| मंचों का ठाट |
हिन्दस्वराज के शताब्दी वर्ष पर ![]() सजग, जागरूक भारतीय के मन में एक विचार कौंधता है, गांधीजी आज यदि जिंदा होते, तो उनकी स्थिति क्या होती? गांधीजी यदि आज होते, तो भारतीय राजनीति और करोड़ों जनता की स्थिति क्या होती? अच्छा हुआ गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं। स्वतंत्रता के ध्वजवाहक गांधीजी तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, स्वतंत्रता के जश्नों में डूबे राजनीतिज्ञों द्वारा नकार दिये गये थे। एक तरपफ सत्ता के लिए भारत के धुरंधर राजनीतिज्ञ तोड़-जोड़ में लगे थे, दूसरी ओर गांधीजी बंद कमरे में एक कुर्सी पर पड़े मायुसी के साथ आँसू बहा रहे थे। गांधीजी नहीं हैं, तो क्या हुआ। गांधीजी के विचार आज भी जिंदा है, कल भी रहेगा। अफसोस तो इस बात का है कि गांधीजी को, गांधीजी के विचारों को इन राजनीतिज्ञों ने मंचों का ठाठ बना लिया है। मंच पर खड़े होकर गांधीजी के विचारों का बखान करने वाले ये माननीय नेतागण मंच से उतरते ही गांधी को भूल जाते हैं। अपने घरों में या अपने कार्यालयों में गांधीजी की तस्वीरें तो लगाते हैं, पर उसी कमरे में बैठकर गांधीजी के आदर्शो को भूलकर देश को बेचते हैं। ‘‘गांधी का खादी’’ अब गरीबों का नहीं रहा। अपने काले कारनामों को सफेद दिखाने के लिए खादी इन राजनीतिज्ञों के लिए एक लबादा मात्रा बन कर रह गया है। सत्य और अहिंसा के मार्गदर्शक गांधी के इस देश में हिंसा लता की तरह सारे देश में कैसे फैल गया? गांधीजी के विचारों को असर इन नक्सलियों, अलगाववादियों, देहद्रोहियों पर क्यों नहीं होता? इन संस्थाओं के बौद्धिक मंचों की बुद्धि कुंभकरर्ण की तरह क्यों सोयी पड़ी है? गांधीजी तो राम के भक्त थे, वे स्वयं राम भी थे, जो 14 वर्षों का वनवास खत्म होने के पहले ही लंका पर विजय भी पा ली थी, पर गान्धीजी का वनवास लम्बे समय तक चल सकता है. वैसे भी समय तो इंतजार कराता ही है। हजारों वर्षों तक तप भी करने पड़ते हैं। आशा ही इंसान को जिंदा रखती है। आज अंधेरा है, तो कल उजाला होगा ही। गांधीजी के विचार भले ही आज काल कोठरी में पड़ा है, कल वह निकलेगा। सत्य अहिंसा की खुशबू बिखेरेगा। अरूण कुमार झा प्रधान संपादक |
कल्याण विभाग कितना कल्याणकारी?
सरकार के लिए राज्य की जनता की बजाए यहाँ के कुछ अधिकारियों, कर्मचारियों दलालों एवं आपूर्तिकर्ताओं इत्यादि के कल्याण हेतु सरकारी योजनाएँ चलाई जा रही हैं? जी हाँ! राज्य में फैले हुए भ्रष्टाचारों को देखते हुए तो कुछ ऐसा ही लगता है. सरकार के लाख दावों के बावजूद यहाँ लूट की खुली छूट बदस्तुर जारी है. कल्याण विभाग के आवासीय स्कूलों में छात्रों को भोजन के नाम पर घटियासामानों की आपूर्ति की जा रही है. कल्याण विभाग के कर्मचारियों ने आपूर्तिकर्ता विंध्यवासनी स्टोर के मालिक से साँठ-गाठ कर सरकार पैसों का बंदरबाँट कर लिया है. पौष्टिक खाद्यान्न की जगह विद्यार्थियों को सस्ते एवं मिलावटी आहारांे की आपूर्ति की जा रही है. इससे एक ओर जहाँ झारखंड के नौनिहालोें का बौद्धिक एवं शारीरिक विकास अवरूद्ध हो रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ भी किया जा रहा है. विद्यार्थियों के लिए मँहगें चावल, मीट-पनीर मेवे आदि का आवँटन सरकार के द्वारा किया जाता है. पर बीच के दलालों के द्वारा केवल कागजों पर अच्छे सामग्रियांे की आपूर्ति दिखा दी जाती है.
एक घर बिन ख्यालों, ख्वाबों और ख्वाहिशों काये घर है विश्वाश का. ये घर है प्रेम और वलिदान का. ये घर है क्षमा और दया का. ये घर है भाईचारगी और सौहार्द्र का. ये घर है त्याग औरतपस्या का. ये घर है. यहाँ आपका वागत है. लेकिन एक अनुरोध यहाँ कुछ लेकर कृपया न आयें. यहाँ इस घर में नफरत की कोई गुजाईश नहीं. इस घर में दोहरे चरित्र की आवश्यकता नहीं. इस घर में सिर्फ देने का रिवाज है लेने का नहीं. इस घर से सिर्फ मिल सकता है. बाहर से कुछ लाने की आवश्यकता नहीं. यदि यह सब आप कर सकेंगे/सकेंगी, तो यह घर आप का तहे दिल से स्वागत करता है. आप एक बार यहाँ प्रवेश करेंगे/करेंगी तो फिर संभव नहीं है आपके लिए यहाँ से चला जाना क्यों कि यहाँ कोई शर्त नहीं रखी जाती है. यहाँ दिखाबे का ख्वाब नहीं होता, यहाँ न किसी प्रकार का बनावटी ख्याल पलते हैं, फिर ख्वाहिशें कैसी? इस लिए आप को सब कुछ छोड़ कर ही इस घर में प्रवेश करना होगा. पहले पात्रता आपको तैय करनी पड़ेगी कि इस योग्य आप है। या नहीं! यह भी आप पर स्यवं निर्णय छोड़ा गया है. फिर समय भी है, जैसा भी निर्णय करें. आप का हमेशा स्वागत है. ये घर सिर्फ सच्चा प्रेम का है. यहाँ तेरा मेरा कुछ नहीं है. यहाँ न बुढापा है, न जवानी है. यहाँ उम्र की कोई बंदिश नहीं है. क्योंकि यह सब कुछ दिनों में समाप्त होने वाली चीजें है. जिस पर आप और मेरा कोई बस नहीं, फिर इस पर इतराना कैसा? आइए आपका स्वागत है, न कोई कहानी लेकर आइए न ही कोई कविता लेकर. यहाँ आपकी इन चीजों की कोई अहमियत नहीं है. क्योंकि आपकी अपना कुछ भी नहीं है. यह सब आप के गलत ख्याल का अहंकार है, इसे छो़ड़ कर आइए. आप का स्वागत है. -देह की लकीर टूटता जुड़ता हुआ इसका आयाम, कभी सिहरन भरा दर्द, कभी घृणा का अहसास. फिर भी ऐसी यह लकीर, जिस पर मानव चलने को आतुर, रोज वही सज-धज वही सुवह व शाम बाकी सब धुआँ धुआँ. तो फिर इस धुएँ की धुंध से निकल कर इस घर में आ जाइए। आप का स्वागत है। ये आप का ही घर है. तो आ जाइए न!! अरुण कुमार झा
मलूटी के मंदिर पवित्र द्वारिका नदी के किनारे स्थित मलूटी के मंदिर मध्यकालीन स्थापताय-कला के अनूठे नमूने हैं जिनकी दीवारों पर टेराकोटा की कलाकृतियाँ मानो सजीव हो उठी हैं। झारखंड और बंगाल के बार्डर पर, दुमका जिले से 55 किलोमीटर दूर एक गांव है, मलूटी। इस गांव में एक सिरे से दूसरे सिरे तक सिर्फ मंदिर हीं मंदिर नजर आते हैं। शायद एक छोटी सी जगह में इतने सारे मंदिर एक साथ होने की वजह से हीं इस क्षेत्र का नाम गुप्त काशी रखा गया होगा। इस गांव में कभी 108 मंदिर स्थित थे जिनमें से अधिकांश भगवान् शंकर को समर्पित थे और इनमें भव्य शिवलिंग स्थापित थे। संरक्षण के अभाव के चलते अब इन मंदिरों में सिर्फ 69 मंदिर ही बच पाये हैं।
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