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नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
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vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
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सम्बद्ध सम्पादक 
 
प्रवेश फॉर्म
वाच डौग की ईमानदार भूमिका किसके लिए?

Image of Hard Copy Of Drishtipat July 2009 दृष्टिपात का जून की तरह जुलाई अंक भी हम पत्रकारिता को समर्पित कर रहें हैं, और आगे भी दो अंक पत्रकारिता विशेषांक ही प्रकाशित करेंगे. 

यह अंक लघु पत्रकार, वेब पत्रकार एवं पत्रकारिता पर केंद्रित है. आज पूरे देश में लघु समाचार पत्रों एवं पत्राकारों की स्थिति सरकार और समाज की घोर उपेक्षा का दंश झेलते-झेलते बद-से बदतर होती जा रही है.  

नक्सलवाद को पनपने के कारण को नीति निर्धारक किस रूप में  लेते हैं, उसे समय-समय पर अखबारों के माध्यम से बयां करते रहते हैं, इनके बयां सब के समझ के बाहर होता है, इनके बयां पर किसी की एक राय नहीं होती लेकिन देखने-बुझने वाले आ, लोगों  का मानना है कि नक्लवाद के पनपने का कारण सरकारी उपेक्षा, बड़े लोगों के द्वारा लगातार शोषण किया जाना, भूख, अभाव और समाजिक उपेक्षा ही है. 

ऐसी ही स्थिति अज लगभग भारत के लघु पत्र-पत्रिकाओं और उसके पत्राकारों की बनी हुई है. आज पूंजीपतियों के अखबारों, मीडिया संस्थानों और सरकार की दोगली नीति ने लघु पत्र-पत्रिकाओं के सामने भूखमरी, उपेक्षा, और समाज में उनके प्रति घृणा की स्थिति उत्त्पन्न कर रखी है.  

अरुण कुमार झा

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सदर्भ झारखण्ड में ऩक्सलवाद

चिदम्बरम का स्वागत योग्य ऐलान

जिस दिन रक्तबीज, चंडमुंड, महिसासुर जैसे राक्षसों का बध करने वाली माँ दुर्गा के पंडालों के पट खुल रहे थे, उसी दिन देश के गृहमंत्री श्री पी0 चिदम्बरम झारखंड के राजभवन में नक्सली समस्या पर आयोजित समीक्षा बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेंस में नक्सलियों के नाम के लिए लम्बी लड़ाई की घोषणा कर पट खोल रहे थे।

उन्होंने बताया कि केन्द्र सरकार इसे चुनौती के रूप में ले रही है। उनके वक्तव्यों के जो अनमोल वचन हैं, वे हैं कि नक्सलियों के साफाये के लिए अर्धसैनिक बल ही काफी है। सेना की सहायता लेने की जरूरत नहीं हैं। दूसरे कि झारखंड में फोर्स की कमी नहीं होने दी जायेगी। तीसरे कि राजनेता और नक्सली के बीच रिश्ते के बावत उन्हें कोई जानकारी नहीं है। यह पूछे जाने पर कि दुर्गा माता, महिषासुर बध के लिए कब हथियार उठायेंगे, तो उन्होंने इसका जवाब नहीं दिया। और फिर वे राजधानी दिल्ली को उड़ गये।

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच वे आये और जब उड़े, तो कहीं जाकर सुरक्षा में लगे अधिकारियों ने चैन की संास ली।

कहा तो यह जाता है कि राज्य के 24 जिलों में से 22 जिलों में नक्सलियों का शासन है। नक्सली अपना शासन फैलाते चले गये और सरकार अपना हाथ-पाँव सिकोड़ती चली गयी।

झारखंड की जनता का न सरकार, न नेता, न शासन, न पुलिस किसी पर भरोसा नहीं है। जिस शेर के बल पर गृहमंत्री लड़ाई का ऐलान कर रहे हैं, वह शेर तो मांद में घुस कर बैठा रहता है। उनकी तो अपनी जान बचाने की फिक्र रहती है। उसकी बंदूकें लूटी जाती हैं, जवान मारे जाते हैं, हत्या-लूट के बाद नक्सली आराम से क्षेत्र से निकल जाते हैं। और पुलिस छापेमारी की योजना और छापेमारी करती रह जाती है। करोड़ों रुपये लूट गये, पुलिस नाकेबंदी, छापेमारी, सीमा सील करती रह गयी। और रुपये कपुर की भांति उड़ गये। वाह! कमाल की व्यवस्था है। खैनी फांकती, दो नलियाँ बंदूक थामें डरी-सहमी पुलिस क्या करेगीं एके-47, एके-56 के सामने?

नक्सलियों के इतिहास को तीन अध्यायों में बाँटा जा सकता है। पहला कि वे झारखंड में आये तो पहला काम यह किया कि बडे़-बड़े जमींदारों को अपना निशाना बनाया और उनके खेतों में लाल झंडा गाड़ दिये। उनसे पैसे और बंदूक की मांग की गयी। जमींदारों और गाँव के बड़े लोगों को पकड़ कर गाँव की गरीब जनता के सामने प्रताड़ित कर उनका नैतिक बल को तोड़ दिया गया। इससे दो बातें हुईं। पहली कि जो जमींदार समर्थ थे, वो गाँव छोड़कर पास के शहर में जाकर छोटे-मोटे रोजगार में व्यस्त हो गये। दूसरे कि जो समर्थ नहीं थे, उनलोगों ने अपना सर नक्सलियों के सामने झुका दिये और पैसे और बंदूक देकर खेती करने लगे। इससे गाँव के गरीब लोगों में यह विश्वास घर कर गया कि ये नक्सली उनके हितैषी हैं और उनसे इनको लाभ मिलेगा और इस तरह जमींदार गाँव से खदेड़ दिये गये। और गरीबों में इनकी पहचान बन गयी।

दूसरे अध्याय मंे इनलोगों ने सरकारी अफसरों, ठेकेदारों, पुलिस और सरकारी भवनों को धड़ाधड़ बम से उड़ाये जाने लगे। ठेकेदारों से लेवी की मांग आरंभ हो गयी। पुलिस और प्रखंड स्तर के सरकारी कर्मचारियों मे डर बैठाया गया और लेवी ली जाने लगी।

पुलिस इतनी सहम गयी कि खामोश रहने में ही अपनी भलाई समझी। फिर लुभाने के लिए जन-समस्याओं को लेकर बंद का आयोजन और फिर जन-समस्याओं को सुलझाने के लिए अदालतें लगाई जाने लगीं। इन सब का मतलब गरीब जनता के बीच अपनी अपनी पैठ बनाना था।

तीसरे चरण का दौर तब शुरू हुआ, जब जनता गौण हो गयी और लेवी प्राथमिकता बन गयी। नक्सलियों का आन्दोलन जो जन-आन्दोलन के रूप में जाना जाता था, वह लेवी वसूली और आतंक के रूप में जाना जाने लगा। गाँव के ग्रामीण जो हितैषी मानने लगे थे, वही हितैषी लोगों को जबरन अपनी सेना में भर्ती कर हथियार थमा दिए। हर गाँव के नौजवान इनकी सेना में भर्ती होने लगे। मौसम की मार, बेरोजगारी और बड़े किसानों द्वारा कृषि कम कर दिये जाने के कारण उत्पन्न्ा भयावह समय में इनके पास इन नक्सलियों के बंदूक ढोने के अलवा कोई काम नहीं बचा। अब डरी-सहमी पुलिस, डरा-सहमा प्रशासन, भय से काँपते ग्रामीण के ऊपर ये लोग अपने बचाव के लिए या फिर कहिए कि नेता अपने कारणों से एक दूसरे के समीप आ गये। दोनों के बीच याराना बढ़ गया। साम्राज्य स्थापित होने का प्रमाण यह है कि नक्सली की ओर से कोई संदेश हो या न हो, खबरों में आते ही शहर, रेल, बस, सभी बंद हो जाते हैं।

बंद इनके लिए मनोरंजन का साधन बन गया। जन सरोकार के लिए नक्सली आन्दोलन का स्वरूप बदल गया और ये लोग करोड़ों के मालिक हो गये। करोडों की वसूली होने लगी। इस कारण कई गुट बने और सबका मकसद लेवी ही रहा। खैर जो भी हो। चिदम्बरम महोदय आये और नक्सलियों से आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर गये। यह स्वागत योग्य है, वशर्ते कि यह चुनाव पूर्व के लुभावने वायदे की तरह न निकले! अब चूँकि चिदम्बरम महोदय अंग्रेजी बोलनेवाले हैं और हमारे महामहिम अंग्रेजी समझनेवाले हैं, इस लिए इनमें क्या बातें हुई, कोई किसको क्या समझाया, इसकी समझ झारखंड की जनता को नहीं है। यह तो समय ही बताएगा कि जिन नक्सली ने झारखंड की नाक में दम कर रखा है, उसकी नाक में नकेल कसने में चिदम्बरम महोदय कामयाब हो पाते हैं कि नहीं! यह भी देखना है कि नक्सलियों के समर्थन और सहयोग इस चुनाव में कौन-कौन नेता लेते हैं और कौन-कौन उनके खिलाफ जंग में शामिल होते हैं। देखना यह भी है कि जो केन्द्र सरकार यह घोषणा करती है कि झारखंड में उद्योग के लिए जमीन की अधिग्रहण नहीं की जायेगी, उस झारखंड का विकास कैसे होगा? यह भी देखना है कि चिदम्बरम महोदय तो हवन करने निकले हैं, कहीं हाथ न जला बैठे!

दृष्टिपात ब्यूरो   

 

झारखंड का प्रकाश स्तम्भ साहित्यकार राधकृष्ण जी की एक अनुपम कृति-

एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी

समय व्यतीत होता जा रहा है ओर यह कहानी अभी तक चल रही है। मगर इस कहानी के शीर्षक को लेकर भ्रम हो जाता है, क्योंकि शीर्षक के साथ कहानी की संगति नहीं बैठती। अतएव, लगता है कि इस कहानी के शीर्षक के संबंध् में एक टिप्पणी की आवश्यकता है। सन 1942-43 का समय था, जब बंगाल में अकाल से और मिथिला में मलेरिया और भूखमरी से लोग मरते जा रहे थे। बंगाल में मरनेवालों की कहानियाँ उजागर हो रही थी, लेकिन बिहार की बातों पर ब्रिटिश सरकार के आतंक से एक पर्दा-सा पड़ा हुआ था। उस समय केवल एक ‘इंडियन नेशन’ था, जो मिथिला के बारे में तब तक लिखता रहा जब तक कि उसके प्रधान संपादक को अपनी नौकरी से हाथ नहीं धेना पड़ा। उस समय बिहार सरकार के सलाहकार थे श्री वाई.एस. गोडबोले। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में बतलाया था कि मलेरिया आदि से मिथिला मंे मरनेवालों की संख्या है ‘‘एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी’’। उसी वक्तव्य को देखकर यह कहानी लिखी गयी थी। यह एक ही परिवार की कहानी नहीं, बल्कि यह एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासी व्यक्तियों की अकाल मृत्यु की करुण कहानी है। इसी कारण इस कहानी का शीर्षक ऐसा है। पहले यह कहानी गौडबोले साहब के वक्तव्य के साथ ही छपती थी। कलान्तर में उद्धृत करनेवालों ने वक्तव्य को छोड़ दिया। उसके बाद यह कहानी छात्रों को पढ़ाई जाने लगी। तब से हमेशा यह सवाल पैदा होता रहा कि इस कहानी का शीर्षक ऐसा क्यों है?

      

   यह मिथिला है। देखिए, गाँव के किनारे कोसी नदी बहती जाती है। सामने वह बूढ़ा पीपल है। पीपल के नीचे कभी का तालाब है। वहाँ पक्का घाट है। पुराने जमाने के किसी जमींदार ने इस घाट को बनवाया था। अब के जमींदार तो मुकदमा लड़ते हैं, मैनेजर और रंडी रखते हैं, शराब पीते हैं, और बंगला बनवाते हैं। घाट-वाट बनवाने के फेरे में नहीं पड़ते। सो घाट र्की इंटें दरक गयी है, पलस्तर छूट गया है, टूटी सीढ़ियों में काई जमी रहती है। यह घाट हमारे काम का नहीं। वहाँ तो बस स्त्रियाँ नहाती है। हम बाल-गोपाल घाट की बगल से नदी में उतरते हैं। वहीं गाय और भैंसों को धोते हैं, छपाछप खूब स्नान करते हैं और सर्र-सर्र पानी में तैरते हैं। उस पीपल पर, कहते हैं, भूत भी ऐसा कि ब्रह्मपिशाच। गाँव वाले कहते हैं कि रात को वह घाट पर बैठा रहता है। अगर कोई उधर जा निकला, तो उसे मार डालता है। हम लोग रात में कभी उधर गये ही नहीं। जाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। पता नहीं ब्रह्मपिशाच की बात कहाँ तक सच है।

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क्या समाज का काम सेक्स पर पहरा देना है

प्रयोक्ता योग्यता निर्धारण: / 3
ऊसरउत्कृष्ट 

सेक्स और समाज का सम्बन्ध ऐसा बन गया है जैसे समाज का काम सेक्स पर पहरा देने का है , सेक्स को मानव से दूर रखने का है . क्या वास्तव में समाज में सेक्स के

लिए घृणा का भाव है ? क्या समाज आरम्भ से ऐसा था ? नहीं , ऐसा नहीं है . सेक्स यांनी काम घृणा का विषय नहीं होकर आनंद का और परमात्मा को पाने की ओर पहला कदम है . आप भी सोचते होंगे कि जब काम इतना घृणित क्रिया है ,भाव है तो पवित्र देवालयों , प्राचीन धरोहरों आदि की मंदिर के प्रवेश द्वार या बाहरी दीवारों पर काम भावना से ओत-प्रोत मैथुनरत मूर्तियाँ अथवा चित्र आदि क्यों हैं ? इस पोस्ट में आपकी इस साधारण शंका का समाधान करने का प्रयास किया गया है . प्रस्तुत है राकेश सिंह जी का यह आलेख : -*

आखिर हमारे देवालयों मैं अश्लील मूर्तियाँ/चित्र क्यों होते हैं? इधर-उधर बहुत छाना पर इसका वास्तविक और और सही उत्तर मिला मुझे महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र में | वैसे तो बाजार में कामसूत्र पर सैकडों पुस्तक उपलब्ध हैं और लगभग सभी पुस्तकों में ढेर सारे लुभावने आसन चित्र भी मिलेंगे | पर उन पुस्तकों में कामसूत्र का वास्तविक तत्व गायब है | फिर ज्यादातर पाठक कामसूत्र को ६४ आसन के लिए ही तो खरीदता है, तो इसी हिसाब से लेखक भी आसन को खूब लुभावने चित्रों के साहरे पेश करता है | पर मुझे ऐसी कामसूत्र की पुस्तक हाथ लगी जिसमे एक भी चित्र नहीं है और इसे कामसूत्र की शायद सबसे प्रमाणिक पुस्तक मानी जाती है | महर्षि वात्सयायन रचित कामसूत्र के श्लोक थोड़े क्लिष्ट हैं, उनको सरल करने हेतु कई भारतीय विद्वानों ने इसपे टिका लिखी | पर सबसे प्रमाणिक टिका का सौभाग्य मंगला टिका को प्राप्त हुआ | और इस हिंदी पुस्तक में लेखक ने मंगला टिका के आधार पर व्याख्या की है | लेखक ने और भी अन्य विद्वानों की टीकाओं का भी सुन्दर समावेश किया है इस पुस्तक में |

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बोनसाई

बोनसाई
 
पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खडी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पीते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता


"विजय रंजन"