| सवालों के बीच पत्रकारिता |
जून अंक पत्राकारिता को समर्पित हैं. सबसे पहले सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता अपने ध्र्मों का पालन कर रही है? आज पत्रकारिता की कितनी जरूरत है? आज पत्रकारों की हैसियत क्या है? बड़े पत्र और छोटे पत्र के बीच संबंध क्या है और इन दोनों का आम आदमी के साथ सरोकार क्या है, उनकी पहँुच कितनी है? यह सवाल हमसे भी है आप से भी है, जिसका जवाब आज न कल हमे देना ही है. फिलहाल तो यह कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी सफलता यही है कि जनता को नंगा, भीखमंगा करने वाली विधयिका और कार्यपालिका को नंगा करने में आज भी वह सबसे आगे है. अगर पत्रकारिता और न्यायपालिका नहीं होती, तो ये लोग जनता को भेड-बकरी से ज्यादा महत्व नहीं देते, पर पत्रकारिता के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि आज पत्रकारिता पूंजीपतियों के हाथ में चली गई है. पत्र-पत्रिका चलाना अब उतना आसान नहीं रह गया है. ऐसे में पत्रकारिता वही करती है, जो उसके पूंजीपति मालिक चाहते हैं. मालिक चाहते हैं कि कमाई हो और उनका हित भी सुरक्षित रहे. ऐसे में पत्रकारों की स्थिति चाबी से चलने वाली खिलौने की तरह होकर रह जाती है. |
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सूचना
प्रिय पाठक बंधु ,
दो दिन पुर्व दृष्टिपात के साईट को किसी ने हैक कर लिया था, आज पुनः साईट को वापस लाया गया है, पुराने रूप में लाने में थोडा वक्त लगेगा, सहयोग बनाये रखें,
प्रधान संपादक
गुरूनानक के दार्शनिक विचार![]() किसी भी धर्म की स्थापना कुछ आधारभूत सिद्धांतों पर निर्भर करती है। जिस धर्म के दार्शनिक सिद्धांत जितने अधिक व्यवहारिक और उपयुक्त होंगे, उस धर्म की पैठ उतनी ही गहरी होगी। सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानजी के द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांत बहुत ही सरल, व्यवहारिक, गंभीर तथा वैज्ञानिक आधार लिए हुए है। उन्होंने सिक्ख धर्म को परिभाषित करते हुए कहा- ‘‘किसी फिलास्फी को जाँचने का नाम सिख धर्म नहीं और न ही यह सिद्धांतों का जमघट है। यह धर्म ऐसा उपदेश नहीं देता कि जगत मिथ्या है, इसे त्याग दो, न ही यह भविष्य की आशा पर इस रत्नरूपी शरीर को कष्ट देने की इजाजत देता है न ही ऐशों-आराम में इसे गवाँ देना जीवन का आदर्श समझता है। सिख-धर्म ‘‘माया विच उदासी ओर ‘‘राजविच योग कमाने का नाम है। सिख-धर्म संसार को समुद्र मानते हुए कहता है कि बेशक इस नाव रूपी शरीर को समुद्र में चलाओ पर यह याद रहे कि इस नाव में सांसारिक विकारों का पानी न आने पाये। यह धर्म किनारों को परिपक्व करना चाहता है, न कि तूफान को रोकना। यह धर्म अशुभ से बच कर भागना नहीं सिखाता, बल्कि उस पर विजय प्राप्त कर आत्मा एवं परमात्मा के मिलन की राह बताता है। गुरुनानकजी ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए जंगलों में भटकने को व्यर्थ बताते हुए‘अंजन माहि निरंजन का उपदेश दिया है। कालिसार भट्ट ने अत्यंत समर्थ गवाही देते हुए कहा कि गुरुनानक ने अपने दैनिक जीवन में राजयोग के आदर्श को निरूपित किया है- ‘‘कवि कलि सुजल गावो गुरुनानक राजयोग जिन मान्यो गुरुनानक रूपी सूर्य का उदय सन् 1469 ई0 मंे लाहौर के‘ननकाना’’ साहिब में हुआ जो पहले ‘तलवंडी के नाम से जाना जाता था। शर्त है कि जनता बेईमानी छोड़ दे![]() अपने बीच के एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव करे, जो स्वहित से ज्यादा लोकहित का लक्ष्य रखे। भारतीय लोकतंत्रा में आज स्थिति यह है कि जनता अपना महत्व भूल चुकी है। वह अपना प्रतिनिधि नहीं चुनती, बल्कि अपनी जाति के व्यक्ति को चुनती है। वह चुनती है ऐसे व्यक्ति को, जो सड़क-नाली से लेकर उम्मीदों के सपने को जमीं पर उतारने का झूठा आश्वासन देता है। कमाल तो यह है कि वह मीट-भात, हड़िया; दारूद्ध, कम्बल, चादर, साड़ी जैसी चीजों को पाकर उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा हो जाती है, यह जाने बिना कि उसका व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकार कैसा है। यदि ऐसा नहीं होता तो राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान क्षेत्रा के जातीय समीकरण की ओर ध्यान ही नहीं देतीं। जनता यदि समझदार होती, तो जेल में बंद कैदी, भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज चुनाव के मैदान में नहीं उतरते। ये लोग सीना तान कर यह नहीं कहते कि हम पिंजड़े में कैद रह कर भी चुनाव जीत लेंगे। |

जून अंक पत्राकारिता को समर्पित हैं. सबसे पहले सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता अपने ध्र्मों का पालन कर रही है? आज पत्रकारिता की कितनी जरूरत है? आज पत्रकारों की हैसियत क्या है? बड़े पत्र और छोटे पत्र के बीच संबंध क्या है और इन दोनों का आम आदमी के साथ सरोकार क्या है, उनकी पहँुच कितनी है? 















