magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 
प्रवेश फॉर्म
यहाँ कई रामदेव हैं।
सनातन काल से योग इस देश का एक अभिन्न अंग रहा है, जिसके लिए यहाँ के लोगों को न तो किसी गुरु की जरुरत रही ना ही पोंगे पंडितोंकी, स्पष्ट कहें तो योग विद्या भारतीयों के रक्त में बसता है जरुरत लगन और साधना करने की है। एक नजर तस्वीर पर देखिये, सिर्फ़ योग का करामात, इसी करामत के बूते इनका नाम लिम्का बुक में दर्ज किया गया है और वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए प्रस्तावित किया जा चुका है। ये सिर्फ़ योग की माया है, साधना योग की ना कोई गुरु ना कोई शिष्य बस लगन और साधना। पाँच साल का अथक परिश्रम और योग का करामत की दोनों कंधे को मिला लिए। योग को अपना धंधा और मीडिया को इस धंधे में शामिल करने वाले (बाबा) रामदेव जरा नजर मारें , वस्तुतः एक चुनौती भी कि बाबा जी मीडिया का माइक पकड़ने के बजाय इस चुनौती को भी स्वीकारो। नमन इस देश के अद्भुत प्रतिभा को। जय हिंद

वंदे मातरम्

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) 

चुनरी मे दाग

बॉलीवुड की 'बबली' यानी रानी मुखर्जी फिल्म 'लागा चुनरी में दाग' और 'सांवरिया' में एक वेश्या का किरदार निभाने के बाद एक फिर से एक अलग तरह का किरदार निभाने के लिए तैयार नजर आ रही हैं।


इस बार रानी मुखर्जी 'यशराज फिल्म्स' की अगली फिल्म 'दिल बोले अड़िप्पा' में एक सरदार का किरदार निभाने वाली हैं। इस फिल्म में रानी अपने प्रशंसकों के सामने एक सरदार के रूप में दाढ़ी और पगड़ी के साथ नजर आएंगी।

जानकारों के मुताबिक इस फिल्म में रानी अपने सपनों को पूरा करने के लिए एक सरदार बनती हैं। फिल्म की कहानी बहुत ही रोमांटिक और कॉमेडी है।

फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ने रानी के लिए परंपरागत कुर्ता पायजामा डिजाइन किया है। फिल्म का निर्देशन अनुराग सिंह ने किया है जबकि फिल्म में उनके साथ शाहिद कपूर, अनुपम खेर, राखी सांवत और शर्लिन चोपड़ा हैं। फिल्म के 18 सितम्बर को रिलीज होने की उम्मीद है।

रंजीत राज

 

 

'हिंसाग्रस्त इलाक़ों में जाने से परहेज़ करें नेता'

लालगढ़ में सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बीच गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने नेताओं और ग़ैर सरकारी संगठनों से हिंसा प्रभावित इलाक़े में नहीं जाने का आग्रह किया है क्योंकि अभी भी स्थिति संवेनशील और तनावपूर्ण बनी हुई है.

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने अपील कि है कि अभी उस क्षेत्र का दौरा नहीं किया जाना चाहिए ताकि सुरक्षा बलों को उनका ध्यान बांटे बिना काम करने दिया जा सके. इससे पहले ऐसी रिपोर्टें थीं कि रेलमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बैनर्जी ने अपनी पार्टी के मंत्रियों मुकुल रॉय और शिशिर अधिकारी से मिदनापुर जाने को कहा हैं. ममता बैनर्जी ने माओवादियों के ख़िलाफ कार्रवाई इतनी देर से होने का सवाल उठाया है.#b#

इसी बीच माओवादियों ने पश्चिम बंगाल, छतीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, और बिहार में 48 घंटे के बंद का आह्वान किया है. गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ओंकार केड़िया का कहना है कि इस बंद के दौरान माओवादी हिंसक कार्रवाई कर सकते हैं. गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव डी आर एस चौधरी ने कहा है कि सभी राज्यों को सतर्क कर दिया गया है कि वे बारूदी सुरंगों और आईईडी के प्रयोग के इस्तेमाल के प्रति विशेष रूप से चौकन्ने रहें. उन्हें खुफिया सूचाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं.

पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले के लालगढ़ पुलिस थाना क्षेत्र को नियंत्रण में लेने के बाद अब सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल और राज्य पुलिस के जवान मिलकर अन्य इलाक़ों की ओर बढ़ रहे हैं ताकि वहां के गावों को भी माओवादियों से मुक्त कराया जा सके. पश्चिम बंगाल के रंगमंच और फिल्म जगत से जुडी कई नामी हस्तियों ने लालगढ़ पहुंच कर स्थिति का जायज़ा लिया.

 

न्याय कैसे मिलेगा?

झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश प्रंशात कुमार के चेम्बर में हाईकोर्ट का ही एक चपरासी शत्रुघन राम चाकू लेकर घूस गया। उसका बेटा नीलकंठ सागर सितम्बर 2008 से लापता है. कई बार एस.पी व न्यायाधीश को वह आवेदन दे चुका है, परशत्रुघन राम का कहना है कि किसी ने कुछ नहीं किया. पुलिस व मीडिया ने भी कुछ नहीं किया. उसने कहा, ‘समय-समय पर उसे बेटे से बातचीत भी कराई जाती है’. उसने कहा कि इसीलिए योजना बनाई कि जज को चाकू दिखाने से मीडिया में इसका कवरेज होगा और इससे उसका उद्देश्य पूरा हो जाएगा. हाईकोर्ट कर्मियों ने बताया कि बेटे के लापता होने के बाद शत्रुघन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है. प्रथम दृष्टया में, तो यह एक मामूली सी घटना ही मालुम होती है और इसे इसी रूप में लिया भी गया. परन्तु देश की वर्तमान स्थिति देखने के बाद और इस तरह की घटित बहुत सारी घटनाओं को उससे जोड़ते हुए यदि इस घटना के तह में जाकर वैचारिक झंझावतों से एक संतुलित लहर को खींच कर निष्पक्षता पूर्वक दृष्टिपात किया जाए, तो देश की अनेक समस्याओं की परत दर परत खोली जा सकती है और सही एवं सुचारू ढंग से इनके समाधान करने में सहायता प्राप्त की जा सकती है. आज देश में पूरी तरह पावर गेम चल रहा है. अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. गरीबो, शोषितों, मजबूरों को कोई पूछने वाला नहीं है. जिसके पास ताकत है चाहे वह किसी रूप में हो, उसी की पूछ हो रही है. कमजोरों को सतया जा रहा है. उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है. यह यदि मिल भी रहा है, तो उसके स्वरूप पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. साथ ही साथ उसमें इतनी देर हो रही है कि उस न्याय की सार्थकता ही खत्म हो जाती है. कुछ ही दिनों पहले झारखंड के दौरे पर आये सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री बालाकृष्णन ने कहा था कि झारखंड में अधिकतर मामले (केस) गरीबों पर किये जाते हैं. इन सब बातों से पता चलता है कि हमारी सरकार की कार्य प्रणाली आम लोगों के लिए कितनी प्रतिकूल साबित हो रही है कि न्याय के आलय अर्थात न्यायालय के छोटे स्तर के कर्चचारी के द्वारा न्याय की मूर्ति अर्थात् न्यायमूर्ति को चाकू दिखाने की घटना असाधारण तो है ही, पर उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आखिर ऐसी स्थिति आई ही क्यों? क्यों उस चपरासी को लोगों व मीडिया अथवा सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए हथियार (चाकू) का प्रदर्शन करना पड़ा.

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Breaking News
जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन