magazine
 
नवम्‍बर  2009
संपादक
Pradhan Sampadak
अरुण कुमार झा 
प्रधान सम्पादक
  
 पार्वती सिंह
प्रबंध संपादक 
vijay jee
विजय रंजन
 सम्पादक
विनय कुमार मिश्र 
सम्बद्ध सम्पादक 
 
प्रवेश फॉर्म
कैसे मनाएँ आजादी का जश्न?
आजादी की 62वीं वर्षगाँठ पर शुभकामनाएँ देने और लेने के बाद, जो समय बचा उसमें एक प्रश्न बार-बार उठा कि स्वतंत्राता का यह राष्ट्रीय पर्व हमें छूअन के एहसास क्यों नहीं दिलाता?  मानसिक रूप से क्यों नहीं झकझोरता?  हमें उत्प्रेरित क्यों नहीं करता? आजादी के बजते गीत अब कानों को अच्छे क्यों नहीं लगते?  इन प्रश्नों के उत्तर ढ़ूंढ़ना उतना आसान नहीं है। ये प्रश्न हमारे सामने आजादी के बाद से ही यक्ष प्रश्न की तरह खडे़ हैं।एक बात, जो जन-जन पूछ रहा है कि आजादी के 62 वर्ष के बाद भी गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की इतनी संख्या क्यों है? आज भी देश में गरीबी इतनी क्यों है? आज भी कृषि प्रधन देश में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? आज आजादी के इतने बरस बाद भी गाँवों में गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, आतंकवाद, बुनियादी समस्याएँ ज्यों की त्यों, क्यों है? गाँव की छोड़ दीजिए शहरों में महानगरों में क्यों झोपरपट्टी बढ़ती जा रही है?  आज नक्सलवाद क्यों बढ़ता जा रहा है? आदमी के सिर पे जितने बाल हैं, उससे कहीं ज्यादा सवाल हैं, देश के भाग्य विधता से। आदमी के दो आँखें होती हैं। एक में प्यार बसता है, तो दूसरी में आँसू। जिन आँखों में प्यार बसता है, उनकी पूँजी हर साल करोड़ो-अरबों में बढ़ती जाती हैं। ये हैं -नेता, अपफसर, दलाल, सटोरिए, पूंजीपति, सेठ-साहूकार। ऐसा कैसे हो गया कि एक घर में दिन भर चूल्हा नहीं जलता, दूसरे घर में दिन भर चूल्हे पर दुध् की मलाई बनती रहती है?आज ऐसा क्यों हुआ कि राशन के लिए, गैस के लिए, बिजली के लिए, न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है या फिर सड़कों पर उतरना पड़ता है?  वैसे, तो गरीबों को न्याय कहाँ मिलता है! एक केस फाइल करने में 10-20 हजार रुपये लगते हैं और न्याय पाने के लिए 10-20 वर्ष लग जाते हैं?अनगिनत प्रश्न इन तिरंगे झंडे के  धगों में उलझे हैं, हम फिर कैसे मनाएँ आजादी का जश्न?

हालत तो ये है, ‘‘आजादी का ये जश्न मनाए वे किस तरह,

 जो आ गये फूटपाथ पर घर की तलाश में?’’

अरुण कुमार झा 


 

 

चुनरी मे दाग

बॉलीवुड की 'बबली' यानी रानी मुखर्जी फिल्म 'लागा चुनरी में दाग' और 'सांवरिया' में एक वेश्या का किरदार निभाने के बाद एक फिर से एक अलग तरह का किरदार निभाने के लिए तैयार नजर आ रही हैं।


इस बार रानी मुखर्जी 'यशराज फिल्म्स' की अगली फिल्म 'दिल बोले अड़िप्पा' में एक सरदार का किरदार निभाने वाली हैं। इस फिल्म में रानी अपने प्रशंसकों के सामने एक सरदार के रूप में दाढ़ी और पगड़ी के साथ नजर आएंगी।

जानकारों के मुताबिक इस फिल्म में रानी अपने सपनों को पूरा करने के लिए एक सरदार बनती हैं। फिल्म की कहानी बहुत ही रोमांटिक और कॉमेडी है।

फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ने रानी के लिए परंपरागत कुर्ता पायजामा डिजाइन किया है। फिल्म का निर्देशन अनुराग सिंह ने किया है जबकि फिल्म में उनके साथ शाहिद कपूर, अनुपम खेर, राखी सांवत और शर्लिन चोपड़ा हैं। फिल्म के 18 सितम्बर को रिलीज होने की उम्मीद है।

रंजीत राज

 

 

'हिंसाग्रस्त इलाक़ों में जाने से परहेज़ करें नेता'

लालगढ़ में सुरक्षा बलों की कार्रवाई के बीच गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने नेताओं और ग़ैर सरकारी संगठनों से हिंसा प्रभावित इलाक़े में नहीं जाने का आग्रह किया है क्योंकि अभी भी स्थिति संवेनशील और तनावपूर्ण बनी हुई है.

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने अपील कि है कि अभी उस क्षेत्र का दौरा नहीं किया जाना चाहिए ताकि सुरक्षा बलों को उनका ध्यान बांटे बिना काम करने दिया जा सके. इससे पहले ऐसी रिपोर्टें थीं कि रेलमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बैनर्जी ने अपनी पार्टी के मंत्रियों मुकुल रॉय और शिशिर अधिकारी से मिदनापुर जाने को कहा हैं. ममता बैनर्जी ने माओवादियों के ख़िलाफ कार्रवाई इतनी देर से होने का सवाल उठाया है.#b#

इसी बीच माओवादियों ने पश्चिम बंगाल, छतीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, और बिहार में 48 घंटे के बंद का आह्वान किया है. गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ओंकार केड़िया का कहना है कि इस बंद के दौरान माओवादी हिंसक कार्रवाई कर सकते हैं. गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव डी आर एस चौधरी ने कहा है कि सभी राज्यों को सतर्क कर दिया गया है कि वे बारूदी सुरंगों और आईईडी के प्रयोग के इस्तेमाल के प्रति विशेष रूप से चौकन्ने रहें. उन्हें खुफिया सूचाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं.

पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले के लालगढ़ पुलिस थाना क्षेत्र को नियंत्रण में लेने के बाद अब सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल और राज्य पुलिस के जवान मिलकर अन्य इलाक़ों की ओर बढ़ रहे हैं ताकि वहां के गावों को भी माओवादियों से मुक्त कराया जा सके. पश्चिम बंगाल के रंगमंच और फिल्म जगत से जुडी कई नामी हस्तियों ने लालगढ़ पहुंच कर स्थिति का जायज़ा लिया.

 

न्याय कैसे मिलेगा?

झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश प्रंशात कुमार के चेम्बर में हाईकोर्ट का ही एक चपरासी शत्रुघन राम चाकू लेकर घूस गया। उसका बेटा नीलकंठ सागर सितम्बर 2008 से लापता है. कई बार एस.पी व न्यायाधीश को वह आवेदन दे चुका है, परशत्रुघन राम का कहना है कि किसी ने कुछ नहीं किया. पुलिस व मीडिया ने भी कुछ नहीं किया. उसने कहा, ‘समय-समय पर उसे बेटे से बातचीत भी कराई जाती है’. उसने कहा कि इसीलिए योजना बनाई कि जज को चाकू दिखाने से मीडिया में इसका कवरेज होगा और इससे उसका उद्देश्य पूरा हो जाएगा. हाईकोर्ट कर्मियों ने बताया कि बेटे के लापता होने के बाद शत्रुघन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है. प्रथम दृष्टया में, तो यह एक मामूली सी घटना ही मालुम होती है और इसे इसी रूप में लिया भी गया. परन्तु देश की वर्तमान स्थिति देखने के बाद और इस तरह की घटित बहुत सारी घटनाओं को उससे जोड़ते हुए यदि इस घटना के तह में जाकर वैचारिक झंझावतों से एक संतुलित लहर को खींच कर निष्पक्षता पूर्वक दृष्टिपात किया जाए, तो देश की अनेक समस्याओं की परत दर परत खोली जा सकती है और सही एवं सुचारू ढंग से इनके समाधान करने में सहायता प्राप्त की जा सकती है. आज देश में पूरी तरह पावर गेम चल रहा है. अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. गरीबो, शोषितों, मजबूरों को कोई पूछने वाला नहीं है. जिसके पास ताकत है चाहे वह किसी रूप में हो, उसी की पूछ हो रही है. कमजोरों को सतया जा रहा है. उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है. यह यदि मिल भी रहा है, तो उसके स्वरूप पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. साथ ही साथ उसमें इतनी देर हो रही है कि उस न्याय की सार्थकता ही खत्म हो जाती है. कुछ ही दिनों पहले झारखंड के दौरे पर आये सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री बालाकृष्णन ने कहा था कि झारखंड में अधिकतर मामले (केस) गरीबों पर किये जाते हैं. इन सब बातों से पता चलता है कि हमारी सरकार की कार्य प्रणाली आम लोगों के लिए कितनी प्रतिकूल साबित हो रही है कि न्याय के आलय अर्थात न्यायालय के छोटे स्तर के कर्चचारी के द्वारा न्याय की मूर्ति अर्थात् न्यायमूर्ति को चाकू दिखाने की घटना असाधारण तो है ही, पर उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आखिर ऐसी स्थिति आई ही क्यों? क्यों उस चपरासी को लोगों व मीडिया अथवा सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए हथियार (चाकू) का प्रदर्शन करना पड़ा.

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बोनसाई

बोनसाई
 
पिता ने
वषों नाईट शिफ्ट करके
बनाये थे पैसे
और ली थी एक कट्ठा जमीन,
पिता जाते थे - दौरे पर
बचाते थे पैसे
खरीदते थे सीमेंट, छड़, ईंट......
पिता ने कर्ज लिए थे ,
ऑफिस से
सवारी और घर अग्रिम के खाते में
फिर खडी की थी दीवारें,
पिता ने
बेच दिए थे माँ के गहने
माँ हो गई थी क्षत-विक्षत
इस प्रकार ढली थी छत,
पिता
बैठे हैं उसी घर के बाहर
जिनके लिए कोई भी कमरा
खाली नहीं है,
पिता सोते हैं ओसारे में
चरमराती चारपाई पर
पीते हैं बीडियां
बकते हैं गालियाँ
छिडचिडे हो गए हैं इन दिनों
माँ भी नहीं रही अब
खडी हो गई है दीवारें कमरों के बिच
बेटे सिर झुकाए
अपने-अपने हिस्से में प्रवेश करते
आज बडकी/मझली /संझली
कोई न कोई
दो रोटी दे ही देंगी पिता को
कल ही तो उसने दी थी
आज फिर ....ना बाबा ना .....
मेरे भी तो.....
घर नहीं रह गया पिता का
पिता नहीं रह गए बेटों के
कितनी तेजी से बदल गया सब कुछ
इसी जीवन यात्रा में....
ताड़ के रिश्ते तले
बोनसाई हो गया पिता


"विजय रंजन"