
अगस्त का पहला रविवार तो मित्रता के दिन के रूप में हम सभी ने मना लिया और मनाना भी चाहिए। आखिर इसमें हर्ज ही क्या है। लेकिन जिस देश में 365 दिन त्यौहार मनाने की परंपरा है उस देश में लोग एक खास दिन अपने देश का भूलते हैं और विदेश से आए एक दिन को मनाने लगते हैं। 2 अगस्त तो चला गया लेकिन 8 अगस्त का क्या। इन 6 दिनों के बीच जिन लोगों से पूछा उनके लिए 2 अगस्त खास है और 8 अगस्त को क्या हुआ था ये उन्हें मालूम ही नहीं। एक ऐसी क्रांति जो अंग्रेजी ताबूत की आखिरी कील बन गई। करो या मरो के नारे के साथ गांधी ने शुरू किया भारत छोड़ो आंदोलन। सभी ने मित्रता दिवस के पक्ष और विपक्ष में जमकर लिखा लेकिन मेरे लिए भारत छोड़ो आंदोलन के मौके पर कुछ न लिखना एक अपराध के समान है। अंकुर विजयवर्गीय
परिवर्तन प्रकृति का नियम है इसलिए इस स्वभाविक गति पर ध्यान तभी जाता है जब यह कोई खासियत लिए होता है। ओर कई बदलाव चाहे वे अच्छे के लिए हुए या अशुभ नतीजे के रूप में सामने आए, छोटे हों या बड़े, एकाएक हुए हों या धीरे-धीरे पककर सामने आए हों, कुछ-न-कुछ विशेषता लिए होते हैं। और जिन परिवर्तनों का असर स्थायी होता है, समय के साथ विस्तार तथा नए आयाम ग्रहण करता है, वे क्रांति की श्रेणी में शुमार होने की पात्रता हासिल कर लेते हैं। राष्ट्र के संदर्भ में एसा हर छोटा-बड़ा बदलाव इंकलाब ही तो है जिससे लोगों का जीवन बदल जाता है। यदि एक स्वतंत्र देश के रूप में पिछले62 सालों में आधुनिक भारत के विकास की पड़ताल करें तो कह सकते हैं कि इस दौरान भारत में कई विशिष्ट और आमूल परिवर्तन वाली क्रांतियां हुई हैं जिनकी बदौलत देश राजनीति, व्यवसाय और लोकप्रिय संस्कृति में घटित घटनाओं की बदौलत एक बदला हुआ समाज बन गया। वे क्रांतियां हिंसक से लेकर शांतिपूर्ण और सर्वव्यापी क्रांतियों से लेकर मूक और अदृष्य क्रांतियों तक थी। यह बदलाव की कहानी है जो प्रकृति का अभिन्न अंग है। लेकिन कोई-कोई परिवर्तन छोटे से शुरू होकर ऐसा विशाल रूप ले लेता है कि भविष्य के लिए एक रास्ता ही बन जाता है। क्रांति यही है जो सब को और सब कुछ बदलकर रख दे और नया आयाम रचे। कोई परिवर्तन जहां अपने ठोस लक्ष्यों के चलते स्थायी रूप ले लेता है, वहीं कुछ बदलाव बिजली की कौंध की मानिंद चमककर गायब भी हो जाते हैं। लेकिन हर बदलाव इतिहास में और स्मृतियों के किसी कोने में दर्ज रहता है। एक पल में अचानक होने वाले बदलावों को उन छोटी-बड़ी क्रांतियों पर भी लागू किया जा सकता है जिन्होंने पूरे भारत को आगोश में ले लिया। दक्षिण अफ्रीका में अन्याय के खिलाफ लड़ाई छेड़ने वाले एक वकील के मन में आए एक विचार से लेकर खाली पड़े विदेशी मुद्रा भंडार को दुरूस्त करने का जवाब ढूढ़ते एक प्रधानमंत्री तक। पष्चिम बंगाल के किसानों के साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले कमजोर भद्रलोक से लेकर मुष्किल में फंसी सरकार को कपट के जरिए उबारने की कोशिश करते एक राजनीतिक तक। दरअसल भारत मे बदलावों को कई रचनाकारों और अवतारों ने अंजाम दिया है। इन लोगों ने दुनिया को मानो समतल कर दिया, लोगों को आपस में जोड़ा और धूल भरे रास्तों में सड़कों का निर्माण किया । भारत के बदलाव कुछ तो समय के किसी खास खंड में हुए और कुछ लगातार जारी हैं, जिन्होंने समाज का पुनर्निर्माण किय, लोगों की समझ को पूरी तरह से बदल दिया और कई परिवर्तनों को आपस में जोड़ दिया। आठ अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान पर अखिल भारतीय काँग्रेस महासमिति ने वह प्रस्ताव पारित किया था, जिसे 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव कहा गया। सन् 1885 से राष्ट्रीय काँग्रेस अनेक प्रस्ताव स्वीकार करती रही थी और ऐसा भी नहीं था कि इन प्रस्तावों के कोई परिणाम नहीं निकलते थे। लेकिन 'भारतछोड़ो' प्रस्ताव एक ऐसा प्रस्ताव था जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक विशिष्ट मोड़ दिया, इस प्रस्ताव ने तो जैसे सारा राजनीतिक माहौल ही बदल डाला। सारे देश में एक अभूतपूर्व उत्साह की लहर दौड़ गई। लेकिन उस उत्साह को राष्ट्रीय विस्फोट में बदल दिया उस रात राष्ट्र के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी ने। सारा देश मानो हिल गया। यदि सरकार उक्त कदम न उठाती तो क्या हाल होता, यह एक अन्तहीन बहस का विषय हो सकता है। लेकिन दमन के आधार पर यहाँ जमी हुई विदेशी सरकार और कोई तरीका जानती भी तो नहीं थी। तर्कसंगत अनुमान तो यही हो सकता है कि उक्त प्रस्ताव के फलस्वरूप एक विराट जन-आंदोलन उठ खड़ा होता और सरकार को देर-सबेर दमन-चक्र चलाना ही पड़ता। 8 अगस्त, 1942 को जिस क्रांति का सूत्रपात हुआ, उसने असंदिग्ध रूप से यह जाहिर कर दिया कि अँग्रेजी हुकूमत टिक नहीं सकती।
अगस्त, 1942 की क्रांति से क्या-क्या हुआ, कहाँ-कहाँ हुआ इसे दोहराना अनावश्यक है। लेकिन समूचे देश ने करवट बदली थी। और उसका प्रमाण चाहिए ही हो तो, स्वयं सरकार द्वारा प्रकाशित एक रपट है। यह रपट बयालीस के संघर्ष के बारे में है, जिसे टॉटेन हॅम रपट भी कहते है। यह रपट, जैसी कि सहज ही अपेक्षा की जा सकती है, सरासर एकतरफा है और तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करती है। क्योंकि इसका मकसद वास्तविकता को जाहिर करना नहीं था। मकसद था काँग्रेस को बदनाम करना। फिर भी यदि हमने इसका जिक्र किया है तो इस मकसद से कि इस रपट से यह प्रकट होता है कि देश के हर भाग में भारत छोड़ो की भावना थी। दरअसल सन् 1942 की क्रांति पिछले सत्तावन वर्ष से राष्ट्रीय काँग्रेस जो आंदोलन चला रही थी, उसका उफान था। इस उफान ने अँग्रेजों की आँखें खोल दी। इस उफान की पृष्ठभूमि में लोकमान्य तिलक और उनके बादमहात्मा गाँधी ने जो व्यापक जन-जागृति उत्पन्न की थी, जो राष्ट्रीय चेतना जगाई थी, वह थी। लिहाजा, सन बयालीस के सिर्फ पाँच साल बाद ही भारत स्वतंत्र हो गया। निश्चय ही इसके साथ विभाजन की ह्रदय विदारक त्रासदी भी जुड़ी थी, फिर भी यह तथ्य तो स्पष्ट है ही कि 'भारत छोड़ो' आंदोलन ने अँग्रेजों के समक्ष स्पष्ट कर दिया था कि उनकी हुकूमत चल नहीं सकती। एक राष्ट्र के रूप में भारत के कुछ-कुछ समस्याग्रस्त और उथल-पुथल भरे इतिहास को देखते हुए इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कहा था ‘‘जब तक संविधान में इतने संशोधन न हों कि यह अपनी पहचान ही खो दे, चुनाव जब तक नियमित और निष्पक्ष होते रहें, धर्मनिरपेक्षता का विचार व्यापक अर्थों में बरकरार रहे, अपनी पसंद की भाषा में लोग लिख और बोल पाएं, जब तक एक समन्वित बाजार मौजूद है, सामान्यतः असरदार सिविल सर्विस और सेना है और जब तक हिन्दी फिल्में देखी ज़ा रही हैं व उनके गाने गाए जा रहे हैं, भारत का अस्तित्व बरकरार रहेगा।’’ देश-विदेश के कई टिप्पणीकार भारत की दुर्गति की जो आशंका जताते रहे है, उसके विपरीत यह बयान कहीं उम्मीदभरा है। समय पाठशाला है जहां हम सीखते हैं, समय वह आग है जिसमें हम निखरते हैं। हमारा अतीत हमारे वर्तमान को प्रदर्षित करता है और वर्तमान हमें दिखाता है कि हमारे पैरों के नीचे की जमीन कहां खिसक रही है। दुनिया जब इस देश के भविष्य के बारे में बात कर रही है, उस समय भारत अपने आप से तर्क करते रहने के लिए अपने समृद्ध भंडार से शक्ति और सामथर्य ले सकता है। भारत का भूतकाल उसके वर्तमान को आकार दे रहा है। पचास वर्ष पूर्व के उस तेजस्वी आंदोलन में जाने कितनों ने अपना सर्वस्व होम दिया था। तरह-तरह की यातनाएँ झेली थीं। उन सबके प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करना हम सबका कर्तव्य है। साथ ही यह भी कि उन तमाम ज्ञात-अज्ञात शहीदों की आँखों में जिस स्वतंत्रभारत के सपने थे उनकी याद कर उन्हें साकार बनाने के प्रति स्वयं को पुन: प्रतिबद्ध करने का भी यह अवसर है। तभी हमारा देश, हमारा जनतंत्र और हमारी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रह सकती है। लिखते वक्त पता नहीं क्यूं हाथ कांप रहे है। शायद खुद से ही कुछ सवाल होंगे लेकिन अब उन सवालों के जवाब आप ही मुझे दे सकते हैं।