magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 
प्रवेश फॉर्म
सवालों के बीच पत्रकारिता
जून अंक पत्राकारिता को समर्पित हैं. सबसे पहले सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता अपने ध्र्मों का पालन कर रही है? आज पत्रकारिता की कितनी जरूरत है? आज पत्रकारों की हैसियत क्या है? बड़े पत्र और छोटे पत्र के बीच संबंध क्या है और इन दोनों का आम आदमी के साथ सरोकार क्या  है, उनकी पहँुच कितनी है?
यह सवाल हमसे भी है आप से भी है, जिसका जवाब आज न कल हमे देना ही है.
फिलहाल तो यह कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी सफलता यही है कि जनता को नंगा, भीखमंगा करने वाली विधयिका और कार्यपालिका को नंगा करने में आज भी वह सबसे आगे है. अगर पत्रकारिता और न्यायपालिका नहीं होती, तो ये लोग जनता को भेड-बकरी से ज्यादा महत्व नहीं देते, पर पत्रकारिता के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि आज पत्रकारिता पूंजीपतियों के हाथ में चली गई है. पत्र-पत्रिका चलाना अब उतना आसान नहीं रह गया है. ऐसे में पत्रकारिता वही करती है, जो उसके पूंजीपति मालिक चाहते हैं. मालिक चाहते हैं कि कमाई हो और उनका हित भी सुरक्षित रहे. ऐसे में पत्रकारों की स्थिति चाबी से चलने वाली खिलौने की तरह होकर रह जाती है.

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गुरूनानक के दार्शनिक विचार

किसी भी धर्म की स्थापना कुछ आधारभूत सिद्धांतों पर निर्भर करती है। जिस धर्म के दार्शनिक सिद्धांत जितने अधिक व्यवहारिक और उपयुक्त होंगे, उस धर्म की पैठ उतनी ही गहरी होगी। सिख धर्म के संस्थापक गुरुनानजी के द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांत बहुत ही सरल, व्यवहारिक, गंभीर तथा वैज्ञानिक आधार लिए हुए है। उन्होंने सिक्ख धर्म को परिभाषित करते हुए कहा- ‘‘किसी  फिलास्फी को जाँचने का नाम सिख धर्म नहीं और न ही यह सिद्धांतों का जमघट है। यह धर्म ऐसा उपदेश नहीं देता कि जगत मिथ्या है, इसे त्याग दो, न ही यह भविष्य की आशा पर इस रत्नरूपी शरीर को कष्ट देने की इजाजत देता है न ही ऐशों-आराम में इसे गवाँ देना जीवन का आदर्श समझता है। सिख-धर्म ‘‘माया विच उदासी ओर ‘‘राजविच योग कमाने का नाम है। सिख-धर्म संसार को समुद्र मानते हुए कहता है कि बेशक इस नाव रूपी शरीर को समुद्र में चलाओ पर यह याद रहे कि इस नाव में सांसारिक विकारों का पानी न आने पाये। यह धर्म किनारों को परिपक्व करना चाहता है, न कि तूफान को रोकना। यह धर्म अशुभ से बच कर भागना नहीं सिखाता, बल्कि उस पर विजय प्राप्त कर आत्मा एवं परमात्मा के मिलन की राह बताता है।

गुरुनानकजी ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए जंगलों में भटकने को व्यर्थ बताते हुएअंजन माहि निरंजन का उपदेश दिया है। कालिसार भट्ट ने अत्यंत समर्थ गवाही देते हुए कहा कि गुरुनानक ने अपने दैनिक जीवन में राजयोग के आदर्श को निरूपित किया है- ‘‘कवि कलि सुजल गावो गुरुनानक राजयोग जिन मान्यो गुरुनानक रूपी सूर्य का उदय सन् 14690 मंे लाहौर केननकाना’’ साहिब में हुआ जो पहले तलवंडी के नाम से जाना जाता था।

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शर्त है कि जनता बेईमानी छोड़ दे

प्रयोक्ता योग्यता निर्धारण: / 4
ऊसरउत्कृष्ट 

अपने बीच के एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव करे, जो स्वहित से ज्यादा लोकहित का लक्ष्य रखे। भारतीय लोकतंत्रा में आज स्थिति यह है कि जनता अपना महत्व भूल चुकी है। वह अपना प्रतिनिधि नहीं चुनती, बल्कि अपनी जाति के व्यक्ति को चुनती है। वह चुनती है ऐसे व्यक्ति को, जो सड़क-नाली से लेकर उम्मीदों के सपने को जमीं पर उतारने का झूठा आश्वासन देता है। कमाल तो यह है कि वह मीट-भात, हड़िया; दारूद्ध, कम्बल, चादर, साड़ी जैसी चीजों को पाकर उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा हो जाती है, यह जाने बिना कि उसका व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकार कैसा है। यदि ऐसा नहीं होता तो राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान क्षेत्रा के जातीय समीकरण की ओर ध्यान ही नहीं देतीं। जनता यदि समझदार होती, तो जेल में बंद कैदी, भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज चुनाव के मैदान में नहीं उतरते। ये लोग सीना तान कर यह नहीं कहते कि हम पिंजड़े में कैद रह कर भी चुनाव जीत लेंगे। 

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सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में


 



फ़िरदौस ख़ान

हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फिरोज़शाह तुगलक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है। गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है। ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका। हिसार का गूजरी महल 1354 में फिरोज़शाह तुगलक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया। गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है। इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था। ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुगलक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है।

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Breaking News
जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन