| शर्त है कि जनता बेईमानी छोड़ दे |
![]() अपने बीच के एक ऐसे व्यक्ति का चुनाव करे, जो स्वहित से ज्यादा लोकहित का लक्ष्य रखे। भारतीय लोकतंत्रा में आज स्थिति यह है कि जनता अपना महत्व भूल चुकी है। वह अपना प्रतिनिधि नहीं चुनती, बल्कि अपनी जाति के व्यक्ति को चुनती है। वह चुनती है ऐसे व्यक्ति को, जो सड़क-नाली से लेकर उम्मीदों के सपने को जमीं पर उतारने का झूठा आश्वासन देता है। कमाल तो यह है कि वह मीट-भात, हड़िया; दारूद्ध, कम्बल, चादर, साड़ी जैसी चीजों को पाकर उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा हो जाती है, यह जाने बिना कि उसका व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकार कैसा है। यदि ऐसा नहीं होता तो राजनैतिक पार्टियाँ चुनाव के दौरान क्षेत्रा के जातीय समीकरण की ओर ध्यान ही नहीं देतीं। जनता यदि समझदार होती, तो जेल में बंद कैदी, भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज चुनाव के मैदान में नहीं उतरते। ये लोग सीना तान कर यह नहीं कहते कि हम पिंजड़े में कैद रह कर भी चुनाव जीत लेंगे। |
| और पढ़ें ... |
जबतक खरीदने की ताकत रहेगी बाजार चलेगा
जूते की महिमा![]() जूता राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक है. आदि काल से ही जूते को हम सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. जूता आदमी को पहचान दिलाती है. आप कितने बड़े हैं, इसकी पहचान कराती है. यदि किसी को जूता मिल जाए, तो वह खुद को गौरवान्वित महसूस करता है. हजारों-लाखों लोग जूता पाने प्राप्त करने के लिए तरसते हैं. इसके लिए जुगाड़ लगाते रहते हैं. जैसा कि बड़े-बड़े सम्मानों में तरह-तरह के घपले होते हैं, राजनीति होती है, सेटिंग होती है, उसी तरह जूते पाने में नेताओं ने बाजी मार ली है. इनका लाॅबी इतना प्रभावशाली है कि दूसरे को लेने नहीं देते. इतिहासकारों को मत है कि जूते का आविष्कार भारत में हुआ था. आदि युग में इसे खाड़ाऊँ कहा जाता था. उस युग मे इसे भी खड़ाऊँ का इतना महत्व था कि मार्यादा पुरुषोत्तम राम अपना राजपाट राजमुकूट, वस्त्राभूषण सभी कुछ छोड़ गये पर खडाऊँ को नहीं छोड़ सके. छोटे भाई को जैसे ही पता चला कि खड़ाऊँ को लेते गये, तो भरत से रहा नहीं गया. वे पीछा करते हुए राम तक पहँच ही गये और खड़ाऊँ लेकर ही माने. आदि काल से आज तक इसके रूप और नाम बदलता गया. वर्तमान् में इसे चमरौधा जूता, जूता, जूती, सैंडल, स्लीपर, हवाई चप्पल के अलावा कई और नामों से भी जाने जाते हैं.
अनैतिक कार्यों में लग गए हैं अर्द्धसैनिक बल के कुछ अधिकारी जिस प्रकार देश में सैनिक अर्धसैनिक बलों के क्रियाकलापों में लगातार नैतिकता का ह्नास हो रहा है. और दिन प्रतिदिन घोटालों का समावेश हो रहा है, वह अत्यंत ही चिन्तनीय एवं शर्मनाक है. वैसे तो समाज का हरेक क्षेत्र भ्रष्टचार रूपी गंदगी में लोट रहा है, पर उसमें कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका इससे दूर रहना देश हित में अतिआवश्यक है. रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, सूचना आदि कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण विभाग हैं, जिनका चुस्त-दुरूस्त एवं अनुशासित रहना देश की सुरक्षा और भविष्य के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है. देश के सैनिक, अर्धसैनिक बलों में घोटालों का मामला प्रायः प्रकाश में आता रहता है. बिहार-झारखंड सेक्टर के सीआरपीएफ आईजी-सह-भर्ती बोर्ड के चेयरमै रिश्वत देने वाले युवाओं की खानापूर्ति के लिए अलग से परीक्षा ली जाती थी. स्पष्ट है, पैसे की लालच में इस प्रकार सैनिक, अर्धसैनिक बलांे में भर्ती करने की प्रक्रिया में नियमों एवं अनिवार्य शर्तों की अनदेखी की जाती है. सुरक्षा की दृष्टि से जिन मापदंडों की अनिवार्यता है, उन्हें रुपए की खातिर नकार कर देश की सुरक्षा और अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया जाता है. दुसरी तरफ अनेक गरीब युवा नौकरी पाने की ललक में खेत जमीन बेचकर ऋण लेकर रिश्वत देते हैं. फिर भी उनकी नौकरियों की कोई गारंटी नहीं होती. ऐसे में सरकार को ध्यान देना चाहिए कि सुरक्षा बलों के अधिकारियों, कर्मचारियों के वेतन में प्रयाप्त वृद्धि करे ताकि वो पैसे की खातिर इस प्रकार के अनैतिक कार्यों का सहारा न लें. इसमें केवल एक पक्ष को गिरफ्तार करने से कुछ नहीं होगा. उन लोगों को भी गिरफ्तार करना चाहिए, जिन्होंने रिश्वत देकर नौकरी पाने की कोशिश की है. कुशल एवं योग्य उमीदवारो का हक छीना है, इससे भविष्य में घूस देकर अनैतिक रूप से नौकरी पाने वाले युवक भी ऐसे अवैध कार्य करने से डरेंगे. के ई सैम |

























