| सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में |
फ़िरदौस ख़ान हरियाणा के हिसार क़िले में स्थित गूजरी महल आज भी सुल्तान फिरोज़शाह तुगलक और गूजरी की अमर प्रेमकथा की गवाही दे रहा है। गूजरी महल भले ही आगरा के ताजमहल जैसी भव्य इमारत न हो, लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि प्रेम पर आधारित है। ताजमहल मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ की याद में 1631 में बनवाना शुरू किया था, जो 22 साल बाद बनकर तैयार हो सका। हिसार का गूजरी महल 1354 में फिरोज़शाह तुगलक ने अपनी प्रेमिका गूजरी के प्रेम में बनवाना शुरू किया, जो महज़ दो साल में बनकर तैयार हो गया। गूजरी महल में काला पत्थर इस्तेमाल किया गया है, जबकि ताजमहल बेशक़ीमती सफ़ेद संगमरमर से बनाया गया है। इन दोनों ऐतिहासिक इमारतों में एक और बड़ी असमानता यह है कि ताजमहल शाहजहां ने मुमताज़ की याद में बनवाया था। ताज एक मक़बरा है, जबकि गूजरी महल फिरोज़शाह तुगलक ने गूजरी के रहने के लिए बनवाया था, जो महल ही है। |
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हिन्दी का ब्रह्मभोज
राष्ट्र की भाषा, राज-काज की भाषा, जन-जन की भाषा, वह भाषा, जो सैंकड़ों देशों में बोली जाती है। वह भाषा, जो सहृदय है और देशज, आंचलिक सभी बोलियों को अपने हृदय में समोये हुए है। वही भाषा हिन्दी आज अपने ही देश में वधिवा -विलाप कर रही है। साल में 1 दिन या एक सप्ताह पुण्य तिथि मनाते हैं और ब्रह्म भोज की तरह हिन्दी दिवस या हिन्दी सप्ताह मनाते हैं। हिन्दी उस गरीब की तरह है, जो बड़ों और सम्मानित लोंगों की जमात में जाने में डरती है, घबराती है, शरमाती है। आज न्यायालय से लेकर सचिवालय तक हिन्दी कहाँ हैं? इसी तरह देखिए कि देश के बड़े संस्थान जिसमें रेलवे, डाक विभाग, दूस संचार विभाग, एवं बड़ी-बड़ी सार्वजनिक क्षेत्रों की कंपनियाँ, जहाँ रश्मआदयगी के लिए हिन्दी विभाग खोल रखा है, लेकिन हिन्दी में उनका काम न के बराबर होता है। और निजी क्षेत्रों की कंपनियाँ! उनकी जिम्मेवारी नहीं होती कि वे राष्ट्रीय अस्मिता को बचाने में साथ दें। सिर्फ सरकारी जिम्मेवारी से हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलवाने की उमीद करना बेमानी होगी। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि हमारे देश और कई राज्य के मुखिया, कई बार अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के होते हैं, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर हिन्दी दिवस पर उनका संदेश होता है, जनता के नाम हिन्दी को अपनाने के लिए। यह गर्व की बात है या शर्म की बात कौन बतलाएगा?चैनलों पर देखिए हिन्दी के खानेवाले हिन्दी बोलने में शरमाते हैं। उनका मानना है कि अंग्रेजी सभ्य होने की पहचान कराता है।हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस या सप्ताह मनाया जाता है। यह आम जनता नहीं मनाती। आम लोग इसमें सहभागी नहीं होते। हिन्दी दिवस गिने-चुने उन विभागों में मनाये जाते हैं, जिस के भवन के दीवारों पर हिन्दी के प्रति महापुरुषों के अनमोल वचन लिख कर शीशे में मढ़कर टांगे गये होते हैं, पर आम दिनचर्या में उनके सारे कार्य अंग्रेजी में होते हैं। इन विभागों में हिन्दी दिवस के नाम पर कुछ पुरस्कार बाँटे जाते हैं और इस खुशी के मौके पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के मिला-जुला काव्य गोष्ठी का आयोजन त्हिन्दी का ब्रह्मभोज किया जाता है। इस आयोजन में कोई अपने घर का पैसा थोड़े ही लगने वाला, जनता के पैसे हैं। इन दिनों हिन्दी में बोलने, लिखने, काम करने की कसमें खायी जाती है। ठीक उसी तरह, जिस तरह, न्यायालय में गीता की कसम खाकर झूठ बोलने का सिलसिला शुरू होता है।आचार-विचार और व्यवहार किसी के जबरन थोपने से नहीं बदलता, इसके लिए मानसिक स्तर पर तैयार होना पड़ता है या तैयार कराना पड़ता है। महात्मा गांधी के उस (सिद्ध्यांत )का पालन करना पड़ता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दूसरों से कोई काम कराने से पहले स्वयं उसे करो।
पक्ष और विपक्ष में तमाम बातें हैं, पर यह सच है कि शायद ही विश्व के किसी भी देश में राष्ट्रभाषा के लिए इतना आयोजन या सम्मान होता हो।
प्रधान सम्पादक
छमकछल्लो कहिसमहिलाओं के अंतर्वस्त्र? राम-राम, तोबा-तोबा! छम्मक्छल्लो के देश में महिलाओं की बात? राम-राम, तोबा-तोबा!.छम्मक्छल्लो ने देख है कि महिलाओं की बात आते ही लोगों के स्वर अपने -आप धीमे हो जाते हैं. सुर धीमा हो तो वह फुसफुसाहट में बदल जाती है. ऐसा लगाने लगता है, जैसे महिला पर नहीं, किसी गलत, अवैध या गंदी चीज़ पर बात की जा रही हो.
बात करते समय यह अक्सर कह दिया जाता है कि "लेडीज़" हैं, बेचारी. यानी लेडीज़ या स्त्री होना एक पूरी की पूरी बेचारगी का बायस है. फलाने जो हैं, अमुक के पिता हैं, या भाई हैं या पुत्र हैं या पति हैं, मगर इसके उलटा जाते ही आवाज़ के तार धीमे पड़ जाते हैं. अंतिम रिश्ते में तो लोग और भी इतने असहज हो जाते हैं, जैसे कोई बड़ी ही गलत बात कहने जा रहे हों. हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम
हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम दिया तुम्ही ने जीने का जग में मुझको सुन्दर ज्ञान हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम।
माता ने तो जन्म दिया है और पिता ने बस एक नाम इनसे भी अनमोल रत्न-धन गुरु ने दी मेरी पहचान।
मैं शीष झुकाऊँ आदर से ले गुरु चरणन का नाम आशीर्वाद हमें दो गुरुवर कुछ करूँ जगत में काम।
अन्धकार से मुझे बचाकर आँखों में ज्याति डाली देख सका मैं अन्तर्मन से चहुँओर उषा की लाली।
वरद हस्त रखना प्रभु हरदम जिससे मंजिल को पा लूं अज्ञान डगर मंे भटक न जाऊँ नभ के तारे भी छू लूँ। श्रद्धा सुमन समर्पित गुरुवर आज करूँ मैं तेरे नाम आशाओं के दीप जलाकर हे गुरुवर शत्-शत् प्रणाम। गिरीन्द्र प्रसाद |





















