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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 
प्रवेश फॉर्म
यहाँ कई रामदेव हैं।
सनातन काल से योग इस देश का एक अभिन्न अंग रहा है, जिसके लिए यहाँ के लोगों को न तो किसी गुरु की जरुरत रही ना ही पोंगे पंडितोंकी, स्पष्ट कहें तो योग विद्या भारतीयों के रक्त में बसता है जरुरत लगन और साधना करने की है। एक नजर तस्वीर पर देखिये, सिर्फ़ योग का करामात, इसी करामत के बूते इनका नाम लिम्का बुक में दर्ज किया गया है और वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए प्रस्तावित किया जा चुका है। ये सिर्फ़ योग की माया है, साधना योग की ना कोई गुरु ना कोई शिष्य बस लगन और साधना। पाँच साल का अथक परिश्रम और योग का करामत की दोनों कंधे को मिला लिए। योग को अपना धंधा और मीडिया को इस धंधे में शामिल करने वाले (बाबा) रामदेव जरा नजर मारें , वस्तुतः एक चुनौती भी कि बाबा जी मीडिया का माइक पकड़ने के बजाय इस चुनौती को भी स्वीकारो। नमन इस देश के अद्भुत प्रतिभा को। जय हिंद

वंदे मातरम्

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) 

गांधीजी पर विशेष लेख

माहात्मा गांधी के आर्थिक विचार

नागेन्द्र  प्रसाद  

दो अक्तूबर 1869 को उस महापुरुष का जन्म पोरबन्दर में हुआ, जिन्होंने भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्त कर आजाद कराया। इनकी प्रारंभिक शिक्षा भारत तथा उच्च शिक्षा इग्लैंड में हुई। बैरिस्ट्री पास कर भारत आए, तो देश सेवा एवं समाज सेवा में लग गए। गांधीजी के नेतृत्व में देश आन्दोलित हुआ और अहिंसा परमो धर्मः के रास्ते पर चलकर भारत ने दुनिया को एक नई दृष्टि दी। गांधीजी के ऊपर विभिन्न धर्मों एवं संतों का व्यापक प्रभाव पड़ा। उन्हांेने ईसाई धर्म से प्रेम और सेवा का पाठ सीखा, तो जैन धर्म से अहिंसा ग्रहण की।

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गांधीजी पर विशेष लेख


 

आज के युग में गांधी की प्रसांगिकता




 महात्मा गांधी मानवता के इतिहास में शायद पहली  ऐसी शख्सियस हैं जिन पर सबसे ज्यादा लिखा गया  है। उनके व्यक्तित्व के कई पहलुओं पर अभी भी लिखा  ही जा रहा है। आज जब दुनिया की राजनीति कई  विरोधाभासों से होकर गुजर रही हैगांधीजी की  प्रसांगिकता पहले से भी ज्यादा बढ़ गई  है।आजमानव सभ्यता एक ही साथ  मानवाधिकारों,पर्यावरणधर्मनिरपेक्षता और और  विश्वशान्ति की बात करती हैदूसरी तरफ संसाधनों  को हड़पनेउपभोक्तावाद के पीछे भागने और कमजोरों  को दबाने का सिलसिला रुक नहीं रहा है। ऐसे में  सवाल  ये है कि आज के युग में दुनिया के  लिएऔर खासकर भारत के लिए गांधीजी की  प्रसांगिकता को किस रुप में व्याख्यायित किया  जाए। गांधीजी भारत के इतिहास में सबसे बड़े जननेता  हुए हैं। उन्होने सत्य और अहिंसा के हथियार का  नायाब आविष्कार कर अपने समय में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को झुकने को मजबूर कर दिया। जातिधर्मभाषा और नस्ल के आधार पर बंटे इस देश को गांधीजी ने उस दौर में एक ऐसा नेतृत्व दिया जो समकालीन इतिहास में दुर्लभ है। गांधीजी पहले ऐसे नेता थे जिन्होने इस बात की पहचान की थी कि भारत मूलतरू गांवो का देश है और इसका विकास तबतक नहीं हो सकता जबतक गांवों का सर्वांगीण विकास न हो। कई लोग गांधीजी के इस विचार को उनके औद्योगीकरण और भारी उद्योग के विरोध से जोड़ते हैं जो उचित नहीं है।

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मंचों का ठाट

हिन्दस्‍वराज के शताब्‍दी वर्ष पर


 सजग, जागरूक भारतीय के मन में एक विचार कौंधता  है, गांधीजी आज यदि जिंदा होते, तो उनकी स्थिति क्या  होती? गांधीजी यदि आज होते, तो भारतीय राजनीति  और करोड़ों जनता की स्थिति क्या होती?

 अच्छा हुआ गांधीजी हमारे बीच नहीं हैं। स्वतंत्रता के  ध्वजवाहक गांधीजी तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, स्वतंत्रता  के जश्नों में डूबे राजनीतिज्ञों द्वारा नकार दिये गये थे। एक  तरपफ सत्ता के लिए भारत के धुरंधर राजनीतिज्ञ तोड़-जोड़  में लगे थे, दूसरी ओर गांधीजी बंद कमरे में एक कुर्सी पर  पड़े मायुसी के साथ आँसू बहा रहे थे।

गांधीजी नहीं हैं, तो क्या हुआ। गांधीजी के विचार आज भी जिंदा है, कल भी रहेगा। अफसोस तो इस बात का है कि गांधीजी को, गांधीजी के विचारों को इन राजनीतिज्ञों ने मंचों का ठाठ बना लिया है। मंच पर खड़े होकर गांधीजी के विचारों का बखान करने वाले ये माननीय नेतागण मंच से उतरते ही गांधी को भूल जाते हैं। अपने घरों में या अपने कार्यालयों में गांधीजी की तस्वीरें तो लगाते हैं, पर उसी कमरे में बैठकर गांधीजी के आदर्शो को भूलकर देश को बेचते हैं। ‘‘गांधी का खादी’’ अब गरीबों का नहीं रहा। अपने काले कारनामों को सफेद दिखाने के लिए खादी इन राजनीतिज्ञों के लिए एक लबादा मात्रा बन कर रह गया है।

सत्य और अहिंसा के मार्गदर्शक गांधी के इस देश में हिंसा लता की तरह सारे देश में कैसे फैल गया? गांधीजी के विचारों को असर इन नक्सलियों, अलगाववादियों, देहद्रोहियों पर क्यों नहीं होता? इन संस्थाओं के बौद्धिक मंचों की बुद्धि कुंभकरर्ण की तरह क्यों सोयी पड़ी है? गांधीजी तो राम के भक्त थे, वे स्वयं राम भी थे, जो 14 वर्षों का वनवास खत्म होने के पहले ही लंका पर विजय भी पा ली थी, पर गान्धीजी का वनवास लम्बे समय तक चल सकता है. वैसे भी समय तो इंतजार कराता ही है। हजारों वर्षों तक तप भी करने पड़ते हैं। आशा ही इंसान को जिंदा रखती है। आज अंधेरा है, तो कल उजाला होगा ही। गांधीजी के विचार भले ही आज काल कोठरी में पड़ा है, कल वह निकलेगा। सत्य अहिंसा की खुशबू बिखेरेगा।

अरूण कुमार झा

प्रधान संपादक 

 
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जरूरी है, ध्वस्त होते आदमी को बचाना
जिस पृथ्वी को
सभ्य, सुन्दर और सुसंस्कृत रूप देने में
हजारों वर्ष लग गए।
उसी पृथ्वी को
असभ्य, कुरूप और अपसंस्कृत करने के लिए
जिन-जिन चीजों की आवश्यकता होती है ।
उसे कुरूप बनाने में सौ वर्ष भी नहीं लगे।
सौ वर्षों के अन्तराल में

पृथ्वी को नेस्तनाबूद करने के
लिए आणविक, रासायनिक और जैविक अस्त्र बना लिए
और इससे भी कम समय में
प्रकृति की पास्थितिकी में हस्तक्षेप से
ओजन परत में छिद्र हो गया।
वायुमंडल शोर और धूएँ से भर गया
जलधारा गदली हो गई ।
जंगल विरल हो गए
मौसम का मिजाज बदल गया.
सौ वर्षों से भी कम समय में
परासंवेदंशील तकनीक विकसित हुई
क्लोन , जीन और टेस्ट-ट्यूब बेबी बनाये गये।
औद्योगिक और कृषि-क्रांति के साथ-साथ
संचार-क्रांति के तहत
विश्व-ग्राम की परिकल्पना की जाने लगी।
देखते ही देखते आचार-विचार-व्यवहार बदल गये।
खाने पीने से लेकर अशोआराम की चीजों से
बाजार पट गया।
चाइनीज फास्ट-फूड, पीटर इंग्लैंड की शर्ट,
अमेरिकन कोकाकोला, कोरियाई टीवी, फ्रीज,
जापानी इलेक्ट्रोनिक्स सामानों के बिना
जीवन फीका लगने लगा।
वहीं दूसरी ओर, दूसरों के लिए हम
क्रूर, नृशंस और संवेदनहीन हो गये।
हमने गाय-भैंसों को इंजेक्ट कर
उनके शरीर से दूध का अंतिम बूंद तक
निचोड़ना सीख लिया।
साँपों का रक्त और चीटों का सूप पीने लगे।
हमने इंसानों का रक्त, गुर्दा और आँखें बेची।
बूढ़े इंसानों-अय्यासों के लिए
लड़कियाँ निर्यात किये।
इंसान में इंसानियत एक परसेंट न था।
तना तार था, जिसमें करन्ट न था।
कोई चालीस-पचास वर्ष हुए होंगे
कि इलेक्ट्रोनिक्स तकनीक के माध्यम से
घर बैठे अपने-अपने टेलिविजन स्क्रीन पर
युद्ध, दंगा, नरसंहार, हत्या बलात्कार के साथ-साथ
देश और जनता को बेचते हुए लोगों की
ब्ल्यू -फिल्में दिखाई जाने लगी।
समाचार-पत्रों में अपहरण, नक्सलवाद
रिश्वत-घोटाला छा गया।
यहाँ किसी का हाथ दोस्ताना न
थाजो मिला, सबके हाथों में दास्ताना था।
इस कठिन वक्त में
विचार करने का समय है कि
इस पृथ्वी को विध्वंस होने से बचा कर
सुरक्षित कैसे रखा जाये।
नष्ट होती पृथ्वी को बचाने के लिए
जरूरी है- ध्वस्त होते आदमी को बचाना.
आदमी को बचाने के लिए

मेरे पास एक कविता है
जो देती-है
आँखों को दृष्टि,
नाकों को गंध,
कानों को आहट
त्वचा को स्पर्शऔर आत्मा को आत्मीयता।
बहुत थोड़े से समय में तय करना है-
निर्माण या विध्वंस
शास्त्र या शस्त्र

प्रेम या नफरत
शान्ति या आतंक
इतनी बड़ी दुनिया में
इतने लोगों के बीच
एकल जिन्दगी जीते हुए
मुझे लगा थके-हारे, घबड़ाये-बौखलाये इंसानों के बीच
संवाद स्थापित करने के लिए
मेरी कविता माध्यम बन सकती है,
इसलिए अपनी कविता की
लाखों-करोड़ों प्रतियाँ लेकर
आप के बीच खड़ा हूँ मैं।

विजय रंजन