magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 
प्रवेश फॉर्म
यहाँ कई रामदेव हैं।
सनातन काल से योग इस देश का एक अभिन्न अंग रहा है, जिसके लिए यहाँ के लोगों को न तो किसी गुरु की जरुरत रही ना ही पोंगे पंडितोंकी, स्पष्ट कहें तो योग विद्या भारतीयों के रक्त में बसता है जरुरत लगन और साधना करने की है। एक नजर तस्वीर पर देखिये, सिर्फ़ योग का करामात, इसी करामत के बूते इनका नाम लिम्का बुक में दर्ज किया गया है और वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए प्रस्तावित किया जा चुका है। ये सिर्फ़ योग की माया है, साधना योग की ना कोई गुरु ना कोई शिष्य बस लगन और साधना। पाँच साल का अथक परिश्रम और योग का करामत की दोनों कंधे को मिला लिए। योग को अपना धंधा और मीडिया को इस धंधे में शामिल करने वाले (बाबा) रामदेव जरा नजर मारें , वस्तुतः एक चुनौती भी कि बाबा जी मीडिया का माइक पकड़ने के बजाय इस चुनौती को भी स्वीकारो। नमन इस देश के अद्भुत प्रतिभा को। जय हिंद

वंदे मातरम्

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) 

चिकित्सक भी कमीशनखोर हो गये हैं

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आम आदमी को अब चिकित्सकों को भगवान समझने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अब चिकित्सक भी कमीशनखोर हो गये हैं. ऐसी बात नहीं है कि वे आज ही हुए हैं  कमीशनखोरी चिकित्सकों के लिए अब एक उद्योग बन गया है. आप जहाँ भी जायें चिकित्सकों के पास वे आप को भारी-भरकम लिस्ट थमा देंगे पैथोलोजिकल जाँच के लिए. आप के पास खाने का अन्न हो न हो लेकिन ये बेईमान, चिकित्सक चिकित्सिा के नाम पर आप को कहीं नहीं रहने देंगे. समाज में अतिप्रतिष्ठित माने जाने वाले चिकित्सकीय पेशा घृणित पेशा के रूप में देखा जाने लगा है, रोगियों के लिए मजबूरी है कि वे जायें तो जायें कहाँ उन्हें तो वहीं जाना पड़ेगा, जहाँ लूटा-पिटा कर जान बचाना है. वे करे तो क्या करे. उन्हें तो धन लोलूप चिकित्सक की शरण में ही जाना पड़ेगा, ऐसे धनलोलूप चिकित्सक के कारण समाज को शर्मसार होना पड़ रहा है.

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पानी


कहीं कुछ तो है, तभी तो
सौरमंडल के सभी ग्रहों से अलग है पृथ्वी
इस पृथ्वी पर हुआ जीवन का विकास.
कहीं कुछ तो है, तभी तो
पृथ्वी पर है-मौसम, हरियाली, जीव-जन्तु
पशु-पक्षी और आदमी.

यहाँ है -पानी
पानी......पानी

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भारत में पहली महिला स्पीकर

Meera Kumar :Speaker of indian Parliamentभारत ने अपने इतिहास में पहली बार लोक सभा अध्यक्ष के रूप में एक महिला को चुना है. सांसदों ने 64 साल की मीरा कुमार को एकमत से अध्यक्ष चुना. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस अवसर को ऐतिहासिक बताया जिससे महिलाओं की भूमिका को श्रद्धांजलि मिली है. इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने राज्य सभा में विपक्ष के अध्यक्ष के रूप में अरुण जेटली को चुना है और एसएस आहलूवालिया को उपाध्यक्ष के रूप में. लोकसभा में लालकृष्ण आडवाणी विपक्ष के प्रमुख रहेंगे और सुषमा स्वराज उपाध्यक्ष रहेंगी.


 
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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन