| शर्त है कि जनता बेईमानी छोड़ दे |
![]() अपने बीच के एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव करे, जो स्वहित से ज्यादा लोकहित का लक्ष्य रखे। भारतीय लोकतंत्रा में आज स्थिति यह है कि जनता अपना महत्व भूल चुकी है। वह अपना प्रतिनिधि नहीं चुनती, बल्कि अपनी जाति के व्यक्ति को चुनती है। वह चुनती है ऐसे व्यक्ति को, जो सड़क-नाली से लेकर उम्मीदों के सपने को जमीं पर उतारने का झूठा आश्वासन देता है। कमाल तो यह है कि वह मीट-भात, हड़िया; दारूद्ध, कम्बल, चादर, साड़ी जैसी चीजों को पाकर उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा हो जाती है, यह जाने बिना कि उसका व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकार कैसा है। यदि ऐसा नहीं होता तो राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान क्षेत्रा के जातीय समीकरण की ओर ध्यान ही नहीं देतीं। जनता यदि समझदार होती, तो जेल में बंद कैदी, भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज चुनाव के मैदान में नहीं उतरते। ये लोग सीना तान कर यह नहीं कहते कि हम पिंजड़े में कैद रह कर भी चुनाव जीत लेंगे। |
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मीडिया भी सोचे पानी के सवाल पर
आइए बनाएं एक पानीदार समाज
- संजय द्विवेदी
मीडिया का काम है लोकमंगल के लिए सतत सक्रिय रहना। पानी का सवाल भी एक ऐसा मुद्दा बना गया है जिस पर समाज, सरकार और मीडिया तीनों की सामूहिक सक्रियता जरूरी है। कहा गया है-
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून

पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष,चून।
प्रकृति के साथ निरंतर छेड़छाड़ ने मनुष्यता को कई गंभीर खतरों के सामने खड़ा कर दिया है। देश की नदियां, ताल-तलैये, कुंए सब हमसे सवाल पूछ रहे हैं। हमारे ठूंठ होते गांव और जंगल हमारे सामने एक प्रश्न बनकर खड़े हैं। पर्यावरण के विनाश में लगी व्यवस्था और उद्योग हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं। इस भयानक शोषण के फलित भी सामने आने लगे हैं। मानवता एक ऐसे गंभीर संकट को महसूस कर रही है और कहा जाने लगा है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। बारह से पंद्रह रूपए में पानी खरीद रहे हम क्या कभी अपने आप से ये सवाल पूछते हैं कि आखिर हमारा पानी इतना महंगा क्यों है। जब हमारे शहर का नगर निगम जलकर में थोड़ी बढ़त करता है तो हम आंदोलित हो जाते हैं, राजनीतिक दल सड़क पर आ जाते हैं। लेकिन पंद्रह रूपए में एक लीटर पानी की खरीदी हमारे मन में कोई सवाल खड़ा नहीं करती। उदाहरण के लिए दिल्ली जननिगम की बात करें तो वह एक हजार लीटर पानी के लिए साढ़े तीन रूपए लेता है। यानि की तीन लीटर पानी के लिए एक पैसे से कुछ अधिक। यही पानी मिनरल वाटर की शकल में हमें तकरीबन बयालीस सौ गुना से भी ज्यादा पैसे का पड़ता है। आखिर हम कैसा भारत बना रहे हैं। इसके खामोशी के चलते दुनिया में बोतलबंद पानी का कारोबार तेजी से उठ रहा है और 2004 में ही इसकी खपत दुनिया में 154 बिलियन लीटर तक पहुंच चुकी थी। इसमें भारत जैसे हिस्सा भी 5.1
पप्पू कांट डांस साला'
फिल्म से जुड़े एक सूत्र ने बताया, "जेनेलिया को इस बात का अंदाजा है कि 'पप्पू कांट डांस साला' के डांस स्टेप ने उन्हें काफी लोकप्रियता दिलाई है। यही कारण है कि 'लाइफ पार्टनर' की शूटिग के दौरान उन्होंने कोरियोग्राफर बास्को सीजर से उस स्टेप को 'तेरी मेरी ये जिंदगी' गाने में भी डालने की जिद कर दी।"सूत्र ने कहा, "हर आदमी हैरान था लेकिन सीजर को जेनेलिया की बात माननी पड़ी और अगले पल फिल्म के नायक फरदीन खान और अन्य कलाकार उस डांस स्टेप पर काम करते नजर आए। "'तेरी मेरी ये जिंदगी' गाने के बारे में बताते हुए निर्देशक रुमी जाफरी ने कहा कि जेनेलिया और फरदीन ने फिल्म में नवविवाहित जोड़े की भूमिका निभाई है और हनीमून के दौरान दोनों पर यह गाना फिल्माया गया है।'लाइफ पार्टनर' में जेनेलिया और फरदीन के अलावा प्राची देसाई और तुषार कपूर ने भी काम किया है। यह फिल्म 14 अगस्त को प्रदर्शित हो रही है।रंजीत राज '
आखिर कौन है जिम्मेदार...?
खोता हुआ पतित पावन गंगा का अस्तित्व -कुलदीप कुमार मिश्रआखिर कौन है जिम्मेदार...? गंगा नदी हमारे जीवन का आधार व भारतीय संस्कृति- सभ्यता व धार्मिक आस्था का प्रतीक है। गंगा नदी को स्वर्ग से धरती पर लाने के लिये राजा भगीरथ ने बहुत घोर तप किया था। राजा के शापित पुत्रों को मां गंगा ने शाप मुक्त कर मोक्ष प्रदान किया। लेकिन वही गंगा आज ग्लोबल वार्मिंग तथा मानवीय गतिविधियों और कुकृत्यों के कारण इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि उसका अस्तित्व ही खो सा गया है। पतित पावन गंगा को लालची और अज्ञानी मानव ने अपने हित के लिये विषैले पदार्थ उसमे बहाकर इसको प्रदूषित कर दिया है। |























