है या शर्म की बात कौन बतलाएगा?चैनलों पर देखिए हिन्दी के खानेवाले हिन्दी बोलने में शरमाते हैं। उनका मानना है कि अंग्रेजी सभ्य होने की पहचान कराता है।हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस या सप्ताह मनाया जाता है। यह आम जनता नहीं मनाती। आम लोग इसमें सहभागी नहीं होते। हिन्दी दिवस गिने-चुने उन विभागों में मनाये जाते हैं, जिस के भवन के दीवारों पर हिन्दी के प्रति महापुरुषों के अनमोल वचन लिख कर शीशे में मढ़कर टांगे गये होते हैं, पर आम दिनचर्या में उनके सारे कार्य अंग्रेजी में होते हैं। इन विभागों में हिन्दी दिवस के नाम पर कुछ पुरस्कार बाँटे जाते हैं और इस खुशी के मौके पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के मिला-जुला काव्य गोष्ठी का आयोजन त्हिन्दी का ब्रह्मभोज किया जाता है। इस आयोजन में कोई अपने घर का पैसा थोड़े ही लगने वाला, जनता के पैसे हैं इन दिनों हिन्दी में बोलने, लिखने, काम करने की कसमें खायी जाती है। ठीक उसी तरह, जिस तरह, न्यायालय में गीता की कसम खाकर झूठ बोलने का सिलसिला शुरू होता है।आचार-विचार और व्यवहार किसी के जबरन थोपने से नहीं बदलता, इसके लिए मानसिक स्तर पर तैयार होना पड़ता है या तैयार कराना पड़ता है। महात्मा गांधी के उस (सिद्ध्यांत )का पालन करना पड़ता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दूसरों से कोई काम कराने से पहले स्वयं उसे करो।

पक्ष और विपक्ष में तमाम बातें हैं, पर यह सच है कि शायद ही विश्व के किसी भी देश में राष्ट्रभाषा के लिए इतना आयोजन या सम्मान होता हो। 

प्रधान सम्पादक

सूचना

प्रिय पाठक बंधु ,

दो दिन पुर्व दृष्टिपात के साईट को किसी ने हैक कर लिया था, आज पुनः साईट को वापस लाया गया है, पुराने रूप में लाने में थोडा वक्त लगेगा, सहयोग बनाये रखें,

प्रधान  संपादक

 

 

गुरूनानक के दार्शनिक विचार

किसी भी धर्म की स्थापना कुछ आधारभूत सिद्धांतों पर निर्भर करती है। जिस धर्म के दार्शनिक सिद्धांत जितने अधिक व्यवहारिक और उपयुक्त होंगे, उस धर्म की पैठ उतनी ही गहरी होगी। सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानजी के द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांत बहुत ही सरल, व्यवहारिक, गंभीर तथा वैज्ञानिक आधार लिए हुए है। उन्होंने सिक्ख धर्म को परिभाषित करते हुए कहा- ‘‘किसी  फिलास्फी को जाँचने का नाम सिख धर्म नहीं और न ही यह सिद्धांतों का जमघट है। यह धर्म ऐसा उपदेश नहीं देता कि जगत मिथ्या है, इसे त्याग दो, न ही यह भविष्य की आशा पर इस रत्नरूपी शरीर को कष्ट देने की इजाजत देता है न ही ऐशों-आराम में इसे गवाँ देना जीवन का आदर्श समझता है। सिख-धर्म ‘‘माया विच उदासी ओर ‘‘राजविच योग कमाने का नाम है। सिख-धर्म संसार को समुद्र मानते हुए कहता है कि बेशक इस नाव रूपी शरीर को समुद्र में चलाओ पर यह याद रहे कि इस नाव में सांसारिक विकारों का पानी न आने पाये। यह धर्म किनारों को परिपक्व करना चाहता है, न कि तूफान को रोकना। यह धर्म अशुभ से बच कर भागना नहीं सिखाता, बल्कि उस पर विजय प्राप्त कर आत्मा एवं परमात्मा के मिलन की राह बताता है।

गुरुनानकजी ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए जंगलों में भटकने को व्यर्थ बताते हुएअंजन माहि निरंजन का उपदेश दिया है। कालिसार भट्ट ने अत्यंत समर्थ गवाही देते हुए कहा कि गुरुनानक ने अपने दैनिक जीवन में राजयोग के आदर्श को निरूपित किया है- ‘‘कवि कलि सुजल गावो गुरुनानक राजयोग जिन मान्यो गुरुनानक रूपी सूर्य का उदय सन् 14690 मंे लाहौर केननकाना’’ साहिब में हुआ जो पहले तलवंडी के नाम से जाना जाता था।

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शर्त है कि जनता बेईमानी छोड़ दे

प्रयोक्ता योग्यता निर्धारण: / 4
ऊसरउत्कृष्ट 

अपने बीच के एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव करे, जो स्वहित से ज्यादा लोकहित का लक्ष्य रखे। भारतीय लोकतंत्रा में आज स्थिति यह है कि जनता अपना महत्व भूल चुकी है। वह अपना प्रतिनिधि नहीं चुनती, बल्कि अपनी जाति के व्यक्ति को चुनती है। वह चुनती है ऐसे व्यक्ति को, जो सड़क-नाली से लेकर उम्मीदों के सपने को जमीं पर उतारने का झूठा आश्वासन देता है। कमाल तो यह है कि वह मीट-भात, हड़िया; दारूद्ध, कम्बल, चादर, साड़ी जैसी चीजों को पाकर उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा हो जाती है, यह जाने बिना कि उसका व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकार कैसा है। यदि ऐसा नहीं होता तो राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान क्षेत्रा के जातीय समीकरण की ओर ध्यान ही नहीं देतीं। जनता यदि समझदार होती, तो जेल में बंद कैदी, भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज चुनाव के मैदान में नहीं उतरते। ये लोग सीना तान कर यह नहीं कहते कि हम पिंजड़े में कैद रह कर भी चुनाव जीत लेंगे। 

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बोनसाई

बोनसाई
 
पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खडी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पीते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता


"विजय रंजन"