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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
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vijay jee
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 सम्पादक
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सम्बद्ध सम्पादक 
 
प्रवेश फॉर्म
अनूठी मिसाल

विजयादशमी के दिन एक महिला ने आतंकी को ढेर किया...

विजयादशमी के दिन दुर्गा माता का रूप धर एक मुस्लिम महिला ने अपने घर में जबरन घुस आए लस्कर के आतंकवादी को अपनी साहस एवं सजगता का परिचय देते हुए कुल्हाडी से वार कर मौत के घाट उतार दिया| दशहरे के अवसर पर, जिसे अधर्म पर धर्म की विजय के स्वरूप जाना जाता है, एक रावण रूपी आतंकी का खात्मा, दुर्गा स्वरूपी एक घरेलु महिला के हाथों होना अपने आप में इस दिन की महिमा को चरितार्थ कर देता है|

बी.बी.सी न्यूज़ पर छपी ख़बर:

रूखसाना को अब अपनी जान का भी ख़तरा है.

जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले के काल्सी गाँव में 18 वर्षीय लड़की रुख़साना कौसर ने अद्भुत साहस दिखाते हुए एक चरमपंथी को ढेर कर दिया और दो अन्य को ज़ख्मी कर दिया. बीबीसी से बात करते हुए रूखसाना ने पूरी घटना को इन शब्दों में बयान किया.

"रात को लगभग नौ बजे मेरे दरवाज़े को ज़ोर-ज़ोर से पीटने की आवाज़ें आने लगी. हम लोगों ने दरवाज़ा नहीं खोला. लेकिन जब हमें लगा कि दरवाज़ा तोड़ दिया जाएगा तो मेरे माँ-बाप ने मुझे चारपाई के नीचे छुप जाने के लिए कहा और उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया.

हथियार से लैस तीन लोग घर में घुस आए जबकि चार अन्य बाहर दरवाज़े पर ही रह गए. उन्होंने बिना कुछ कहे मेरे माँ-बाप को पीटना शुरू कर दिया. उन्होंने अम्माँ-अब्बा को इस बुरी तरह से पीटा कि वह ज़मीन पर गिर गए.

हम लोगों ने इस इलाक़े में बहुत दिनों से किसी दहशतगर्द को नहीं देखा था... वे इस इलाक़े में लगभग 11 साल बाद आए थे.

मुझसे अपने माँ-बाप की हालत देखी नहीं गई इसलिए मैंने सोचा कि मरने से पहले मुझे बहादुरी के साथ उनका मुक़ाबला करना चाहिए. मेरे माँ-बाप बुरी तरह चीख़ रहे थे और वे लोग उनका मुंह बंद करने के लिए कोई कपड़ा तलाश कर रहे थे.

मैं चारपाई के नीचे से निकल कर बाहर आ गई.

तभी एक दहशतगर्द के बाल मेरे हाथों में आ गए और मैंने ज़ोर से पकड़ कर उसे दीवार से टक्कर दे दी जिससे वह गिर पड़ा और फिर मैंने कुल्हाड़ी से उसपर वार कर दिया जो उसकी गर्दन पर लगा।

जान को ख़तरा

एक दूसरे दहशतगर्द पर कुल्हाड़ी चलाई जो उसके चेहरे पर लगी। किसी तरह मैंने एक आदमी की राइफ़ल छीन ली और बिना रुके गोली चलाती रही। बाद में देखा गया कि उस दहशतगर्द कमांडर के जिस्म पर 12 गोलियाँ लगी थीं।

बकौल रुख़साना "हमने टीवी पर फ़िल्मों में हीरो को बंदूक़ चलाते देखा था और मैं उसी तरह गोली चलाती रही. किसी तरह मुझ में हिम्मत आ गई थी. मैं उस वक़्त तक गोली चलाती रही जबतक कि मैं थक के चूर नहीं हो गई."

उसी बीच एक दहशतगर्द ने गोली चलाई जो मेरे चाचा के बाज़ू को ज़ख्मी करती हुई निकल गई. उसी दौरान मेरे भाई ने भी एक आतंकवादी की राइफ़ल छीन ली और उसने भी गोली चलानी शुरू कर दी थी.

उनसे हमारी लड़ाई काफ़ी देर चलती रही. इससे पहले मैंने कभी राइफ़ल को हाथ भी नहीं लगाया था उसे चलाना तो दूर की बात थी.

लेकिन हमने टीवी पर फ़िल्मों में हीरो को बंदूक़ चलाते देखा था और मैं उसी तरह गोली चलाती रही. किसी तरह मुझ में हिम्मत आ गई थी. मैं उस वक़्त तक गोली चलाती रही जब तक कि मैं थक के चूर नहीं हो गई.

उन्होंने मेरी माँ से सिर्फ़ मेरा नाम पूछा था.

ये चरमपंथी रूखसाना की गोली का शिकार बना.

इस लड़ाई में दो और दहशतगर्द ज़ख़्मी हुए, उनके चहरे पर कुल्हाड़ी के वार के साथ मुझे लगता है कि गोली भी लगी थी. मेरे हिसाब से उसका ज़िंदा बचना मुश्किल है.

ऐसा लगता है कि अल्लाह ने मुझे इस मुसीबत की घड़ी में इतनी हिम्मत दी कि मैं उन दहशतगर्दों का मुक़ाबला कर पाई. लेकिन मुझे डर है कि वे लोग इस घटना के बाद मुझे नहीं छोड़ेंगे. ये उनके लिए बड़ी शर्म की बात है कि उनका एक कमांडर इस लड़ाई में मारा गया.

हालांकि पुलिस ने मेरे घर के पास एक पिकेट बना दिया है और उन्होंने पूरी सुरक्षा का यक़ीन भी दिलाया है लेकिन अब हमारा इस गांव में रहना मुश्किल है. उन्हें चाहिए कि हमें राजौरी के शहर या किसी दूसरी महफ़ूज़ जगह भेज दें.

(बीबीसी संवाददाता बीनू जोशी के साथ बात-चीत पर आधारित)


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कुल्हाड़ी एके-47 पर भारी पड़ी

बीनू जोशी

बीनू जोशी

बीबीसी संवाददाता, जम्मू

कश्मीर पुलिस

कश्मीर पुलिस ने रुख़साना के परिवार को सुरक्षा देने की बात की है

“मेरी माँ बाप को बेरहमी के साथ मारा जा रहा था, मैं अपने माता-पिता को पिटता नहीं देख सकी और एक चरमपंथी पर कूद पड़ी जबकि मेरे भाई ने पीछे से आकर उसे कुल्हाड़ी मारी.”

ये कहानी नहीं बल्कि एक हक़ीक़त है जो 10वीं के बाद पढ़ाई जारी न रख सकने वाली 18 वर्षीय रुख़साना ने राजौरी से बीबीसी को फ़ोन पर बताई.

चरमपंथ से जूझते भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के एक सूदूर पहाड़ी गांव में भाई और बहन ने जांबाज़ी का प्रदर्शन करते हुए एक चरमपंथी को मार डाला और दूसरे को घायल कर दिया. ये चरमपंथी उनके घर घुस आए थे और उनके माता-पिता की पिटाई कर रहे थे.

पुलिस के अनुसार कश्मीर के राजौरी ज़िले के सूदूर पहाड़ी गांव कालसी के एक निवासी नूर हुसैन के घर में तीन चरमपंथी घुस आए. यह स्थान जम्मू से 180 किलो-मीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है.

पुलिस ने कहा कि पाकिस्तानी नागरिक और लश्करे-तैबा कमांडर अबू ओसामा के नेतृत्व में इस घर में घुस आने वाले चरमपंथियों ने नूर हुसैन और उनकी पत्नी की पिटाई शुरू कर दी जबकि उनकी बेटी रुख़साना और बेटा ऐजाज़ (19) चारपाई के नीचे छुपे हुए थे.

रुख़साना ने बताया कि जब हम लोगों से अपने मां-बाप की पिटाई नहीं देखी गई तो हम उन पर टूट पड़े. उन लोगों ने एक चरमपंथी की एके-47 छीन ली और उसे मार डाला. उन्होंने दूसरे चरमपंथी पर भी निशाना लगाया वह घायल हो गया लेकिन अपने दूसरे साथी के साथ भाग गया.

अनूठी मिसाल

स्थानीय लोगों ने बताया कि ये चरमपंथी रुख़साना को तलाश कर रहे थे और उससे ज़बर्दस्ती शादी करना चाहते थे.

राजौरी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शफ़क़त वताली ने कहा कि वे चरमपंथी उस लड़की (रुख़साना) को तलाश कर रहे थे जिसका उसके माँ-बाप विरोध कर रहे थे.

"आम तौर पर चरमपंथी लोगों के घरों में घुस आया करते थे लेकिन पहली बार घर वालों की ओर से उनके ख़िलाफ़ कारवाई की गई है. ये एक अनुठा मामला है" - एसएसपी, राजौरी

 

शफ़क़त ने कहा, बहादुर बच्चों की कुल्हाड़ी ने चरमपंथियों की एके-47 बंदूक़ को हरा दिया.

पुलिस ख़ून के निशानों के सहारे भाग जाने वाले चरमपंथियों की तलाश में निकल पड़ी है.

पुलिस ने बताया कि ये चरमपंथी पाकिस्तानी संगठन लश्कर-ए-तैबा से थे और मारा जाने वाला कमांडर पिछले पांच वर्षों से इस इलाक़े में सक्रिय था.

वताली ने कहा कि रुख़साने के परिवार को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराई गई है. पुलिस के अधिकारियों ने रुख़साना की हिम्मत की दाद दी है. पुलिस महानिदेशक कुलदीप खोडा ने रुख़साना को विशेष संदेश में बधाई दी है.

एसएसपी शफ़क़त ने कहा, आम तौर पर चरमपंथी लोगों के घरों में घुस आया करते थे लेकिन पहली बार घर वालों की ओर से उनके ख़िलाफ़ कारवाई की गई है. ये एक अनूठा मामला है.

उन्होंने ये भी कहा कि अन्य लोगों को भी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ आना चाहिए और इन बच्चों की मिसाल को अपनाना चाहिए.

उन्होंने ये भी कहा कि उन चरमपंथियों के सिर पर जो पुरस्कार राशि होगी वह इन बच्चों को दी जाएगी और उन्हें जल्द ही पुरस्कृत किया जाएगा.

शफ़क़त वताली ने कहा कि वह इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाएंगे और 19 वर्षीय एजाज़ को पुलिस में नौकरी दिलाने की सिफ़ारिश करेंगे.



सौजन्य : http://www.bbc.co.uk/go/hindi/nav/int/-/hindi/

कल्याण विभाग कितना कल्याणकारी?

 

 

सरकार के लिए राज्य की जनता की बजाए यहाँ के कुछ अधिकारियों, कर्मचारियों दलालों एवं आपूर्तिकर्ताओं इत्यादि के कल्याण हेतु सरकारी योजनाएँ चलाई जा रही हैं? जी हाँ! राज्य में फैले हुए भ्रष्टाचारों को देखते हुए तो कुछ ऐसा ही लगता है. सरकार के लाख दावों के बावजूद यहाँ लूट की खुली छूट बदस्तुर जारी है. कल्याण विभाग के आवासीय स्कूलों में छात्रों को भोजन के नाम पर घटियासामानों की आपूर्ति की जा रही है. कल्याण विभाग के कर्मचारियों ने आपूर्तिकर्ता विंध्यवासनी स्टोर के मालिक से साँठ-गाठ कर सरकार पैसों का बंदरबाँट कर लिया है. पौष्टिक खाद्यान्न की जगह विद्यार्थियों को सस्ते एवं मिलावटी आहारांे की आपूर्ति की जा रही है. इससे एक ओर जहाँ झारखंड के नौनिहालोें का बौद्धिक एवं शारीरिक विकास अवरूद्ध हो रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ भी किया जा रहा है. विद्यार्थियों के लिए मँहगें चावल, मीट-पनीर मेवे आदि का आवँटन सरकार के द्वारा किया जाता है. पर बीच के दलालों के द्वारा केवल कागजों पर अच्छे सामग्रियांे की आपूर्ति दिखा दी जाती है.

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एक घर बिन ख्यालों, ख्वाबों और ख्वाहिशों का

ये घर है विश्वाश का. ये घर है प्रेम और वलिदान का. ये घर है क्षमा और दया का. ये घर है भाईचारगी और सौहार्द्र का. ये घर है त्याग औरतपस्या का. ये घर है. यहाँ आपका वागत है. लेकिन एक अनुरोध यहाँ कुछ लेकर कृपया न आयें. यहाँ इस घर में नफरत की कोई गुजाईश नहीं. इस घर में दोहरे चरित्र की आवश्यकता नहीं. इस घर में सिर्फ देने का रिवाज है लेने का नहीं. इस घर से सिर्फ मिल सकता है. बाहर से कुछ लाने की आवश्यकता नहीं. यदि यह सब आप कर सकेंगे/सकेंगी, तो यह घर आप का तहे दिल से स्वागत करता है. आप एक बार यहाँ प्रवेश करेंगे/करेंगी तो फिर संभव नहीं है आपके लिए यहाँ से चला जाना क्यों कि यहाँ कोई शर्त नहीं रखी जाती है. यहाँ दिखाबे का ख्वाब नहीं होता, यहाँ न किसी प्रकार का बनावटी ख्याल पलते हैं, फिर ख्वाहिशें कैसी? इस लिए आप को सब कुछ छोड़ कर ही इस घर में प्रवेश करना होगा. पहले पात्रता आपको तैय करनी पड़ेगी कि इस योग्य आप है। या नहीं! यह भी आप पर स्यवं निर्णय छोड़ा गया है. फिर समय भी है, जैसा भी निर्णय करें. आप का हमेशा स्वागत है. ये घर सिर्फ सच्चा प्रेम का है. यहाँ तेरा मेरा कुछ नहीं है. यहाँ न बुढापा है, न जवानी है. यहाँ उम्र की कोई बंदिश नहीं है. क्योंकि यह सब कुछ दिनों में समाप्त होने वाली चीजें है. जिस पर आप और मेरा कोई बस नहीं, फिर इस पर इतराना कैसा?
आइए आपका स्वागत है,
न कोई कहानी लेकर आइए न ही कोई कविता लेकर.
यहाँ आपकी इन चीजों की कोई अहमियत नहीं है.
क्योंकि आपकी अपना कुछ भी नहीं है. यह सब आप के गलत ख्याल का अहंकार है, इसे छो़ड़ कर आइए. आप का स्वागत है.
-देह की लकीर
टूटता जुड़ता हुआ
इसका आयाम,
कभी सिहरन भरा दर्द,
कभी घृणा का अहसास.
फिर भी ऐसी यह लकीर,
जिस पर मानव चलने को
आतुर,
रोज वही सज-धज
वही सुवह व शाम
बाकी सब धुआँ धुआँ.
तो फिर इस धुएँ की धुंध से निकल कर इस घर में आ जाइए। आप का स्वागत है। ये आप का ही घर है. तो आ जाइए न!!
अरुण कुमार झा
 

मलूटी के मंदिर

पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं। झारखंड और बंगाल के बार्डर पर, दुमका जिले से 55 किलोमीटर दूर एक गांव है, मलूटी। इस गांव में एक सिरे से दूसरे सिरे तक सिर्फ मंदिर हीं मंदिर नजर आते हैं। शायद एक छोटी सी जगह में इतने सारे मंदिर एक साथ होने की वजह से हीं इस क्षेत्र का नाम गुप्त काशी रखा गया होगा। इस गांव में कभी 108 मंदिर स्थित थे जिनमें से अधिकांश भगवान् शंकर को समर्पित थे और इनमें भव्य शिवलिंग स्थापित थे। संरक्षण के अभाव के चलते अब इन मंदिरों में सिर्फ 69 मंदिर ही बच पाये हैं।

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Breaking News
जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन